ISSN - 2455-2011
RNI - UPHIN/2017/74803

‘ सिया , सिया , सिया , ये महज किताबी बातें बोल रही हैं तू । मेरा यकीन है किे रसलोलुप पुरूषों की गिद्ध नजर हमेशा कोमल औरतों को निशान साध उनका पीछा करती रहतीं। मनचाही  लड़की न मिलने पर वे जल भुन कर उसे शिकार बनाकर मार डालने से नही हिचकते। मतलब वे उसे न चाहें तो किसी और केा भी न चाह सकें। आजकल की तेजाब की घटनाएं इसका सुबूत हैं कि नही  ?   क्या इसे प्रेम कहेगी तू ? ये तो हिंसा है या सिर्फ शारीरिक  भूख ?  रसासिक्त कामुक पुरूष की उत्कट लालसा या मनबहलाव  ?  बोलो , है मेरे सवालों का जबाव तुम्हारे पास  ?  ‘

उतरती हुई धूप

Picture of लेखक- Rajani Gupt

लेखक- Rajani Gupt

साल पर पैर रखे अगला साल और फिर कई साल एक दूसरे की पीठ पर हौले से  पैर रखे गुजरते रहे। उम्र की काईंनुमा परतें तो तन पर तो अपनी गति से जमती रहीं मगर मन तो आज भी उतना ही अछूता या कोरा रह गया, किसी जिज्ञासु लड़की  की तरह  कहीं भी छलांग लगाकर उछलती लंगड़ी खेलने को बेताब। अरसे बाद प्रेमा को खुद के साथ अकेले रहने का मौका हाथ लग पाया मगर ये क्या , वे तो दिन रात किसी न किसी उधेड़बुन में डूबी , खोयी , बात बेबात पर हंसती खिलखिलाती, गुनगुनाती या फिर लेटे लेटे मुस्करातीं मिलतीं। प्रेमा को इस रूप में देखना सिया के लिए अनहोनी बात थी । दोनों सुबह शाम की वाकिंग पार्टनर। सचमुच , आंधी पानी तूफान या ओले पड़ रहे हों या तेज धूप भरी चटख दुपहरी हो मगर वे दोनों हमेशा -‘ हम साथ साथ हैं ‘ का तख्ती लगाए कहीं किसी मेाड़ पर हर हाल में टकरा ही जातीं । सड़कों की खाक तो सिया को भी छाननी पड़ती गोकि वह किसी बीमा कंपनी में कार्यरत थीं।

‘ सिया , तुम्हारे उस एनजीओ के जरिए क्या वाकई हाशिए पर फिकी औरतों का भला हो पाता होगा  ?. .  अपने धारदार तर्को से वे सिया को चुप कराने की नई युक्तियां निकाला करतीं ।

 ‘ पिछले महीने अपने गांव गई,  जहां तमाम सधवाएं अपने जीते पतियों को कब्र में दफनाकर  विधवाओं का फर्जी सर्टिफिकेट देकर पेंशन पा रही हैं। पूरे देश का यही हाल है । हम चाहे जितनी बड़ी बड़ी बातें क्यों न कर लें मगर कुछ भी तो नही बदलता दिख रहा । हमारे आसपास हर रोज एक नया घोटाला , हर दिन दर्जनेां बलात्कार , और . . . और . . .

‘ये सब बातें छोड़ो , आज एक निजी सवाल पूंछूं , आपको अपने जीवन में किसी से प्रेम हुआ कभी लगा कि बस इसके वगैर जीना जीना नही रहा । प्रेमा , साफ साफ बताना और हां , इसमें पतिनुमा जीव शुमार नही . . ; हंसते हुए सिया ने उन्हें छेड़ा।

‘ अब क्या बताएं सिया , कॉलेज के समय में होते ही हैं पसंद करने वाले , खैर छोड़ो , पुरानी बातें . . ‘

‘ हां , हुआ है ये अहसास और यही है ऐसा अनूठा रस जिसके चलते होठों पर मुस्कान की नदी बहती रहती। मुझे सार्थक कामों की तरफ ले जाता वो अहसास । सच बताएं तो अगर एक बार ये अहसास जग जाए तो ताजिंदगी आपके जीवन के अंधेरे पक्षों को रोशनी से भर देगा। मन की गांठों को पूर्वग्रहों को या कडुवाहट को मिठास में तब्दील कर देती । ऐसा हजार बाट का बल्व जिसकी रोशनी से घुप्प अंधेरे कोने उजाले से दीप्त हो जाए जिसके जरिए आती ताजी हवा , रोशनी या कुदरती धूप की आंच में हम पल भर में कुछ के कुछ हो जाते वशर्ते किे ऐसा निश्छल प्रेम अपनी गहराई लिए हो . . . भावावेश में डूबी आवाज किसी प्रवचन देते संत में बदलती जा रही थी । वे अपलक उसे चौंककर देखती फिर उसकी बातों को घूंट घूंट गले से उतारने की कोशिश करतीं रहीं ।

‘ मगर मैं ऐसा नही मानती , जरूर दोनों में से किसी का स्वार्थ टकराता होगा , फिर वे रहस्यमय ढंग से कुरेदने लगी – ‘ कौन है वो , बताओगी नही  ?  ‘

‘ हम जो बात कर रहे थे , उसे लेकर क्या सोचती हो प्रेमा ?  ‘

‘ सिया , हर कोई चाहता है कि उसे वैसा साथ मिले मगर बदले में मिलता है छलावा या प्रेम के नाम पर दैहिक स्वैराचार या एक दूसरे को इस्तेमाल करने की चालें , अवसरवादी रवैया यहां भी काम करता है । ‘

‘ खुद को थोड़ा ऊपर उठाकर सोचिए आप , वैसे भी इसका अहसास सबको कहां हो पाता है  ?  ‘

‘ सिया , मुझे लगता है , सालों से तमाम पुरूष अपनी अपनी जेब में दिल नामक वेशकीमती पुडि़यां रखे दर दर भटकते रहते फिर मौका पाते ही वे झटपट इसी जादुई टिकिया को किसी मोहाविष्ट वौराई स्त्री की हथेली पर रखकर ‘ हाय , हाय , हमें प्रेम हो गया , जैसी सिसकारी भरने लगते। सोचो , किसी कुरूप से कहां कोई प्यार करता है  ?  यानी प्रेम के लिए चाहिए रूपसी । सुंदर जवान स्त्री दिखते ही वे पगलाने लगते। मन करता है , पलटकर पूछूं उनसे , जो विकलांग , कुरूप या काली हैं , उन पर प्रेम की वैसी बौछार होते देखा है कभी  ?  मैंने तो नही देखा , तो क्या ये महज दैहिक आकर्षण भर है या पुरूष दृष्टि की भोग लालसा का विस्तार जिसके दुष्चक्र में अक्सर किशोरियां फंस जाती हैं  , नही क्या  ? ‘

इतना लंबा भाषण सुनकर सिया चुप हो गईं फिर बोली – ‘ कुछ हद तक बात तो सही है मगर प्रेम का निमित्त सिर्फ प्रेम ही हो जहां अपने जीवन के श्रेष्ठ को निश्छल भाव से बिखेरने में ही छलकता है दूधिया झरना जो जीवन की पथरीली राह को सरसता से भर दे। अंधियारी गली पर अनायास दिख जाता है रोशनी का सुराख जिसमें से कल कल टपकता है जलस्रोत जो प्यासे राह भटके राहगीर का गला तर दे , उनकी थकान मिटा दे या उनकी कठोरता को पिघलाकर मोम बना दे , बस उसे कुछ का कुछ बना दे । उसके अंतस में प्रेम व सौंदर्य का मानसरोवर बहा दे . . ‘

