ISSN - 2455-2011
RNI - UPHIN/2017/74803

कैसी शिक्षा कैसा ज्ञान, भाषा पर है पूर्ण विराम|

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writer- Hanif Madaar

भारत विविधताओं वाला देश है यहाँ पर खान-पान, रहन-सहन और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के अलावा भाषाओं में भी विविधताएं देखने को मिलती है | अलग-अलग राज्यों कि प्रादेशिक भाषाएँ होने के बावजूद भी एक प्रदेश में भी अनेक स्थानीय भाषाएँ बोली जाती है | हर प्रदेश में पचास किलोमीटर पर भाषा बदल जाती है | इतनी सारी भाषाओं के बीच में से एक भाषा का चुनाव करना बहुत ही कठिन कार्य है | वैसे तो हमारे भारतीय संविधान में बाईस भाषाओं को मान्यताएं मिली है परन्तु शिक्षा के तौर पर हम तीन भाषाओं को सम्मिलित कर सकते है हिंदी, अंग्रेजी और प्रादेशिक भाषा |
हिंदी हमारी राजभाषा है और अंग्रेजी सहायक भाषा है | ये दोनों ही भाषाएँ केंद्र के कार्यों में समान रूप से इस्तेमाल की जाती है | राज्य अपने कार्यों को अपनी प्रादेशिक भाषाओं में कर सकते है | अब सवाल यह उठता है कि जहाँ अभी तक प्रादेशिक भाषाओं को शत –प्रतिशत रूप में शिक्षा व्यवस्था में शामिल नहीं किया जा सका है वहीँ 14 सितम्बर १९४९ को हिंदी को राज भाषा के रूप में संबैधानिक स्वीकारोक्ति मिली और हिंदी को भारतीय शिक्षा व्यवस्था में शामिल तो किया गया लेकिन वर्तमान तक आते आते उसे इस हीन भावना के साथ दर्शाया जाने लगा है कि इसका महत्व अंग्रेजी भाषा के सामने कुछ भी नहीं है | जब तक हम अपनी किताबें अंग्रेजी में न पढ़ना सीख लें तब तक हम सभ्य नहीं माने जाते है | और इसे सीखने का हमारे ऊपर दोहरा दबाब होता है एक तो विद्यालयों का दूसरे अपने बच्चों के भविष्य के प्रति असुरक्षाबोध से घिरे अभिभावकों का |

प्राइवेट विद्यालय जो कुकरमुत्तों की तरह हर गली-मोहल्ले में उगे हुए है | जो सभी विषयों को अत्यधिक अंग्रेजी में रटवाकर अपने आप को उच्च श्रेणी में खड़ाकर खूब पैसा बटोरना चाहते है | वहीं अभिभावक भी ज्यादा से ज्यादा अंग्रेजी की किताबें बच्चों के बैग्स में भरवाकर और अपने चमचमाते चेहरों के बल पर अधिक से अधिक नंबर दिलवाकर उन्हें सूटेड-बूटेड रूप में उच्च पदों पर देखना चाहते है | लेकिन इस सब के बीच में बेचारा एक विद्यार्थी वर्ग है जो बुरी तरह से हैंग हो चुका है | उसे किस भाषा में पढ़ना अच्छा लगता है या कोन सी भाषा सही तरीके से उसकी समझ में आती है यह किसी ने भी जानने का प्रयास नहीं किया है | आज तक हमारी सरकारों के पास ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जो यह तय कर सके कि आने वाले बीस सालों के बाद वह इस भावी पीढ़ी को कहाँ देखना चाहती है |

आज भी हमारे देश की आधी आबादी ग्रामीण अंचल में बसती है | जो अपनी आंचलिक भाषा को साथ लिए छोटे-छोटे शहर, कसबों की तरफ शिक्षित होने के लिए कदम बढ़ा रही है | वह कम पढ़ी-लिखी आबादी भी अपने बच्चों को अंग्रेजों की तरह देखना चाहती है | क्योंकि भारत शुरू से ही उपनिवेशिक देश रहा है | और आजादी से पहले यहाँ अंग्रेजों की हुकूमत थी जो आज तक उनकी भाषा के वर्चश्व के रूप में यहाँ देखने को मिलता है | वहीँ आज़ादी के बाद की हमारी सरकारों ने उपनिवेशिकता के लिए बड़े से बड़े दरवाज़े खोलने की दरिया दिली दिखाई |

उदारवाद के बाद निजीकरण और फिर विदेशी कंपनियों में नौकरी पाने के लिए अंग्रेजी भाषा की प्राथमिकता की मानसिक समझ से लोगों को लगने लगा कि अंग्रेजी भाषा सीखने से उनका और उनके बच्चों का भविष्य सुरक्षित है | अंग्रेजी सीखने से ही उन्हें अच्छी नौकरियां मिलेंगी | जबकि बढ़िया नौकरियां भाषा से नहीं अच्छे ज्ञान से मिलती रही है | और इस तरह का माइंड मेकअप कराने में हमारी सरकारों की भी अहम भूमिका रही है | नतीजतन हम ज्ञान लेने के बजाय सिर्फ भाषा में ही उलझे रहते है |

