“यह भावनात्मक हिंदी कविता प्रेम, सकारात्मक सोच और जीवन को बेहतर बनाने का संदेश देती है। पढ़ें और अपने दिल में उम्मीद की नई रोशनी जगाएं।”
मानव जीवन की संवेदनाओं एवं कोमल भावों को रचनात्मक अभिव्यक्ति देती पूरे आत्मविश्वास से भरी ‘नीलम स्वर्णकार’ की कुछ कविताएँ ……जैसे एक कोशिश घोर अँधेरे से उजाला खोज लाने की ….| – संपादक
1- आओ कि सुंदर को सुंदरतम बना दें
आओ..
स्वीकारो मेरा मौन आमंत्रण
थामो मेरी हथेली
चलो चलें उस सर्पीली पगडंडी पर
उतर जाएं ध्यान के गहरे कुएं में
स्वभाविक है थोडी फिसलन होगी वहां
भय भी
अंतस के निर्वसन होने का
पर एक बार देख लेना
तुम मेरी आँखों में
महसूस करना मेरी हथेली का अपनापन
विश्वाश रखना
मेरे कहे शब्दों पर
मैं सत्य कहती हूं
ये तो सदैव से जानते हो न
जो कुछ घटित हो
होने देना
बह जाने देना हर विषम भाव
और उससे जुडी प्रतिक्रिया
और सबसे जरूरी
अपनी स्विकारोक्ति..
आओ..
कि नव निर्माण की प्रक्रिया आरंभ हो
आओ
कि नूतन स्वर लहरियों का सृजन हो
मैं आमंत्रण देती हूँ
आओ….
आओ मेरे सहचर
कि और दृढ हों जाएं मेरे-तुम्हारे
स्नेह तंतु
कि दो आत्माएं जब गहरे ध्यान में उतरती हैं
तब उस ऊर्जा से प्रस्फुट हुए कण
दूर तक प्रभावित करते हैं
आओ कि बंजर भूमि पर बो दें
प्रकाश के बीज,
सींच दें सुनहरी किरणों से
स्नेह और पारदर्शिता के उर्वरक डाल
दृढ विश्वाश का काकभगोडा खडा कर दें
कि बची रहे रिश्तों की फसल
हर नकारात्मक उत्पाती से
आओ
कि सुदंर को सुंदरतम बना दें..
2- मेरा विश्वास
तुम्हारा अहं प्रेम को कभी बोलने नहीं देगा
और मेरा प्रेम हर विषम को मारकर
हर बार बोलेगा
तुम करते रहो प्रतीक्षा
सही समय की
पर मैं अनवरत सींचती रहुंगी
मृतप्राय हो चुके भावों को
हर एक का अपना अपना हठ होता है
तुम्हारा हठ..ताश की गड्डी से कोमल
भव्य प्रेम-प्रासाद को ध्वस्त करना
और मेरा..उसी मृतिका से पुन: नवनिर्माण करना
तुम्हें ज्ञात है..
स्वयं को “तुम” बनाकर किए जाने वाले वार्तालाप
की अभ्यस्त हो चुकी मैं
अब मात्र एक स्नेह को तरसती देह भर नहीं रही
अनगिनत उतार चढाव और कंटने छंटने के उपरांत
एक नूतन स्त्री बन उभरी है
कंटको भरे मार्ग पर
अनावृत पग धरने से मिली पीडा
सदैव दु:ख ही नहीं देती
नया भी सृजित करती है
किंकरतव्यविमूढता ने
जटिल प्रश्नों को जन्म देकर
अंत में मार्ग भी प्रशस्त किया है
मेरे प्रिय,
तुम्हारा प्रेम, पुचकार, अपमान, दुत्कार
सब सहेज लिया है मैंने
तुम्हारा मन निर्मल करने का मेरा प्रयोग
अनवरत चलेगा
प्रेम.. पाषाण को भी जल-सा सरल कर देता है
एसा गहन विश्वास है मेरा |