‘ सिया , सिया , सिया , ये महज किताबी बातें बोल रही हैं तू । मेरा यकीन है किे रसलोलुप पुरूषों की गिद्ध नजर हमेशा कोमल औरतों को निशान साध उनका पीछा करती रहतीं। मनचाही  लड़की न मिलने पर वे जल भुन कर उसे शिकार बनाकर मार डालने से नही हिचकते। मतलब वे उसे न चाहें तो किसी और केा भी न चाह सकें। आजकल की तेजाब की घटनाएं इसका सुबूत हैं कि नही  ?   क्या इसे प्रेम कहेगी तू ? ये तो हिंसा है या सिर्फ शारीरिक  भूख ?  रसासिक्त कामुक पुरूष की उत्कट लालसा या मनबहलाव  ?  बोलो , है मेरे सवालों का जबाव तुम्हारे पास  ?  ‘

 ‘ प्रेमा जी, कहां हैं आप, सुन रही हैं न  ?  ‘

डबडबायी आंखों को आहिस्ते से पौंछते हुए कुछ कहने के लिए होंठ थरथराए मगर चाहकर भी बोल नही फूटे। अंदरूनी खदबदाती बेचैनी और घुटन का दावानल जैसे उन्हें समूचा जला डालने पर आमादा था । टहलते हुए अनायास वे बैंच पर बैठ गयीं  और सिया को भी वहीं बिठा लिया।

‘ सिया, आज तुम्हें कुछ अनकही सचाइयां बताने का दिल कर रहा। ये बेचेनी , ये थरथराहट , ये ऊहापोह मुझे चैन से जीने नही दे रही , बताकर शायद कुछ हल्का लगे . . .

‘ बताओ न , किसी से नही कहूंगी , यकीन करो  ‘ कहते हुए सिया ने उनकी हथेली को अपनी मुट्ठी में दाबते हुए किसी सच्चे भरोसेमंद साथी की नजरों से आश्वस्त किया  – ‘ बस एक कुआं समझ लो मुझे जहां से कभी कुछ बाहर नही आ सकता ।

हूं , सोचते हुए रह रहकर पुराना दर्द उभर आया । ऊपर से थोपी माटी जब तक अंदरूनी सुराखों तक न पहुंचे तो ऐसे जोड़ क्या वाकई जुड़ पाते हैं बल्कि ऐसे में दुख और ज्यादा गहराता, रग रग में व्यापता जाता। वैसा जुड़ाव कभी था भी ? फिर वो शंकाएं , कुशंकाओं से घिरा वो अंत:संघर्ष का लंबा दौर जिसके चलते रहा सहा लगाव भी पेड़ से झरते पत्ते की तरह एक बार झरा तो खत्म मगर फिर भी उम्मीदें जल्दी कहां मरती हैं  ? हमारी बहसें शुरू होने लगती फिर लड़ाइयां हेाती, उसके बाद अटूट सन्नाटा पसर जाता।

अब तुम दो दशक पीछे की तरफ पीठ कर लो

तो सुनो , उस जगह चंद लड़कियां ही लड़कों के संग साइंस लेकर कोएड में पढ़ा करती थी1 पहले तो मां बाप ही लड़किेयों के पढ़ने पर पाबंदी लगाया करते और जो किसी होश्यिार बच्ची पढ़ने की जिद ही पकड़ लेती , उसके सिर पर भारी भरकम हिदायतों की पोटली से समूचे तन मन को बांध देते – ‘ खबरदार , जो किसी लड़के बात भी कीं , वरना हमसे बुरा कोई नही होगा । इसी धरती मैया के भीतर चीरकर दो टुकड़े गाड़ देंगे तुम्हें , हां , हमारी नाक न कटाइयों । ‘ फिर मौका तककर अकेले में मां ने अलग से समझाया – ‘ प्रेमा , तूने अगर किसी लड़के से नैन मटक्का किया तो , हां मुझे तुरंत खबर हो जाएगी , इस नाते मेरा थोड़ा कहा ज्यादा समझना। वैसे मेरा कतई मन नही कि तू वहां पढ़े मगर तेरे बप्पा पढ़ा रहे हैं तो . . .

‘ कोई तुक नही कि ये वहां कोएड में पढ़े। इस शहर की और लड़कियां भी तो हैं , वे तो इसकी तरह कॉलेज जाने की जिद नही कर रहीं , चुपचाप घर पर बैठकर बीए फीए क्येां नही कर लेती  ?  ‘ चाचा की बात सुनते ही अचानक जोर से चिल्ला पड़ी मैं –  ‘ लिखकर रूक्कानामा दे दूं , बोलो , जब कह दिया कि किसी से नही बोलूंगी तो नही बोलूंगी , बस. .

‘ फिर चाहे वो कॉलेज का चपरासी ही क्यों न हो ? ‘ बीच में ही 10 वीं में पढ़ रही बहन बोल पड़ी तो गर्म माहौल में अनायास ठंडी हवा का पुरवाई चल पड़ी और बस बात बनती चली गयी । तो सिया , म.प्र. के टीकमगढ़ से निकली मैं 80 के दशक की पहली लड़की बनी जिसके चारों तरफ भनभनाते कीट पतंगोनुमा लड़कों की भिनभिनाहट को पूरी तरह परे धकेल मैंने अपने को पढ़ाईनुमा भटटी में झोंक दिया और सुनहरे लफजों में 12 वीं के बाद बीएससी फिर एमएस.सी तक प्रथम आती रहीं। किसी आदर्श लड़की की तरह कायदे से लपेटी चादरनुमा मूल्यों से हरदम ढकी मुंदी रहती , इस नाते अपने किशेार वय की उमंगों तरंगों को तजकर मैं किसी रोबोट में बदलती जा रही थी जिसकी निगाहें किसी कार्पोरेट में काम करने वाले की तरह अक्सर टारगेट पर टंगी रहतीं जिसे हर हाल में टॉप करना है फिर चाहे कितने ही अच्छे लड़कों के आग्रहों मनुहारों को जबरन दरकिनार करना पड़े। ब्रजमोहन को डांटते डपटते कई महीने , क्रमश: कई साल बीतते गए मगर नेक लड़की का वो ठप्पा इस कदर मेरे भीतर फिट कर दिया गया जिसे चाहकर भी मैं पूरी ताकत से कभी नही फेंक पायी। कभी कभी लगता है जैसे शायद उसी की बददुआ का ही ये असर रहा कि आज मेरा जीवन इस कगार पर खड़ा हैं जहां सिर्फ और सिर्फ दरारें ही नजर आती हैं जिन्हें इस जन्म में तो कभी नही पाट पाऊंगी ।

’ अरे सिया , ऐसे क्या ताक रही हो ?  हां सौ परसेंट सच कहने का साहस पहली बार जुटा पायी हूं , ऐसे ऐसे हादसे मेरे ऊपर से गुजरते रहे और मैं मूर्तिवत सहती रहीं , और करती भी क्या , अब आगे का किस्सा

  80 के दशक का वो माहौल वैसा ही था

एमएस.सी के दौरान छिड़े शादी के प्रसंग के दौरान मेरे चुप रहने को हामी मान लिया गया। जब योगेश मुझे देखने आए तो बहुत कुरेदने पर मैंने एक ही बात कहीं – मुझे अभी और पढ़ना है , नौकरी करना है , इस पर योगेश हंसते हुए बोले – ‘ लॉ कर लेना फिर हमारे साथ चलना कोर्ट कचहरी । ‘

‘ ठीक है , आंखें नवाए किसी सुशील कन्या की तरह मेरे मुंह से अनायास निकल गया। शादी के बाद कुछ समय तक जीवन खम पर रहा। योगेश ने अपने दिए वचन के मुताबिक लॉ कराने की जिम्मेदारी पूरी की , हालांकि इस बीच दो बच्चों की जिम्मेदारियां बढ़ गईं। ऊपर से रिश्तेदारों की आमद से अक्सर घर में खूब गहमागहमी रहतीं मगर मेरा ध्यान अच्छे नंबरों से लॉ करके योगेश के साथ कचहरी जाकर वकालत करना। सचमुच , वकालत चल निकली , यहां तक कि क्लाइंट योगेश को छोड़कर मेरे पास आने लगे। केस जीतने पर आए दिन फलों , अनाज या देशी सामानों से लदे फदे लोग वाग घर आ धमकते। तब मन इतना प्रफुल्लित रहता कि जीवन में हर तरफ जैसे खुशियां ही खुशियां बिछी हों , वक्त बेवक्त गुनगुनाया करती। अक्सर गरीब बेसहारा बच्चियों की सूरत देखकर उनके केस मुफत में लेकर पूरे दम खम से अपनी तर्कणा शक्ति से बेखैाफ बहस करके प्रतिपक्ष को चुप करा देती। बस , वही वो सुनहरे दिन याद करके आज भी मुर्दा प्राण में जान लौट आती। तब मैं ढेर सारे काम भी करती। घर के बिखरे कामों को तेजी से समेटती , बच्चों को पढ़ाई कराकर फिर उन्हें लेकर बैडमिंटन खिलाने ले जाती। उनके साथ खुद भी खेलती। क्या तो  दिन थे वे, सुनहरे, चमकीले, धूप भरे, उजास भरे, गुनगुनाहट से भरे उजियारे दिन।

