‘अवधेश प्रीत‘ अपनी कहानियों में सामाजिक समस्याओं को बहुत ही मार्मिक रूप में प्रस्तुत करते हैं. उनकी कहानियों में सिर्फ विमर्श ही नहीं होता है बल्कि भूत, भविष्य के साथ-साथ वर्तमान का भी एक प्रतिरूप नज़र आता है. उन्होंने अपनी लंबी कहानी “चाँद के पार एक चाभी” में भी बदलते समय के साथ विकासोन्मुख ग्रामीण परिवेश में एक विचारणीय सामाजिक कहानी को ही मूलभूत जातिगत समस्याओं के साथ प्रस्तुत किया है. …. |
चाँद के पार एक चाभी (कहानी)
लेखक- अवधेश प्रीत
जब वह मुझे पहली बार मिला था, तब हमारी दुनिया में मोबाइल का आगमन नहीं हुआ था। जब वह दूसरी बार मिला, तब हमारी जिन्दगियों में मोबाइल हवा, धूप, पानी की तरह शामिल हो चुका था।
पहली बार जब वह मुझे मिला था, तो हम दोनों के बीच एक चिट्ठीभर परिचय था। उसने सुदूर एक कस्बा होते गांव से मुझे अंतर्देशीय पत्रा लिख भेजा था, जिसमें उसने अपने बारे में जितना अस्पफुट-सा कुछ लिखा था, उससे ज्यादा उसने मेरी कहानी के बारे में लिखा था। कह सकते हैं, उसने उस पत्रा में मेरी कहानी पर अपनी प्रतिक्रिया तो दी थी, लेकिन वह सिपर्फ प्रतिक्रिया भर नहीं थी। प्रतिक्रिया के बहाने उसने अपनी पीड़ा को भी शब्द दिया था। हालांकि उसके शब्द बहुत सध्े, संतुलित, गढ़े, कढ़े और भारी-भरकम नहीं थे। लेकिन उन शब्दों में निहित उसकी भावनाएं गहरे अर्थ खोल रही थीं । मुझे तब धीरे-धीरे उसकी भावनाओं की ताकत समझ में आई थी और मुझे लगा था, हमारी लफ्रपफाजियां कितनी कृत्रिम और अक्षम हैं, कि हम जिसे कहने के लिए इतने शीर्षासन करते हैं, उसे कहने के लिए उसके पास कुछ अनगढ़ शब्द थे और संभवतः बहुत सीमित, पिफर भी उसकी भावना कहीं ज्यादा उद्वेलित करने वाली थी 1 मुझे समझ में आ गया था, कि एक लेखक और पाठक के बीच संबंध् शब्दों का नहीं, उस स्वर का होता है, जो दोनों छोरो पर सापफ-सापफ सुनाई पड़े।
पहली बार जब वह मुझे मिला था, तब वह नायक नहीं था। नायक हो जाने जैसी कोई बात मुझे उसमें नजर भी नहीं आई थी। वह पहली बार मुझे उन्हीं दिनों मिला था, जब हमारे पास मोबाइल का वजूद तो दूर, हम इस शब्दावली तक से अनभिज्ञ थे। तब हमारे घरों में चिट्ठियां आती थीं। हम चिट्ठियां भेजते थे और इन चिट्ठियों के आने-जाने के दरम्यान डाकिये का इंतजार करते थे।
चिट्ठीभर परिचय
ऐसे ही किसी इंतजार भरे दिन में उसकी अंतर्देशीय चिट्ठी मिली थी। पता के स्थान पर जो लिखावट थी वह अनगढ़ तो थी ही, अक्षरों का आकार भी कापफी बड़ा था। पहली ही नजर में यह अंदाज लग गया था कि पत्रा-लेखक या तो कम पढ़ा-लिखा है या उसने अक्षरों को चुन-चुनकर लिखने में महारत हासिल नहीं की है। उस चिट्ठी के प्रति मेरे भीतर कोई उत्सुकता, कोई आकर्षण नहीं पैदा हुआ था। सच कहूं तो उस दिन डाक से आई कई चिट्ठियां