‘सीमा आरिफ़’ की लेखकीय सामाजिक सरोकारी प्रतिबद्धता उनकी रचनाओं की तरह बेहद गहरी होती जान पड़ती है | इन गहराती आशंकाओं के बीच प्रेमारोहण, उस मानवीय स्पर्श सा जान पड़ता है जो घोर अन्धकार और हताशा के क्षणों में भी आदिम को एक नई उर्जा से लबरेज़ कर देता है | कुछ ऐसा ही कोलाज़ है इन कविताओं में ……|
1- एक सन्पूर्ण कविता
सीमा आरिफ
जी में आता है
जी में आता है रात भर तुम
पर लिखती रहूँ
तुम्हारी तारीफ़ में क़सीदे
गड़ती रहूँ
कभी लिखूँ तुम्हारी खुरदुरी
हथेलियों पर पूरा कलाम
कभी लिखूँ तुम्हारी पीठ
पर लकड़ी के उस क़लम से
जो रोशनाई से है लबरेज़
उससे गिरने को बेताब है शब्द
मेरे मस्तिष्क के ख़ामोश कोने में
कभी लिख डालूँ तुम पर
पूरा एक व्याख्यान
और रात भर जलती रहे
प्रेम की वो डिबिया
जिसकी रौशनी में
दिखाई देती है मुझे
एक सम्पूर्ण कविता तुम्हारे
शरीर लिपटी हुई।
2-
मैं तुमसे विपरीत भी हूँ
मैं ज़िद्दी हूँ
घुन्नी भी हूँ
अपने सपनों
से खेलती
भी हूँ
बोये है कुछ अरमान
मैंने अपने स्वयं के लहू से
आत्मविश्वास से अब
जिन्हें अब सीचती भी हूँ
मुंहफट,बातूनी भी हूँ
गु्स्सैल,बेपरवाह हूँ
क़दमों के निशान
खीचें है आस्मां
पर इस दुनिया के
वैज्ञानिक,विचारक भी हूँ
मैं वो सब हूँ जो तुम नहीं हो
हाँ इसलिए मैं तुमसे विपरीत भी हूँ!
3-
सन्नाटें
यह सन्नाटें
यह मीलों लम्बी
खाली टहलती रातें
स्ट्रीट लम्पों को
घूरते घंटा घर की दीवारों
पर चिपके वो यूनानी दवा
के इश्तिहार
यह दुकानों पर लिखे
विज्ञापनों के भरमार
सड़कों पर फैली उदासी
और उनमें लिपटे
पुराने अख़बार
यह स्याह उजालें
अलसाए वादें
अटक गए हैं
दुनिया के शोर में
आओ निकालो इन्हें बाहर
और बिछा दो इनको
वस्ताविकता के धरातल पर