इसी दौरान खुशमिजाज योगेश ने धीरे धीरे चुप्पी का बाना पहन लिया। मेरी उपलब्धियों से वे खुशी जताने का असफल प्रयास करते मगर जब बेकसूर लड़कियों को इंसाफ मिलने पर उनके मां बाप घर आकर बार बार अहसान जताते तो योगेश का मुंह फूल जाता। तब उनकी उदारता या प्रगतिशीलता न जाने किस बिल में दुबक जातीं। धीरे धीरे ये चुप्पी जानलेवा बनती जा रही थीं । सचमुच, ये वही पूरे जोश से उड़ान भरने वाला शानदार दौर था जब मैं अपनी छोटी मोटी सफलताओं पर सवार हो आसमां में कुलांचे भरना चाहतीं मगर ये वो भयावह दौर भी है जब योगेश को अपने जीवन में कुछ नया तलाशने के मौके मिल रहे थे। उस दौर में इस तरफ सोचने का अवकाश ही कहां था मेरे पास ?  अचानक योगेश का तबादला ललितपुर हो गया जबकि बड़ी बेटी उस समय 12 वीं में थीं। उसे किसी भी सूरत में छोड़कर जाने की स्थिति नही थी ।

( योगेश के जोशील बर्ताव एवं चहकती आवाज के पीछे के राज को समझने में प्रेमा को पूरे 5 साल लग गए। महज संयोग था कि इसका आभास एक दिन जरूर हो गया मगर ये सब बाद में , पहले कुछ और )

समय का पहिया बिना आगा पीछे सोचे तेज गति से ऐसे भागता है कि सब कुछ पल भर में चकनाचूर हो जाता गोया घनघोर प्रलय के क्षण आदमी अपनी जान बचाने के अलावा कुछ और नही सोच पाता । ऐसे ही थे वे अझेल , असहनीय पल जब योगेश मेरी बहन के निकम्मे पति को अपने साथ कचहरी ले जाते और इस तरह उसके घर आने जाने के सिलसिले चल पड़े । बाहरी दुनियां में कामयाब वकील लेकिन व्यावहारिकता से कोसों दूर मैं पढ़ी लिखी मूर्खा कुपढ़ की तरह आंखें मींचे पड़ी रहीं , महीने दर महीने गुजरते गए। बहन अपने काम योगेश से कराती रहीं लेकिन हमें कानोंकान खबर तक नहीं। वो तो उसी शहर में किसी काम से आए कजिन ने इन दोनों को जिस हाल में कचहरी एक साथ आते जाते देखा तो उन दोनों के चेहरे पर उड़ती हवाइयां उड़ने लगीं- ‘ आप अचानक कैसे ?  ‘

‘ यही सवाल तो मैं पूछ रहा कि तुम यहां अकेले जीजा के साथ क्या कर रहीं ?  प्रेमा दीदी कहां हैं ?  फिर तो उसने फोन पर ही तमाम ब्यौरे देने शुरू कर दिए ।

बस्स , उसी दिन से कलेजे में ऐसी आग फुकी कि चैन की नींद कभी सो ही नही पायीं।एक अनकही सी बेचैनी दिलोदिमाग पर तारी हो गयी । अचानक सालों पुराना समय याद  आ गया जब योगेश ने कहा था – ‘ ऐसा है प्रेमा , तुम्हारी तबियत ठीक नही रहती , क्यों नही नीता को बुलवा लेती ?  मदद हो जाएगी । ‘

बुरा वक्त छलांग लगाकर चीते की तरह सीधे वार करता है बिना संभलने का मौका दिए। हम सोचते रह जाते कि चीतानुमा वक्त सोया पड़ा है मगर हमारी बेध्यानी का फायदा उठाते हुए अनमना चीता झपट्टा मार हमें घायल कर भाग जाता है दूर किसी अनाम जंगल में , हमें ऐसे ही क्षत विक्षत हाल में बेबस तड़पता छोड़कर कन्नी काटकर निकल जाता है। तब कितनी सरलमना थीं मैं , दूर दूर तक इसका अहसास ही नही कर पायीं किे इसके पीछे योगेश की मंशा क्या थीं ?  तब नीता महज 16 या 17 साल की रही होगी मगर उनके बीच खूब हंसी ठट्टा होता रहता। थोड़े समय बाद जरूर अगल बगल वालों ने टोकना शुरू किया। तो क्या स्त्री पुरूष युग्म की बस वही एक शाश्वत सचाई है महज यौनाचार वनाम देहाचार । नये की तलाश किसे नही होती ?  जीवन की कोरी खाली स्लेट पर नए सिरे से नयी परिभाषा गढ़कर आतुर मन से जीने की कोशिश , फिर जहां स्वार्थपरता हो ? वहां तो कुछ भी कहना मुश्किल है। अकेले कमरे में अंधेरे को पीते सूंघते हुए मैं योगेश के साथ खुद को जोड़कर खुद से सवाल करने लगतीं- तो क्या पुरूष का प्रेम महज देह से शुरू होकर देह में ही खत्म हो जाता है , ये स्त्री ही है जो बखूबी जानती है अपने प्रेम का विस्तार , वह बुनती हैं रूपहले सपनों की रंगीन चादर जिसे ओढे ओढे मटक मटक कर घूमते हैं वे। शायद ये भी पूरा सच कहां ? पुरूष का प्रेम फूलों से झरते मकरंद की तरह बिखर जाता है जिसे वह कायदे से समेट लेती हैं अपने भीतर। तो क्या एक ही समय दो तीन जगह रचाया जा सकता हैं प्रेम ? वे देर तक गांठों भरे रेशमी दुपट्टे को खोलने की भरसक कोशिश करतीं रहीं। जितनी मेहनत से मैं उन गांठों को आहिस्ते से पकड़ एक एक करके सुलझाना चाहती मगर हर बार वे गड्डमड्ड होने लगती यानी सुलझा रेशमी तागा फिर किसी रेशमी तागे से लिपट गुत्थमगुत्था होकर गट्ठल बन जाता। इतनी सारी गांठें ही गांठें बनतीं रहीं जिनका अहसास तक नही हो पाया। रह रहकर तेज गति से भावनाओं का ज्वार उमड़ घुमड़कर तटबंध तोड़ने पर आमादा हो जाता।

सच का रेशा तो यही है कि बीस साल पहले भी हालात कमोवश यही थे और आज भी उनमें जरा भी फर्क नही आया। यूं तो समय के साथ सब बदलते हैं मगर वे तो जस की तस खड़ी रहीं किसी बेगुनाह अपराधी की तरह अपनी ही सजा से अनजान मगर सजा भुगतने को अभिशप्त ,  आखिर वे जाएं तो कहां जाएं ?