नामी लेखकों की थीं और उससे भी ज्यादा गर्व की बात यह थी, कि उनमें एक चिट्ठी एक बड़े आलोचक की थी 1 उस आलोचक ने तो मेरी कहानी की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए मुझसे मेरे कहानी संग्रहों तक की मांग की थी, ताकि वह समग्र रूप से मेरी कहानियों पर लिख सके । कुछ नामी लेखकों ने तो मुझे नई पीढ़ी का सबसे समर्थ और संभावनाशील कथाकार बताया था और मेरे उज्ज्वल भविष्य की कामना भी की थी। ऐसे पत्रा रोज आ रहे थे और मैं हर रोज कुछ ज्यादा ही ध्न्य-ध्न्य हुआ जा रहा था।
उस दिन भी ध्न्य-ध्न्य होता मैं उस अंतर्देशीय-पत्रा को बड़ी देर तक खोलने-पढ़ने का वक्त नहीं निकाल पाया और जब उस पर नजर पड़ी, तब तक मैं जमीन से कुछ उफपर उठा हुआ था। ठीक इसी वक्त वह अंतर्देशीय-पत्रा पफड़पफड़ाते हुए जमीन पर जा गिरा था। मैने झुककर उस पत्रा को उठाया और एक बार उसे उलट-पुलट कर देखा। उसकी पीठ पर यानी प्रेषक वाले भाग पर प्रेषक का नाम नहीं था। हां, ढिबरी, जिला समस्तीपुर जरूर लिखा था। तब मैं ढिबरी नामक किसी जगह को नहीं जानता था और जब जाना, तब उसी के जरिये जाना। मैं आज भी नहीं जानता कि ढिबरी नामक कोई जगह है या नहीं। लेकिन जैसे मुझे उस दिन, जिस दिन उसका पत्रा मिला था, यह विश्वास था, कि वह ढिबरी का रहने वाला है, आज भी यह विश्वास है कि वह ढिबरी का ही रहनेवाला है और ढिबरी है जरूर।
ढिबरी से आये उस अंतर्देशीय-पत्रा को मैने बेहद सावधनी से खोला और उसमें, जो कुछ भी लिखा था, उसे उतनी ही सावधनी से पढ़ गया, क्योंकि सावधनी से नहीं पढ़ता तो उसे ठीक-ठाक समझ पाना मुश्किल होता और उसकी भावना को समझना तो और भी मुश्किल होता, लिहाजा मेरी सावधनी ने सब कुछ आसान कर दिया। आपकी आसानी के लिए यहां मैं उसके पत्रा का सार-संक्षेप दे रहा हूं।
सर, प्रणाम!
मेरा नाम पिन्टू कुमार है। मैं ढिबरी का रहनेवाला हूं। यह एक गांव है और छोटा-मोटा बाजार है। यहां पढ़ने-वढ़ने की ज्यादा सुविध नहीं है। एक हाई स्कूल है, जिसमें लाइब्रेरी भी नहीं है। हमारे एक शिक्षक हैं शिव प्रसाद बाबू। उनसे ही कभी-कभार कोई किताब, पत्रिका पढ़ने को मिल जाती है। हम आपकी कहानी ‘नई इबारत’ जिस पत्रिका में पढ़े वह भी शिव प्रसाद बाबू से लेकर ही पढ़े। यह कहानी हमको बहुत अच्छी लगी। कहानी को पढ़ते-पढ़ते लगा कि आप हमारी कहानी ही कह रहे हैं। एक-एक घटना सच्ची। एक-एक बात वास्तविक । हम तो पूरी कहानी एक ही सांस में पढ़ गये। मुशहरों की जिन्दगी नरक है, सर! लोग मुशहरों को इंसान नहीं समझते। जो इस नरक से निकलना चाहता है, उसके सामने बहुत मुसीबत है। इतनी मुसीबत कि इस नरक से निकलने की कोई हिम्मत ही नहीं करता। आप इस सच्चाई को दुनिया के सामने ले आये, यह हमको बहुत अच्छा लगा। आपको बहुत-बहुत ध्न्यवाद सर!