जहाँ एक पूंजीपति वर्ग अंगेजी माध्यम के महंगे स्कूलों में अपने बच्चों के पढने को कथित गर्व और आत्म सम्मान बनाकर मध्य और निम्न वर्ग को मुंह चिडाता है वहीँ एक निम्न या मध्य वर्ग के लिए यह बहुत बड़ी बात होती है कि उसके बच्चे भी अंगरेजी बोलना सीखे | जो खुद कभी भले ही न बोल पाए लेकिन अपने बच्चों को जरुर सिखाना चाहते है | उन्हें ऐसा लगता है, शायद इस भाषा के सीख जाने से ही उनके अच्छे दिन आयेंगे | इसके लिए वह भारी कीमत भी चुकाता है बावजूद इसके वे बच्चे जिनके लिए आंचलिक भाषा से हटकर हिंदी भाषा सीखना और उसके बाद अंग्रेजी के शब्दों को ढंग से उच्चारण करना ही बेहद मुश्किल होता है | जब तक वह थोड़ी बहुत अंग्रेजी भाषा सीखता है | तब तक वह हाईस्कूल या इंटर पास कर चुका होता है | इस दौरान उसने जितना कुछ पढ़ा होता है वह आधा-अधूरा ही उसके मस्तिष्क पर छपा रह पाता है | बारहवी तक का महत्वपूर्ण अध्ययन जो उसको एक अच्छी समझ दे सकता था वह उसे चिरपरिचित भाषा में न होने के कारण समझ नहीं सका | और जिसके कारण वह अपने जीवन में या राष्ट्रिय स्तर पर सरकारी सेवाओं के लिए आयोजित होने वाली प्रतियोगी एवं प्रवेश परीक्षाओं में भी उसका कोई उपयोग नहीं कर पाता, भले ही वह अकूत क्षमतावान ही क्यों न हो लेकिन महज़ एक भाषाई स्तर पर वह डिफीट खा ही जाता है | अगर यह सब उसकी अपनी हिंदी या प्रादेशिक भाषा में होता तो निश्चित ही वह न केवल उन परीक्षाओं को ही पास कर सकता है बल्कि उसेसे अपने जीवन और राष्ट्र के लिए कुछ नए और बेहतर रास्ते भी खोज सकता है |

अक्सर कहा जाता है कि विज्ञान के अनुसंधान करने के लिए हमारे पास किताबें अंग्रेजी में उपलब्ध होती है | इसलिए विज्ञान की जानकारी के लिए हमें अंग्रेजी को सीखना जरूरी है | अब यहाँ हमारी सरकारों की जिम्मेदारी है कि उन सारी किताबों का अनुवाद न केवल हिंदी में बल्कि हिंदी अंग्रेजी उर्दू फ़ारसी आदि भाषाई शब्दों के समावेश के साथ आम जनजीवन में बोली जाने वाली भाषा, (हिंदी) में अनुवाद कराएं चाहिए। साथ ही उससे सम्बंधित तमाम परीक्षाओं को इसी मिश्रित भाषाओं अलावा प्रादेशिक भाषाओं में आयोजित होना भी सुनिश्चित कराया जाना चाहिए जिससे विज्ञान में नए अनुसंधान के और भी रास्ते खुल सकें और वर्तमान सामाजिक व्यवस्था को भी समझने में मददगार साबित हो सके |

शायद इस पर कभी हमारी सरकारों ने सोचा तक नहीं है | यहाँ पर मैं न तो अंग्रेजी भाषा का विरोध कर रही हूँ न ही हिंदी की कोई ख़ास पक्षधरता बल्कि मेरा प्रयोजन भाषाई वहस की चिंतनधारा में, देश भर में शिक्षा और ज्ञान प्राप्ति भाषाई मजबूरी या भाषाई जटिलता की अतिरेकता से मुक्ति के रूप में एक और विन्दु को जोड़ने का प्रयास है | जो न केवल हिंदी बनाम अंग्रेजी के बीच हो बल्कि व्यापक रूप से इस बात भी विचार किया जाना चाहिए कि अंग्रेजी को बाधक मानते हुए हिंदी की शाब्दिक क्लिष्टता भी बाधा न बनाने पाए कि कहीं हिंदी मोह की अतिरेकता हिंदी को भी संस्कृत की तरह हाशिये पर न पहुंचा दे | अतः हमारा उद्देश्य तमाम भारतीय भाषाओं के साथ अंग्रेजी को भी मिलाकर एक ऐसी भाषा के निर्माण की ओर हो जो इस नई पीढ़ी को शिक्षा के साथ सही दिशा दे सकती है क्योंकि आज भी हम हिंदी के साथ बहुत से ऐसे अंग्रेजी के शब्दों का इस्तेमाल करते हैं जिनकी हमें हिंदी नहीं आती है या आती भी है तो बोलने में बहुत कठिनाई होती है । फिर भाषाओं के तौर पर तो हम जितनी भी भाषाएँ सीखे उतनी ही कम होंगी | बस हमें सोचना होगा कि देश भर की शिक्षा व्यवस्था में एक ऐसी भाषा के माध्यम से हमें इस भावी पीढ़ी को सीचना होगा जो बेहतर ज्ञान का भण्डार हो | वरना हम शिक्षा के नाम पर सिर्फ खोखली पीढीयाँ पैदा करते रहेंगे | जो सिर्फ मशीन बन सकती है | तार्किक नहीं |