 कहां तो वो दौर था जब हमेशा की तरह वे तैयार होकर आकाशवाणी के लिए निकली थीं। आसमान में चारों तरफ भूरी बदली छायी थीं सो वे फटाफट रिकॉर्डिग रूम पहुंच अपनी मीठी आवाज में गाने का रियाज कर रही थीं तभी तेज आवाज में बादल कड़के और सहकर्मी अमित ने पूछा – मैम , चलिए बाहर निकल नीरांजना मैडम के साथ कैंटीन के समोसे खाए जाएं , चलिए न ? ’

‘ हूं , चलो , ‘ साड़ी संभालते वे आहिस्ते से बाहर निकलीं तभी तेज बूंदाबांदी से बचने के लिए सड़क से सटे कॉरीडोर पार करते समय अनायास नजरें सड़क की तरफ चलीं गईं , इतनी तेज बारिश में भी लोग स्कूटर पर भींगते चले जा रहे हैं , अचानक नजरें थमीं , अरे ! ये तो योगेश हैं , वही हरी चेक की शर्ट मगर इनके पीछे दुपट्टे से चेहरा ढके बैठी ये लड़की कौन ? दफ्तर फोन मिलाया तो वे वहां से नदारक। कहीं उनकी आंखों का धोखा तो नही ? या बढ़ती उम्र में पनपता भुलक्कड़पन या वही बीना जिसे योगेश के साथ एकाध बार कचहरी में देखा था। उस समय नही समझ पायीं वे । चीजें थीं कि धुंधलके में कहां साफ साफ दिखतीं हैं ? ये धुंधलका आसमान में छाए बादलों का था या खुद को भरमाने की निरर्थक दिलासा भर – बीना कैसे हो सकतीं हैं , अरसे से संपर्क ही नही रहा फिर वो भला कैसे ? कुछ घटनाएं समय के साथ गहरे अर्थ लेने लगतीं। ये बीना ही थी जो पति से अनबन के चलते गाहे ब गाहे  योगेश के पास धड़धड़ाते चली आती। धीरे धीरे उनके बीच कब , कैसे इतने गहरे रिश्ते पनपते गए , मैं कैसे कहां से जान पातीं भला ? जानने का कोई जरिया तो था नही।

विगत की पटरी पर चलते हुए कभी मुझे बीना के लंबे लंबे खत याद आते जो अपने पति की यातनाओं से भरे होते। तलाक के केस पर चर्चा करने वह किसी भी जगह योगेश को बुलवा लेती। शुरू में मैं उसे जानने के लिए परेशान रहतीं और योगेश से इस मुद्दे पर भिड़ जाया करतीं फिर बाद में शांत पड़ती गईं।

‘ ये उनकी अपनी जिंदगी हैं , योगेश का पीछा करने वाली टिपिकल शंकालु , घरेलू ..लड़ाकू पत्नी नही बनना , अपने इस उसूल पर कायम रहीं मैं । आखिर एक पढ़ी लिखी स्त्री का मान सम्मान या स्वाभिमान भी तो कुछ होता है न । धीरे धीरे ऐसा समय आन धमका जब योगेश नौकरी से रिटायर होकर समय के विशाल आकाश के साथ हरदम मौजूद रहते , लो , कर लो तफरीह , जिसके संग जो करना सो करो न , मगर एक बार वक्त जो गुजर गया सो वेग से आती लहर की तरह जो धार गई सो गई फिर वह आतुर वेग , संवेगों की सघनता या भावनाओं की उछाड़ पछाड़ नही रह जातीं , बस एक सी सदानीरा नदी की तरह थिर होता गया जीवन । 

कहां तो वो दौर जब उनके मुवक्किल के हर फोन को योगेश चैक करके ही मुझे पकड़ाते और कहां ये किे मेरी ही सगी बहन मेरी छाती पर पैर टिका अपना करियर आगे बढ़ाने का मकसद पूरा करने में जुटी थी और उसके पति , निखट्टू , नाकारा इंसान जिसे समय ने किस कदर फालतू बनाकर जीरो साबित कर दिया था। चूंकि उसकी प्रेक्टिस चल नही पायी सो वो योगेश के कंधे पर चढ़कर अपना मतलब साधने पर उतारू था । हड़बड़ी में मैं वकालत छोड़ बच्चों संग ललितपुर निकल गयी , वकालत छोड़ने पर जाहिरा तौर पर योगेश ने खुशी जरूर जतायी मगर तब तक शायद बहुत देर हो चुकी थी। योगेश बहन संग संलिप्त होते  गए । शुरू में किसी जासूस की तरह कभी कभी योगेश की हर गतिविधि पर निगाह रखती या उनके फोन पर कान गड़ाए रखती तो कभी उनकी बातचीत की चीरफाड़ करने लगतीं। उनका ध्यान अपनी तरफ खींचने की बेवकूफाना बचकानी हरकतें करने लगतीं। फिर किसी बात पर योगेश को टोकने पर बोले –

 ‘ प्रेमा ,  हमारी आपस में ज्यादा निभ नही सकती , कहो तो मैं अपने गांव चला जाऊं या फिर किस तरह हम अलग अलग रह सकते हैं , तुम ही निकालो कुछ अलग रहने का रास्ता ., सुनते ही आंखें भर आईं  , उनके इस  रूप के बारे में कभी सोचा तक नही था , कितनी तटस्थता बरत रहे थे जैसे किसी अजनबी से बतिया रहे हों फिर मैने पूछा – आप रह लेंगे मेरे वगैर ? कौन ध्यान रखेगा आपका ? आपके खाने पीने या सेहत का ?’

‘ कितनी गलतफहमियां पाल रखीं हैं तुमने,  भई वाह , क्या कहने ,  कहते हुए वे हंसने लगे।

उन जानलेवा पलों के गुजर जाने के इंतजार में मैं चुप साधे रहीं मगर ऐसे पल गुजरते नही बल्कि घुन्न घुन्न करते ऐसे बरैयां बनकर आसपास मंडराने लगते जिनका छत्ता टूट गया हो और वे बौराकर आक्रामक होकर आपको अपनी जद में ले लें फिर आप चाहकर भी बाहर न निकल पाएं। योगेश की बात सुनकर ऐसा लगा जैसे एसी से बाहर निकलते ही किसी ने गर्म पानी भरी बाल्टी सीधे सिर के ऊपर उड़ेल दी हो , ये , ये क्या कह रहे हैं , वो भी इस उम्र में अलग अलग रहने का औचित्य ? पेचीदा सवाल रह रहकर बेचैन करने लगते। ये कैसा पजल है जो बढ़ती उम्र के साथ सम पर नही। सालों से मैं योगेश के पीछे पीछे चक्कर काटतीं रहीं जबकि वे उसे हमेशा हाशिए पर सरकाते हुए किसी और के पीछे भागते रहे। तो क्या  हम दुविधा या भ्रम मे जीने के लिए अभिशप्त हैं ?

हम अक्सर सच को झुठलाते रहते , न , ये पूरा सच नही , कुछ और होगा जबकि सच को झुठलाना यानी एक बार फिर खुद को भ्रम में डालना जबकि सचाई चीख चीखकर अपने होने का अहसास करातीं रहती मगर अपनी ही धुन में मगन हम उसकी सत्ता स्वीकारने का साहस नही कर पाते। इतने बड़े भ्रम में क्यों जीना चाहते हम ? सच की दीवारें ठोस व स्थायी होतीं हैं मगर हममें से कोई ये मानने को तैयार ही नही कि हम अकेले ही जीने मरने के लिए बने हैं फिर भी क्यूंकर जकड़े हैं हम इन दिखावटी रिश्तों में ? इन भ्रमों के सहारे जीने की शायद आदत पड़ जाती हैं हमारी। तभी तो ‘ बकवासवाजी बंद करो , बहुत हो गया ये सब , बात करने की जरा भी तमीज नही तुममें तो हमीं क्या बात करें ? ‘ सुनकर वो चुप रह गई। आखिर क्यों लपलपाती स्त्री की तरह दुम हिलाते जाती रही वह अपने पति के पास ? जरूरतों के सिरे हमेशा दोनों तरफ से बराबरी से जुड़ें तभी जुड़ते हैं वरना किसी के पीछे पड़कर उसे पा लेने या उससे अपना सुख दुख बांट लेने से ऐसा आखिर क्या मिल जाता है जिसे पाने की आस में हम ताजिंदगी पगलाए रहते। इतनी उम्र बीतने के बावजूद फिर से भ्रमों का चंदोवा बार बार तानना चाहते हम , आखिर क्यों ?