आपका पाठक
पिन्टू कुमार, ढिबरी।
इस पत्रा से कुछ बातें पहलीबार सापफ हुई कि उसका नाम पिन्टू कुमार है, कि उसे मेरी कहानी ‘नई इबारत’ इसलिए पसन्द आई कि उसमें उसके जैसे लोगों की जिन्दगी का सच चित्रित किया गया था, कि वह इस बात से खुश था कि मैं इस कहानी के जरिए एक सच्चाई दुनिया के सामने ले आया था। लेकिन ठहरिए, यह उससे पहला परिचय भर था। अभी उससे पहली मुलाकात बाकी थी।
उससे पहली मुलाकात कब हुई, ठीक-ठीक तो याद नहीं। लेकिन इतना याद है कि तब तक उसकी स्मृति धुंधली पड़ चुकी थी। यहां तक कि उसके पत्रा में कही गई बातें भी विस्मृत हो चुकी थीं। इस बीच न कभी उसका पत्रा आया, न ही मैने उसके किसी पत्रा की अपेक्षा की। जाहिरन, इस बीच कापफी वक्त गुजर गया। संभवतः दो वर्ष। ऐसे ही बीतते वर्ष की किसी एक सुबह उससे अचानक मुलाकात हुई।
उससे पहली मुलाकात
गर्मियों के जाने और सर्दियों के आने का कोई दरमियाना दिन था, जब सुबह चटख उजली थी और हवा जुंबिशों से भरी थी। मेरे भीतर कोई कहानी मचल रही थी और मैं भीतर तक लरजा जा रहा था। पता नहीं, यह मौसम का असर था या मिजाज की पिफतरत कि मुझमें कोई प्रेम कहानी जनमती जान पड़ रही थी। जरखेज जजबातों के बीच कोई झरना, कोई पहाड़, बपर्फ की झरती पफुहियां, देवदार के पेड़, गुलमोहर, अमलतास के पफूल, स्मृतियों से गलबहियां करते कालिदास के ‘मेघदूतम’ से उफदे-उफदे बादल और अचानक तेज होती बारिश, बारिश में भीगता समय और स्मृतियों से झांकती नायिका और उसके कंधे पर हाथ रखता नायक, पीछे मुड़कर देखती नायिका और किसी छलिये-सा गायब हो चुका नायक, मन की घाटियों में उतरा सन्नाटा, काटेज से सरकती शाम की ध्ूप, गहरी उंसास लेती शिवालिक की पहाड़ियां छुपा-छुपाई कर रही थीं और मैं यह निश्चित था कि यह कहानी किसी भी वक्त लिखना शुरू कर सकता हूं।
ऐसे रोमानी समय की उस सुबह पिन्टू कुमार का आगमन हुआ।
दस्तक बहुत धीमी थी जैसे कोई संकोच से भरा हो । संकोच और मेरे दरवाजा खोलने के बीच, जो शख्स खड़ा था, वह औसत कद-काठी लेकिन सापफ रंग का एक लड़का था, जिसने नीले रंग की हापफ शर्ट और खाकी रंग की पैंट पहन रखी थी। पहली ही नजर में यह स्कूल ड्रेस की तस्दीक थी और मुझे लगा कि सरकारी स्कूल का यह लड़का कोई चंदा-वंदा मांगने आया होगा। मैंने उसके चेहरे पर सख्त निगाह डालते हुए रूखे स्वर में सवाल पूछा, ‘क्या है?’
वह मेरे सख्त सवाल और मुद्रा से विचलित होने के बजाय उसी विनम्रता से हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए बोला, ‘सर, मैं पिन्टू कुमार हूं। आपकी कहानी ‘नई इबारत’ पर मैंने आपको पत्रा लिखा था।’
मैं थोड़ा ढीला पड़ा। अपनी स्मृति पर जोर दिया और सचमुच वह पत्रा मुझे याद आ गया, ‘ढिबरी से?’
पहचान लिए जाने की खुशी में उसकी आंखें चमकीं। उसने सिर हिलाया। मुझे लगा, अपने प्रिय लेखक से मिलने का रोमांच उसे मेरे दरवाजे तक खींच लाया है। लिहाजा उसे अन्दर आमंत्रित करते हुए मैंने पूछा, ‘कैसे-कैसे आना हुआ, पिन्टू कुमार?’
‘बस सर, आपसे मिलने चला आया।’ वह ड्राइंगरूम में खड़ा, संकोच से गड़ा हुआ था।
मैंने सोपफे की ओर इशारा कर उसे बैठने को कहा। वह बैठ गया। मैंने गौर किया, उसकी आंखें ड्राइंगरूम का मुआयना कर रही थीं।
उसके सामने बैठते हुए मैंने पूछा, ‘क्या करते हो तुम?’