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जन्म- 1 मार्च 1972, मथुरा, उत्तर प्रदेश |

कार्य स्थली – मथुरा, उत्तर प्रदेश |

लेखन- कहानी-  कहानियां ‘हंस’ ‘वर्तमान साहित्य’ ‘परिकथा’ ‘उद्भावना’ ‘वागर्थ, के अलावा ‘समरलोक, अभिव्यक्ति, सुखनवर, लोकगंगा, युगतेवर, वाड.म्य, लोक संवाद और दैनिक जागरण में कहानियाँ प्रकाशित ।

कहानी संग्रह- ‘बंद कमरे की रोशनी’ , रसीद नम्बर ग्यारह । लेख संग्रह – विभिन्न सामाजिक, राजनैतिक मुद्दों पर 25 लेखों का संग्रह (प्रकाशाधीन, सभी लेख हमरंग पर प्रकाशित)

मंचन – ‘पदचाप’ ‘चरित्रहीन’ ‘ईदा’ ‘उदघाटन’ आदि कहानियों का नाट्य मंचन | (कोवलेन्ट ग्रुप व् संकेत रंग टोली द्वारा )

समीक्षा-   सर्वश्री मनोहर श्याम जोशी, ‘बुनियाद’ ‘कुरु-कुरु स्वाहा’, कथाकार संजीव, ‘रह गईं दिशाएं इस और’, नासिरा शर्मा, ‘कुइंयांजान’ ‘खुदा की बापसी’ ‘जीरो रोड़’, मीराकान्त, ‘हुमा को उड़ जाने दो’, शुषम वेदी, ‘ज़लाक’  डा0 नमिता सिंह, ‘मिशन जंगल और गिनी पिग’ ‘लेडी क्लब’ ‘राजा का चौक’  आदि अनेक लेखकों की महत्वपूर्ण कृतियों की दर्जनों समीक्षाओं के अलावा नाट्य समीक्षाऐं उक्त सभी पत्र- पत्रिकाओं में प्रकाशित।

साक्षात्कार- नमिता सिंह (संपादक- वर्तमान साहित्य) डा0 के0 पी0 सिंह (आलोचक, मार्क्सवादी लेखक) जितेन्द्र रघुवंशी (राष्ट्रीय सचिव ‘इप्टा’) संदीपन नागर (रंगकर्मी, फिल्मकार) जितेन साहू (चित्रकार) के अलावा देश भर के अन्य अनेक (जो अब याद नहीं आ पा रहे) साहित्यकारों, कलाकारों, रंगकर्मियों के साथ विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक मुद्दों पर विस्तृत बात-चीत साक्षात्कार के रुप में अमर उजाला, दैनिक जागरण, परिकथा, वर्तमान साहित्य, सहारा समय, नटरंग के  अलावा अन्य विषेशांकों में प्रकाशित।

पत्रिकारिता. सहारा समय साप्ताहिक के लिए दो वर्ष सांस्कृतिक आलेख लेखन |

नाटक एवं नाट्य रुपान्तरण- प्रेमचन्द, (कफ़न, ईदगाह, पंच परमेश्वर)  मंटो, (टोबा टेकसिंह)  ज्ञानप्रकाश विवेक, (शिकारगाह) ओ हेनरी, (गिफ्ट ऑफ़ मेज़ाई) आदि की कई कहानियों का नाट्य रुपान्तरण ‘संकेत रंग टोली द्वारा मंचित।

सिनेमा-  ‘जन सिनेमा द्वारा निर्मित एवं ‘ज्ञानप्रकाश विवेक’ की कहानी ‘कैद’ पर आधारित हिन्दी फिल्म के लिए पटकथा एवं संवाद लेखन।

अन्य-   व्यंग्य, यदाकदा कविताऐं ‘डी0 एल0 ए0, दैनिक जागरण, और वर्तमान साहित्य में प्रकाशित।

सम्मान- ‘सविता भार्गव स्मृति सम्मान’ 2013 । विशम्भर नाथ चतुर्वेदी ‘शास्त्री’ साहित्य सम्मान २०१५  

संप्रति-   स्वतन्त्र लेखन और पत्रकारिता।

संपादन- www.humrang.com वेब पत्रिका, एवं ‘हमरंग’ प्रिंट पत्रिका)

सम्पर्क – कृष्णधाम कॉलोनी, बल्देव रोड़, यमुनापार, मथुरा, उ0 प्र0 

फ़ोन- 08439244335, 07417177177

email-hanifmadar@gmail.com

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