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प्रतीकात्मक चित्र गूगल से साभार

सिया , कुछ तो बोलो , चुप क्यों हो गईं ? ’

‘ जुगनू पकड़ने के चक्कर में ऐसे ही धम्म से गिरती रहेंगी , जुगनू कहीं पकड़ में आते हैं ?’

‘ पहेलियां मत बुझाओ , साफ बात करो । ‘

‘ बुरा मत मानना प्रेमा , प्रेम सूरज की रोशनी बनकर आता है जो हमेशा जगर मगर करता तुम्हारे आंगन में जैसे हर सुबह सूरज की रोशनी से भर जाता जीवन, पानी को इतना मत उछालो किे उसके बुलबुलों में तुम्हें अपनी छांह ही नजर न आए । खुद के लिए शांत मनस्थिति में जीने की राह तलाशो। एक बात बताएं , नए नए रोमांस उम्र के हर मोड़ पर थ्रिल या उत्साह से भरते हैं  . .

‘ तो क्या योगेश उसी प्रेम में . . .

‘ फसल तभी लहलहाती हैं जब उसे भरपूर हवा पानी  मिलता रहे , मेरा मतलब . . . वैसे तुम अन्यथा मत लेना। अभी उनकी बातें चल ही रही थी किे सिया का फोन आ गया और वे चंद मिनट बाद अलग रास्ता पकड़ चली गईं।

सचमुच , रिश्ते रेशम से भी नाजुक होते हैं , हाथ में लेते ही फिसल जाने वाले , यूं ही कहीं रखकर भूल जाने पर उलझ जाने वाले , संभालकर न उठाओ तो अगले ही पल गांठ बन जाने वाले , विचित्र किेंतु अनिवार्य सचाई है कि रिश्तों के वगैर जीवन जीवन नही रहता यानी सबसे कीमती , सबसे यूनीक अहसास मगर सबसे ज्यादा केयरफुल हैंडलिंग । यह जानते हुए भी कि कोई उसके कोरे कैनवस पर रंग नही भर सकता फिर भी वह नायाब रंग देखकर क्यूंकर पाने के लिए उतावली हो उठतीं ? किस तरह की आतुर प्यास है ये कि वह पगलाई हिरणी की तरह सच्चे प्रेम की आस में यहां वहां भटकती रहतीं जबकि हरेक को वही तो चाहिए सो कोई कैसे बख्स देगा उसे वो सब ?  गहन सोच में डूबी प्रेमा को चुप देख सिया ने टोका – ‘ क्या सोच रही हो ? ‘

 

 

‘ कुछ नही , बस ऐसे ही . .

‘ इस अहसास को भ्रम मानो या हकीकत , पर इसे दोनों ही अतिवादी छोरों पर खींचने की जरूरत नही । ऊपर से जो दिख रहा होता है , अक्सर वो पूरा सच नही होता।  अंदरूनी जीवन के अंधेरी परतों तक की यात्रा करने पर अलक्षित कोने में कहीं जल रहा होता है प्रेम का दीया जिसकी रोशनी के तलाश में न जाने कितने पल पल उमगते , छटपटाते रहे। कई बार तो उम्र भर किसी को पता ही नही चल पाता कि बाहर ऊपर से हंसने वाले के भीतर कितना जहर भरा है मगर कहीं तो होता है रस का केंद्रक जहां पहुंच पाना मुमकिन कहां  ? जिसने ऐसी कोशिशें कीं वे उम्र के इस आखिरी मोड़ पर प्रेम की हकीकत को हजम ही नही कर पाते ओर जब पता चलता है तो इस धक्के से वे उबर ही नही पाते । ये न रहे तो सब सिफर यानी इस अहसास को बड़े जतन से संभालने की कला साधनी होगी वरना . . .  ‘  इस मोड़ पर प्रेमा ने खुद को सवालों से घिरा पाया । रिश्तों के चुकते जाने का दर्द किसी एक को ज्यादा होता है तभी तो अनुभूतियों की तीव्रता जुदा जुदा। तभी तो एक ही स्थिति में कोई चैन से सो लेता है तो दूसरा रतजगा करता रहता। वैसे भी स्त्री की भावुकता को जी का जंजाल कहने से गुरेज नही उन्हें ।

तो क्या वे योगेश के अलक्षित कोनों तक पहुंच पायीं ? वे भी तो हमेशा चुप चुप रहते या फोन लेकर छत पर चले जाते , अकेले में टहलते हुए रस से पगे मुस्कराते इंसान के भीतर बसे मन तक पहुंचने की कभी कोशिश की ?

 ‘ पुरूष  तो स्वभाव से दिलफेंक या फलर्ट करने वाले होते हैं , नही ? ’

‘ सिया , जैसे नेक व चरित्रवान स्त्रियां दुर्लभ होती जा रही हैं , वैसे ही सब जगह मूल्येां का पतन हुआ है , बचे खुचे होंगे ऐसे लोग जिनकी गिद्ध नजर किसी स्त्री पर न पड़ी हो । दूसरी बात , क्या  किसी से एक बार हुआ प्रेम ताजिंदगी वैसा ही बना रहता होगा ? ‘ किसी आतुर बच्ची की तरह प्रेमा ने सिया के सामने अपनी बात की प्रतिक्रिया जाननी चाही ।

‘ कह नही सकती , कुछ सवालों के जबाव गुजरते वक्त पर छोड़ देना चाहिए जैसे किसी तालाब या पोखर का पानी बदलते मौसम के मिजाज से सूखता या सरस होता रहता है तभी अचानक कोई नई धार उमगती भी है। सूखा देखकर लगता जैसे उमगने की सामर्थ्य ही चुक गयी , यहां तक कि तलछट पर सब कुछ सूखा सूखा नजर आता है मगर पलक झपकते ही मौसम बदल जाते कि अनायास फिर कोई नई धार उमगने लगतीं ऐसे वेग से कि समूचा सूखापन फिर से हरीतिमा में तब्दील होने लगता , तो प्रेम के रूप बदलते खूब देखा है मैंने . . । ‘

सिया के मुस्कराते चेहरे को वह ध्यान से देखती जाती , सोचने लगती , सोचते हुए अपने ही जीवन की प्रतिच्छायाएं साफ साफ तैरती दिखने लगीं ।

‘ सिया , तुम्हारी बातें सुनकर तो अजीब तरह की बेचेनी सी होने लगीं । मान लो , हमारे जीवन में ऐसे लहलहाते पौधे रहे हों लेकिन वो किसी और को दिखें ही न तो  ? उन तक कैसे पहुंचा जा सकता है  ?’

‘ देखो , साफ बात है , किसी के रोकने से न तो वो प्रवाह थमेगा , न रूकेगा बल्कि बहुत गहरे हाथ डालकर देखना चाहोगी तो तलछट पर जमी गीली मिट्टी से खुद के हाथ कीचड़ में सान लोगी। ज्यादा गहरे जाने पर डूबने का अंदेशा तो हर वक्त लगा रहेगा सो , बहुत सी कड़वी हकीकतों के भीतर धंसकर गहरी अंधेरी परतों में जाने की कोशिश क्यों की जाए  ? वैसे भी ऐसे जोखिम भरे अनजान एरिया में जाने के अपने खतरे हैं , पता नही कब कौन सा अनहोना हादसा घट जाए जिससे तुम ताजिंदगी उबर ही न पाओ , तो  ? ‘

‘ हूं . . . लंबी सांस खींचते हुए वक्तृता में माहिर प्रेमा की बोलती एकदम से बंद हो गयीं। जब मन दुखी हो तो आसपास हंसते लोग विचित्र किस्म का अट्टहास करते जान पड़ते हैं ,  सिया को हंसते देख वो चुप हो गयी और उनका संवाद भी ठहर गया जैसे । दिन भर की देश देशांतर की सुदूर यात्राएं तय करके ठंडा पड़ा सूरज अब नीचे उतर खोह में उतरने की तैयारी करता नजर आया। क्षितिज के पार दिखती बड़ी सी नारंगी बॉल में तब्दील सूरज को अचानक जैसे किसी ने पाताल लोक से हाथ बढ़ाकर लपक लिया हो । पलक झपकते ही रॉशनी की रेखाएं छोड़ता सूरज आसमान से नदारक था जबकि म्लान मुरझाया पड़ा चांद अपनी मटमैली नीली चादर में सुस्ता रहा टेढ़ा मुंह कर जाते हुए सूरज को ऐसे देख रहा था जैसे उसे रात की बागडोर संभालने की कोई जल्दी नही । अरसे से मुस्तैदी से ड्युटी करते करते चंद्रमा का तन मन रूटीन काम से उकताहट से भर गया सो बेरूखी से अलसाया पड़े चांद पर उचटती नजर डाल दोनों सहेलियां तेजी से अपने अपने घरों की तरफ मुड़ गयीं । बस एक सिया ही है जिसके सामने कुछ भी बोलने की सहूलियत मिली है वरना कितनी अकेली पड़ गयी मैं उम्र के इस मोड़ पर । योगेश के अफेयर्स से ध्यान  हटाकर अनायास मेरी चेतना अपने अतीत की तरफ मुड़ती गयी ।

( सालों पुराने बंद पड़े बक्से  की चाबी हाथ लग गयी ? आखिर ऐसा क्या था उसमेंथा भी या ?)