‘सर, अभी मैट्रिक पास किया है।’ उसकी आंखें मेरे चेहरे पर टिक गई थीं।
‘तो आगे क्या इरादा है?’ मैंने अगला सवाल किया।
‘इंटर में नाम लिखाना है, सर!’ उसने अटकते हुए जवाब दिया, ‘इसीलिए यहां आया हूं।’
‘यहां कोई रहता है?’
‘हां, सर, पिताजी रहते हैं।’
‘पिताजी, क्या करते हैं?’
‘सर, वह रिक्शा चलाते हैं। यहीं मुसल्लहपुर हाट में रहते हैं।’ बगैर किसी झिझक के उसने बताया।
उसका यह सच्चापन अच्छा लगा। मन में उसके प्रति सहानुभूति भी जागी। मैंने उसे प्रोत्साहित करने की गरज से कहा, ‘पिन्टू, एडमिशन ले लो। पढ़ाई करो। मेरी मदद की जरूरत हो तो बताना।’
वह जवाब देता, इससे पहले ही अन्दर से पत्नी की आवाज आई, ‘चाय तैयार है।’
मैं उठकर अन्दर चला गया। एक ट्रे में दो कप चाय और एक गिलास पानी लेकर लौटा तो देखा, वह बुकशेल्पफ के सामने खड़ा किताबों के ‘टाइटल’ पढ़ रहा था। मुझे चाय की ट्रे लेकर आता देख वह पुनः सोपफे पर जा बैठा।
मैंने ट्रे सेंट्रर टेबुल पर रखते हुए कहा, ‘चाय पियो!’
‘सर!’ इस बार मुझे उसकी आवाज डूबती-सी लगी, ‘मैं उसी जाति से हूं, जिस पर आपने वह कहानी लिखी थी!’
मुझे जैसे बिजली का-सा झटका लगा। इस वक्त जबकि मैं उसके लिए चाय और पानी लेकर आया था, उसने यह बात क्यों कही? समझना मुश्किल नहीं था। मुश्किल था तो स्वयं को इस शर्मिन्दगी से उबारना। उसने एक झटके में मेरे आभिजात्य को निर्वसन कर दिया था। उसके पक्ष में लिखे तमाम लिखे को उसने जैसे आईना दिखा दिया था। मैं उसके कठघरे में था। अन्दर बहुत कुछ टूट-पफूट होती रही और पिन्टू कुमार के रूप में एक सोलह-सत्राह साल का लड़का साबुत मेरे सामने चुनौती बना बैठा था। वह अपनी जाति के शर्म के साथ संकोच से भरा था और चाय पीने का मेरा आग्रह सकते में सुन्न पड़ा था।
मैंने खुद को बटोरते हुए साहस जुटाया, ‘पिन्टू, चाय पियो।’
उसने मुझे इस तरह देखा गोया वह यकीन कर लेना चाहता हो कि मैंने जो कहा है, वह होशो-हवास में ही कहा है।
मेरे होंठो पर स्नेहिल मुस्कान तैरी । शायद उसे यकीन आ गया कि मेरा उसे चाय पीने के लिए कहना कोई छद्म नहीं है। उसके संकोच को दूर करने के लिए मैंने स्वयं पानी का गिलास उठाकर उसकी ओर बढाया, ‘पानी पियोे?’
उसने उसी संकोच के साथ गिलास लिया और पानी पीने लगा । एक ही सांस में गिलास खाली करते देख लगा, वह बड़ी देर से प्यासा रहा होगा। मैंने पूछा, ‘और पानी लोगे?’
‘नहीं सर।’ खाली गिलास रखता वह तृप्त-सा जान पड़ा। उसका संकोच धीरे-धीरे तिरोहित हो रहा था। उसने चाय का कप उठाया और मुंह से लगाकर सुड़का। आवाज ड्राइंग रूम में भर-सी गई। मुझे याद आया, बचपन में सुड़कने की आवाज पर पिता जी अक्सर डांट लगाते थे, ‘गंदी आदत!’
