

रमजान का रोज़ा और इंसान होने का सवाल: एक आत्मसंघर्ष की कहानी
रमज़ान के रोज़े और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच उलझा एक मनुष्य—यह कहानी आत्मग्लानि, आडंबर और सच्ची इंसानियत के द्वंद्व को उजागर करती है। रोज़ा… Read More Storys पाक रमजान माह का दसवां रोजा था, मैंने रोजा नहीं रखा था। जबकि मैं जानता था कि दुनिया के हर मुसलमां को रोजा

अशोक तिवारी की लंबी कविताएँ: स्त्री जीवन के सामाजिक, राजनीतिक और पारिवारिक आयामों का रचनात्मक विश्लेषण
अशोक तिवारी की लंबी कविताएँ स्त्री जीवन के क्षणिक और स्थायी अनुभवों, कुंठा, अवसाद और प्रेम के भावात्मक आरोह-अवरोह का सामाजिक, राजनीतिक और पारिवारिक संदर्भों में संवेदनशील विश्लेषण प्रस्तुत करती हैं। 1- वो औरत विस्मृत नहीं हो पातीघूंघट काढे़ वो औरतजो पशुओं की लीदअपने सिर पर ढोकरगांव बाहर घूरे तक

मैं भी आती हूँ: कहानी सुनिए ‘सीमा सिंह’ की आवाज़ मेँ
एक किसान की ज़मीन, विश्वासघात और टूटते सपनों की मार्मिक कहानी। नीम के पेड़ और सम्मान की रक्षा में खड़े हरिया के साथ उसकी पत्नी क्या कुछ ऐसा करती है जिससे अचंभा हो जाता है – कहानी “मैं भी आती हूँ”। सुनिए कहानी “सीमा सिंह” की आवाज़ मेँ मैं भी

आओ कि सुंदर को सुंदरतम बना दें – प्रेम पर हिन्दी कविता
“यह भावनात्मक हिंदी कविता प्रेम, सकारात्मक सोच और जीवन को बेहतर बनाने का संदेश देती है। पढ़ें और अपने दिल में उम्मीद की नई रोशनी जगाएं।” मानव जीवन की संवेदनाओं एवं कोमल भावों को रचनात्मक अभिव्यक्ति देती पूरे आत्मविश्वास से भरी ‘नीलम स्वर्णकार’ की कुछ कविताएँ ……जैसे एक कोशिश घोर

मैं भी आती हूँ: किसान, ज़मीन और विश्वासघात की मार्मिक कहानी
एक किसान की ज़मीन, विश्वासघात और टूटते सपनों की मार्मिक कहानी। नीम के पेड़ और सम्मान की रक्षा में खड़े हरिया के साथ उसकी पत्नी क्या कुछ ऐसा करती है जिससे अचंभा हो जाता है – कहानी “मैं भी आती हूँ”। मैं भी आती हूं….! हरिया पेड़ के नीचे बैठा

क्रांतिकारी की कथा : राजनीति और समाज का व्यंग्यात्मक सच
‘क्रांतिकारी की कथा’ एक तीखा व्यंग्य है जो समाज, सत्ता और दिखावटी क्रांति की मानसिकता को उजागर करता है। यह लेख आज के दौर की सच्चाई को आईना दिखाता है। क्रांतिकारी की कथा अन्य व्यंग्य पढ़ें ‘क्रांतिकारी’ उसने उपनाम रखा था। खूब पढ़ा-लिखा युवक। स्वस्थ सुंदर। नौकरी भी अच्छी। विद्रोही।

विकासोन्मुख गाँव की जातिगत समस्या : ‘चाँद के पार एक चाभी’ का सामाजिक विश्लेषण
विकास की ओर बढ़ते भारतीय गाँवों में जातिगत भेदभाव अब भी एक गंभीर समस्या है। ‘चाँद के पार एक चाभी’ कहनी के माध्यम से ग्रामीण समाज की इस सच्चाई का गहन विश्लेषण। विकासोन्मुख गांव की जातिगत समस्या है : ‘चाँद के पार एक चाभी’ ‘अवधेश प्रीत की कहानी ‘चाँद के पार

पढ़ने-गुनने की जगह: कैसे वाचनालय और पुस्तकालय गढ़ते हैं व्यक्तित्व
1985 में चकमक से जुड़ाव ने किताबों और वाचनालयों के साथ एक नया रिश्ता बनाया। हर महीने पुस्तकालय में बिताए घंटों ने न सिर्फ पढ़ने-लिखने की आदत डाली, बल्कि व्यक्तित्व विकास की मजबूत नींव भी रखी। यह लेख बताता है कि कैसे वाचनालय और पुस्तकालय जीवन की दिशा बदल सकते

“सीमा सिंह” की आवाज़ मे सुनिए ‘हनीफ़ मदार’ की कहानी “चरित्रहीन”
‘ड्राइवर साहब, आप मुझे हितैशी समझें या दुश्मन परन्तु बात सच है मुंह से नहीं कह पाया इसलिए लिख कर भेज रहा हूं, और किसी को बताई भी नहीं है। बात दरअसल यह है कि सरला अब बड़ी हो गयी है अब उसके हाथ पीले कर दो…. वैसे भी आप