प्रेमा को घर साफ करके हर चीज को चमका चमका कर करीने से रखने का खूब शौक था। यहां तक कि उसका ये शौक कभी किसी हद तक धीरे धीरे जूनून में बदलता गया । गृहस्थी के खटराग में खुद को अनासक्त भाव से खपाने की हर संभव कोशिश करतीं जरूर मगर योगेश उनके प्रति उतने ही लापरवाह बने रहे । वे बड़े मनमौजी या खिलंदड़ी मनोवृति के चलते जब जो जी में आए करके खुश हो लेते । हर हाल में खुश रहते योगेश के जीवन में जरूर कुछ न कुछ रहा है किे वे हर पल योगेश से जुड़ी हर घटना के सुराग का पता लगाने के लिए आतुर हो उठीं।

अनायास उनके भीतर सालों पुरानी घटनाएं बड़ा आकार लेकर सिर उठाने लगीं जब वे पूरी ताकत से उलझते रिश्तों के तारों में बुरी तरह फंसती  गयीं तो उनके भीतर से आवाज  आईं – किसी पोखर में छपर छपर करके जब पानी मच जाए , ऐसे में कुछ भी कैसे दिखाई देगा  ? कुछ समय के लिए शांत हो जाओ । धीरज से सब कुछ ठंडा होने दो फिर अपने आप उसमें अपने वजूद को देख पाओगी । दाएं बाएं गोल गोल हवा का तेज झोंकों के बीच हिचकोलें खाता यादों का जहाज । नीचे ऊपर , बाएं दाएं , चारों तरफ थे बादलों के गुच्‍छे , ढेर सारे रूई के पहाड़ या बादल बनते पहाड़ , धरती से ऊपर जाहकर छूते है आसमान का विस्‍तार जहां से धरती कित्‍ती छोटी नजर आती । ऐसे में वृहदाकार आइना बन गये थे  असंख्‍य बादल। फिर क्‍या था , जैसे जैसे हम आगे बढ़ते जाते , वे पहाड़नुमा बादल टूटटूटकर बिखरते जाते। मन के आसमान पर छाए विरल रंगों का दुर्लभ संयोग पलक झपकते ही कुछ और आकार प्रकार ले लेते। यादों के मटमैले भूरे रंग मन पर अपना सौंदर्य बिखेर देते मगर पलक झपकते ही सब कुछ पकड़ से बाहर उड़नछू हो जाता गोया विगत के बादलों को अचानक किसी ने बेरहमी से धुन दिया हो। तो क्या वे खुद को कभी ठीक से देख परख पाईं  ? जिंदगी धीरे धीरे आगे सरकती गई।  बच्चे बड़े होते गए फिर एक दिन वे भी साथ छोड़कर अपने नए कुनबे में सैट होते गए। योगेश अपने पेशे में रमते गए और वे रह गयीं सबसे पीछे , उनकी अपनी ही परछाईं छोटी होकर सिकुड़ती सिमटती गई।

सहपाठी ब्रजमोहन की बातें याद आने लगतीं – जब परछाई बड़ी होने लगे तो समझिए सूरज डूबने वाला है । ब्रजमोहन कविताएं लिखता और मौका मिलते ही प्रेमा को अपनी कविताएं सुनाता भी। लैब में घंटों साथ काम करते हुए हमारे बीच नेह के अंकुर फूटने लगते मगर ऐन मौके पर भीतर के अदृश्य ताले खुलते ही नही। रिश्ते कितने रूपों में सामने आते , वे घोड़ों की टापें अभी तक कानों में गूंजती हैं जैसे कल की ही बात हो । वे ब्रजमोहन संग बातों में ऐसी खोयीं किे पता ही नही चल पाया , वे कब कैसे कॉलेज कैम्पस पार करके सड़क पर निकल आए , जब आंखें फैलाकर चारों तरफ देखा, गहराते अंधेरे में विलीन हो गए थे इतने सारे रंग बिरंगे बादलों के टुकड़े – ‘ कमाल है , हम इतनी दूर निकल आए , ‘ ब्रजमोहन की चिंतातुर आवाज सुनकर वे मुस्कराने लगीं तभी अचानक प्रकट हो गए दो घुड़सवार फिर उन्हें घूरते हुए पूछने लगे – ‘ यहां क्या कर रहे तुम लोग ? नाम बताओ जल्दी से ? चलो , दोनों को सीधे प्रिंसिपल के पास ले चलते हैं , साले इश्क फरमाने आए हैं ‘  .. सुन्न कर देने वाले हंटरनुमा बोल हमारी खाल उतार देने पर आमादा थे । भौंचक्की बनी ऐसे ताकने लगी  गोया ये घुड़सवार साक्षात यमराज बनकर उनके प्राण लेकर ही टलेंगे.

‘ भैया , हमें वाकई पता नही चल पाया , माफ कर दो . . ; लटपटाती जुबान में इतनी दयनीयता न जाने कहां से आ गयी। वे वाकई ये सोचकर नर्वस होने लगीं किे कहीं ये बात भैया तक पहुंच गयी तो हमें कहीं का नही छोड़ेगे वे , न जाने क्या गत बना डालेंगे , हे भगवान . . ; वे मन ही मन भगवान को सुमिरने लगी। ब्रजमोहन ने सतर्क नजरों से घुड़सवारों को देखा फिर हिम्मत बटोर कर पूछा – ‘ आप हमारे कैम्पस में किसलिए ? हमारे पास तो पहचान पत्र है मगर आप कौन ? ’ फिर चौकस होकर देखने लगा आसपास।

‘ अरे , ये तो गज भर की जुबान भी रखता है . ; कहते हुए उन्होंने हंटर को हवा में लहराते हुए प्रेमा की तरफ खा जाने वाली भूखी नजरों से देखा तो वह दोनों हाथ जोड़े कंपती डाल की तरह हिल रही थीं। कैसा तो जानलेवा पल था वो लग रहा था जैसे रेप हो जाएगा उसका , सोचते ही रूलाई फूटने लगी थी तभी कहीं से दो लड़के आते दिखे तो ब्रजमोहन लपककर उनके पास पहुंचा , उन्हें साथ लेकर लौटा तब तक वे घुड़सवार न जाने कहां फुर्र हो गए । बस उसी दिन से प्रेमा ने गांठ बांध ली , कहीं भी , कभी भी ब्रजमोहन के साथ अकेले नही आना जाना,  चाहे जो हो जाए। तभी से वह सहमी सहमी सी रहने लगी और फिर कभी पलटकर ब्रजमोहन से मिलने की हिम्मत नही जुटा पाई। बेचैनी और ऊहापोह में ही सारा समय निकल गया। कितना खूबसूरत समय था वो , लगता था जैसे वे किसी धुंध भरी लंबी यात्रा पर चल रही थी। मन करता , ये धुंध भरी सफेदी यूं ही छायी रहे , पलकें मुंदी रहें उसी धुंध भरी लंबी राह पर मगर ;;;

 घर वालों का ऐसा आतंक किे कोई भी फैसला लेने की हिम्मत ही कहां ? सच में , घोड़ों की वे टापें अभी भी याद है । वो दिन और आज का दिन , बस वही एकलौती मगर अनूठी मुलाकात की याद सालों से जेहन में कैद है। कुछ कहने के लिए शब्द छटपटाते  मगर इजहार वे नही कर पाईं । तब की मर्यादाओं की लौह जंजीरें तोड़ने का साहस जुटाना आसान कहां था ? समय ने फिर करवट ली और सीन बदलते गए। 

वे आज भी कहां खुलकर अपना प्रतिरोध दर्ज करा पातीं  ? योगेश की एक तेज आवाज से दहल जातीं । शब्द तो हमेशा कंठ तक आकर फंसे फड़फड़ाते रह जाते । योगेश के धारदार तर्को से उनका वजूद ढहने लगता , मैं और मेरा परिवार , मैं और मेरे मूल्य , मेरा त्याग , संघर्ष , योगेश के अनगिनत किस्से उनकी पिटारी से हर रेाज सांप बनकर निकलते , उसे डराते। वे लाख जतन करके दाएं बाएं निकलने की कोशिश करतीं मगर वे फन काढे जहरीली जीभ से प्रेमा को घेरकर बहस विवाद झंझट पैदा करते । हर बार वे उनके फेंके जहरीले बहसों के जाल में फंसी दुख के समुंदर में फड़फड़ाते रहने को विवश थीं। वे लड़ती , बहस करतीं मगर फिर भी योगेश के प्रति उनका एक तरफा प्रेम पूरे खम के साथ टिका हुआ था । प्रेमा इस गुमान में किे उनके वगैर योगेश अकेले नही रह पाएंगे जबकि हकीकत कुछ और ही थीं –

साभार गूगल से
प्रतीकामक चित्र गूगल से साभार

‘ पता , कितने फैंस हैं मेरे , कितनों की निस्वार्थ मदद करता रहता , कि इसी शहर में मुझे पॉलिथिन के खिलाफ अभियान छेड़ने के लिए बैस्ट सिटीजन का अवार्ड मिल चुका मगर तुम्हें क्येां  सुना रहा हूं ये , तुम क्या जानो इनकी अहमियत ? ‘

‘ मगर इससे क्या हुआ ? लोगों में कहां आ पाई अवेयरनैस ?  वो मकसद कहां पूरा हो पाया ?’

‘ प्रेमा , आखिर मेरी तारीफ क्यों नही सह पाती तुम मेरी ? किस कदर औरताना जलन भरी है तुममें ?’

‘ ऐ , इस तरह के तोहमत मत लगाइए , आखिर मेरा भी आत्मसम्मान है ,  . .

हो हो करके हंसने लगे वे –  ये तुम जो घंटों सुडोकू भरती रहती हो , उससे क्या होने वाला ? कुछ नही कर सकती तुम , रहेागी वही की वही , घरेलू औरत। ‘

‘ क्या , क्या रहूंगी मैं , अचानक वे तैश में आ गई – याद रखना , आप ही की वजह से कचहरी आना जाना छूटा मेरा , वरना कितनी शानदार प्रेक्टिस चल रही थी मेरी , याद है न वो दौर ?’

‘ गलतफहमियों पालने का खूब शौक है सेा जरूर पालो , किसने रोका है ?’

‘ कभी तो सच बोला करिए आप भी ,. . उनके बीच आए दिन किसी न किसी मुद्दे पर बहस छिड़ जाती।

‘ इतनी जल्दी क्यों लौट आयीं मायके से ? कुछ महीने और रहतीं न वहां ?’

’ अपना घर अपना होता है , ऐ , ऐसे क्यों कह रहे हैं ? कहीं मेरे आने से आपका कोई सैट प्रोग्राम तो नही गड़बड़ा गया ?’

 ‘ तो ? क्या लेना देना मेरे जीवन से तुम्हें , हुंह , मेरी समझ में नही आता , आखिर तुम चाहती क्या हो , दिन भर कोई काम तो है नही , बच्चे दोनों बाहर हैं सो दो जन का कितना खाना ? जिसके लिए तुम दिन भर खटने की नौटंकी करती हो , देखो तुम नही थी तो हमारी जिंदगी ठीक ठाक चल तो रही थी न , इनफैक्ट नो प्रॉब्लम . . . प्रेमा का वजूद ढहाने का कोई मौका वे कतई नही छोड़ते बल्कि अक्सर अपने धारदार तर्को से सीधा वार कर बैठते जिसका प्रतिकार करते हुए वे बौखला जातीं और अक्सर शुरू हो जाते उनके तर्क वितर्क या कुतर्क के सिलसिले ।बाहरी लोगों से बतरस के शौकीन योगेश उन्हें छोड़कर सबके लिए प्रिय बने रहते । कितने समय बाद वे ये राज जान पायीं किे लड़कियां या औरतें ही उनकी कमजोर नस है , सोचकर आज भी उतना ही दुख होता । हर बार दुख की शक्ल नयी सी क्यों लगतीं  ? क्यूं हर बार उतना ही तेज दुख का अहसास होने लगता जैसे पहली बार हुआ था जब येागेश के पत्र मिले थे उसे बक्से में । सचमुच , एक दुख अपने साथ कई दुख लेकर धड़घड़ाता चला आता । दुख की बारंबारता से हमारी खाल में मोटी ठिट्ट क्यों नही पड़ जातीं जैसे एक ही जगह इंजैक्शन लगाने पर पड़ जातीं यानी हम दुखों के आदी क्येां नही हो पाते  ? हर बार का दुख कई सवाल लेकर आता मगर अंदरूनी अंर्तदृष्टि भी देता है दुख मगर हम है कि उसका मुकाबला न करके पलायन करना चाहते ।

सालों पहले मायके जाने पर ब्रजमोहन से मुलाकत हो पायीं एक शादी के मौके पर । उन्हें ये जानकर ताज्जुब हुआ कि उसने शादी ही नही कीं । बार बार पूछने पर बस इतना भर बोल पाया – ‘ प्रेमा , सामाजिक बंधनों में बंधने के ढकोसले पसंद नही थे , बाकी तुम जानती हो । ‘

अवाक , स्तब्ध रह गयी वो उस कृशकाय ब्रजमोहन को देखकर । इसने इतना बड़ा फैसला लेलिया और उसे सालों साल इसकी खबर तक नही । उसके अकेले पड़ते जाने की पीड़ा से वे सुलगती रहीं । फिर पूछने लगीं – ‘ करते क्या हो , किसी सरकारी दफ्तर में होगे  ?’

‘ नही , लीक से हटकर काम करने का जुनून था और अपुन का कोई परिवार तो सिर पर था नही सेा कुछ भी करके जीने के लिए आजाद था। तुम जानती हो , कविताएं लिखता था , धीरे धीरे वही पेशा बनता गया। मेरी छोड़ो , तुम खुश तो हो न  ?’

अचानक से जबाव नही दे पायीं वे। गहरी चिंता में पड़ गयीं । अनजान अपरोधबोध जकड़ने लगा उन्हें । क्या वाकई ऐसे लोग होते हैं जो भावुकता में कहीं बातों को पूरा सच मानकर अकेले में जीने का साहस जुटा लें ।

‘ प्रेमा , तुम मानो या न मानो मगर मैं ताजिंदगी तुम्हें चाहता रहूंगा। अब इस जन्म में तो किसी और को नही अपना सकता . . . रूंधे कंठ से तब सालों पहले किशोरवय में उचारे गए बोल वह  अपने जीवन में  हू ब हू उतार लेगा , इतनी दूर तक वे यकीन नही कर पायीं तब और बस उससे हाथ मिलाकर बिना कुछ बोले वे तेज कदमों से सूनी सड़क पर अकेले ही निकल आयीं थीं ।

आज भी वही सूनी सड़क है , वही पगडंडियां हैं , कही भटकता हुआ ब्रजमोहन भी हैं मगर समय ने हमारी सूरतें बदलकर हमारे जीवन को बुरी तरह खर्च कर डाला हैं । अब बचा ही क्या है हमारे पास  ? सोचते हुए वे सिया के पास जाने की सोच ही रहीं थी कि सामने से मोबाइल पर तेज तेज बतियाती सिया अपनी ही धुन में न जाने किससे बतियाते चली जा रही थी ।

‘ क्या बोल रहे हो  ? जानते समझते भी हो , अब इस उम्र में , बेकार की बातें मत करो , एक साथ चलेंगे कहीं झारखंड के जंगलेां में मेरे साथ महीने भर रहकर जी लेना चाहते हो , ऐ , . . रौ में बोलती सिया की नजरें प्रेमा से मिली तो अचानक से मोबाइल का बटन दबा दिया ।   

   – ‘ ऐ , किससे बातें करके इतना चहक रही थीं  ? ’

‘ है कोई .. मुस्कराहट अभी भी उनके होठों पर तैर रही थी मगर वे तह तक जाने के लिए अकुलाने लगीं ।

‘ प्रेमा , एक बात की गांठ बांध लो , समय किसी के लिए नही रूकता , सो सारे फैसलों की बागडोर खुद लेनी पड़ती है। हमारा एक खास दोस्त है जिससे हमारी अच्छी शेयरिंग हैं । एकरस जिंदगी से ऊबे मन में हंसी के छीटे की तरह होती हैं ये दोस्तियां जहां हम दोस्ती को निश्छल भाव से नरिश करते हैं बस . . ; आगे कुछ और कहने के लिए उन्होंने उनकी तरफ ध्यान से देखा फिर कुरेदने लगीं – ‘ आपको नही मिला वैसा दोस्त , साथी जिसे  अपना सब कुछ उड़ेलकर  घड़ी भर के लिए छोटी सी उड़ान भर ली जाए , मैं विश करूंगी कि आपको भी . . . ‘

‘ सिया , सिया , अगर ऐसी वैसी बात फिर कभी मेरे लिए सोची तो , हां , बनावटी गुस्सा दर्शाते हुए वे मुस्कराए जा रही थीं ।

क्या ये पूरा सच था  ? घर आकर वे देर तक अपने ही सवालों से जूझती रहीं । अपने पसंदीदा खेल सूडोकू पर अटकी थी आंखें मगर अंदरूनी शोर चैन से जीने नही दे रहा था । सचमुच समझदारी आने पर वो सुकुमार अहसास न जाने कहां किस खोह में बिला गए । इससे बेहतर तो वे तब थी जब धुंध भरी राह पर अपनी ही धुन में चली जा रही थी अकेले अकेले , वक्त ने उन्हें शताक्षी बना दिया। इतनी समझदारी भी किस काम की कि वे अब मुंदी पलकों से नही बल्कि एक साथ कई आंखों से दूर तक बिखरे सच को देख पा रही हैं।

‘ प्रेमा , प्रेमा , कहां खोयी हो , इस मेज केा यहां से वहां खिसकाते वक्त इसका पाया टूट गया और मेरा पैर भी दब गया , देखो तो . . . दर्द से कराहते योगेश को सहारा देकर वे बिस्तर तक लायीं मगर लेटते ही वे पूर्ववत फोन बतरस में डूब गए । वे वहां कहीं थी , नही , वे कहीं और थीं , पता नही किस भंवर में कहां किस तरफ डूबी थीं वे , उधर फोन बंद होते ही योगेश फिर जोर जोर से बुलाने लगे – ‘ प्रेमा , ओ प्रेमा  , बहुत तेज दर्द हो रहा है , प्रेमा , ओ प्रेमा . . कहां हो  ? दौड़कर आओ , फटाफट  हल्दी  डला गर्म दूध लाओ । ‘ योगेश की इन कराहती आवाजों से बेखबर उनका मन तो ब्रजमोहन के उस एसएमएस की तरफ अटका था जहां लिखी पंक्तियां बार बार पढ़कर वे मुदित मगन हो रही थीं – ‘ हम अभी भी उतनी ही शिद्दत से तुम्हें याद करते हैं , प्रेम , बुरा मत मानना , एक लंबे अंतराल बाद तुमसे अपने दिल की बात कहने का हौसला जुटा पाया हूं , तुम अपनी प्रैक्टिस फिर से शुरू कर दो प्लीज । तब की कही सालों पुरानी तुम्हारी बातें आज तक नही भूल पाया हूं –‘  घरेलू खटराग में नही पड़ने वाली मैं , हां , मैं अपने करियर के लिए कुछ भी करूंगी। ‘ तुम भले ही ये बात भूल गयी हो मगर मैं चाहता हू कि तुम अभी भी प्रेक्टिस दुबारा शुरू कर सकती हो , तभी तुम अपने लिए जी पाओगी और उतना तेज हंसोगी भी । उम्मीद है , इस बार मना नही करोगी । तुम्हारे पास कूरियर से कुछ जरूरी कागजात भेज रहा हूं । उम्र के इस मोड़ पर तो मना तो नही करोगी न ?  आखिरी बार , हां प्रेमा , ये प्रस्ताव, —- सब छोड़छाड़कर बस चली आओ  . .

बार बार इन पंक्तियों पर उनकी आंखें ऐसे चिपक गयीं गोया मधुमक्खी को बड़ी मशक्कत के बाद किसी दुर्लभ जगह पर बमुश्किल शहद मिल पाया हो । उनका मन किया , वे जोर जोर से हंसने लगें , हंसती रहें और तेज बारिश में भीगते हुए ब्रजमोहन के संग फिर से जीना . . ; ये , ये , ये सब क्या सोचती जा रहीं वे ? सब जानते हुए भी वे ऐसा ही लगातार सोचती जा रहीं हैं, सोचती जा रहीं हैं। रह रहकर  वे अपने से सवाल करने लगतीं मगर बेकाबू दिल ने उनकी एक नही सुनी । वे छत पर जाकर बादलों संग हवा के झूलों संग झूलते हुए ब्रजमोहन के बंजर जीवन को एक बार में ही सरस कर देंगी , हां , हां ,  क्यों नही  ? अलग थलग पड़े ब्रजमोहन ने अपने जीवन में जीया ही क्या ? अब तो उसके बदरंग जीवन में हमें नए सिरे से रंग भरना है , बिल्कुल नायाब रंग , बेशक हम  ऐसा कर सकते हैं  , तभी नीचे से आवाजें सुनाईं पड़ीं सो वे झटपट सीढियों से उतरते हुए सोचने लगीं –  ‘ अरे , अरे , ये सब तो सपने में भी नही सोचा था कभी , फिर आज कैसे अचानक ऐसे खयाल ? इस अहसास की परिणतियां जानते समझते हुए भी वह एक बार फिर से प्रेम को पिछियाने के क्रम में पगलाई सड़कें नापने निकल पड़ती हैं तेज धूप में पसीना चुआती विकल नायिका बनकर। आकुल प्यास है कि बढ़ती ही जा रही हैं । गैस पर खोलता दूध उबल उबल कर आधे से भी कम रह गया था मगर उनकी नजरें तो दीवार पर उतरती हुई धूप के बीच अचानक शुरू हुई बारिश पर थमीं थीं । अरसे बाद इस अप्रत्याशित बौछार को मुस्कराते हुए देखकर उनका मन किया कि क्येां  न इन आड़ी टेढ़ी बौछारें  में भींगने का जमकर लुत्फ उठाया जाए  , सोचते हुए अचानक प्रेमा ने लंबे समय से जाम किचन की  खिड़की पूरी ताकत से खोल दीं । इस तेज बारिश में उनके अंग प्रत्यंग भीग रहे थे। उन्हें पानी में छप छप करते देख ऐसा लगा जैसे न जाने कब से वे भी तो बस इसी समय का इंतजार कर रहीं थीं कि कब ये जबरन लादे गए सालों पुराने जंग खाए आदर्शवाद का मुलम्मा छोड़ने का मौका मिले और कब वो अपनी ही कैदों से आजाद होकर मनमर्जी से उड़ान भर सकें।  हां , सचमुच , सालों बाद आज पहली बार उन्हें अपने सूखते जीवन में कोंपलें फूटने का अहसास गहराया। 

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