इस वक्त, जबकि वह उसी सुड़कती आवाज में चाय पी रहा था, मेरे भीतर गुदगुदी-सी छूटी और जी में आया मैं भी चाय सुड़क कर पिउफं। लेकिन चाहकर भी ऐसा कर पाना संभव नहीं हुआ। मैं धीरे-धीरे चाय ‘सिप’ कर रहा था, जबकि उसने चाय तेजी से खत्म कर ली थी।
खाली कप हाथ में लिए उसने आग्रह किया, ‘सर, पानी दीजिए तो कप धे दूं।’
इस बार तो मैं सचमुच अन्दर तक हिल गया। मेरे सामने एक ऐसा यथार्थ था, जो मेरे तमाम लिखे-पढ़े को मुंह चिढ़ा रहा था। यह किताबों से परे, पफैंटेसी से बाहर, सांघातिक अनुभव था, मेरे उफपर घड़ों पानी डालता हुआ।
‘नहीं पिंटू, इसकी कोई जरूरत नहीं हैं।’ मैने उसे बरजने के लिए एक-एक शब्द पर जोर दिया, ताकि वह इस आग्रह से उबर जाय।
कप ट्रे में रखकर उसने मुझे कृतज्ञ भाव से देखा और पिफर जैसे उसके अंदर खदबदाती बेचैनी बेसाख्ता बाहर निकल आई, ‘सर, गांव में आज भी कुछ नहीं बदला है। छुआ-छूत, शोषण, दंबगई सबकुछ वैसे ही है।’
उसकी आवाज में हताशा थी, तो चेहरे पर हाहाकार। मेरे लिए यह मुश्किल क्षण था। मेरे पास जो आश्वासन के शब्द थे, वे निहायत खोखले जान पड़ रहे थे। मैं जो कहना चाह रहा था, उसमें आदर्शवादी चिमगोइयां थीं और मैं निश्चित नहीं था, कि यह कहकर मैं उसके अंदर कोई हौसला पैदाकर पाउफंगा। लेकिन कुछ तो कहना था। वह मुझसे मुखातिब था और जाहिरन मेरी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा कर रहा था। मैं पहलीबार किसी बौद्धिक बहस के बाहर एक ऐसे शख्स को संबोध्ति कर रहा था, जहां ऐकेडमिक टूल्स बेमानी थे। मैंने बेहद कठिनाई से उसे समझाने की कोशिश की, ‘पिंटू, बदलाव में समय भले लगे, लेकिन समय के साथ बदलाव आता है। जैसे-जैसे शिक्षा बढ़ेगी, लोग बदलेंगे। समाज बदलेगा। तुम जैसे नौजवान आगे आयेंगे तो मेरा विश्वास है, हालात भी बदलेंगे।’
वह मेरी बात मंत्रामुग्ध्-सा सुनता रहा। लेकिन मेरे चुप होने के साथ ही उसके चेहरे पर अपफसोस तिर आया। उसने उसी अपफसोसनाक अंदाज में कहा, ‘सर, पढ़ना-लिखना बहुत मुश्किल काम है। एक तो मुशहर लोग को पढ़ने में रुचि नहीं है और कोई पढ़ना चाहे तो इतना अडं़गा है कि पूछिये मत। हम कितना मुश्किल से पढ़े, कितना कुछ सहना पड़ा, हमीं जानते हैं।’
मेरी आदर्श कामना और उसके कड़वे सच के बीच जो पफासला था, उससे आंख मिलाना कठिन हो रहा था। मैंने पिफर भी उसकी हताशा को हौसला देने की कोशिश की, ‘पिंटू, तुम पढ़ो। मुझसे जो मदद चाहिए बेझिझक बताना।’
‘सर!’ उसने संक्षिप्त-सा जवाब दिया।
हमारे बीच संवाद का कोई सिरा नहीं रह गया था। मैं चुप-सा उसके पिफर कुछ बोलने की प्रतीक्षा करता रहा था कि वह एक झटके उठ खड़ा हुआ।
मैंने अचकचाकर पूछा, ‘क्या हुआ?’
‘सर, चलता हूं।’ उसने दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किया।
मैंने भी उसे रोकने-टोकने की कोई कोशिश नहीं की। हम दोनों दरवाजे तक आये। उसने एक बार पिफर प्रणाम किया। मैंने जवाब दिया और वह लपकता हुआ ओझल हो गया।
उसके जाने के साथ ही जुम्बिशों भरी हवा पछाड़ खाती महसूस हुई। उस सुबह की सारी रोमानियत हवा हो चुकी थी।
हमारी दुनिया में मोबाइल का आना
जब वह मुझे दूसरी बार मिला, हमारी दुनिया में मोबाइल दाखिल हो चुका था। हम नई-नई शब्दावलियों से वाकिपफ हो रहे थे। लोगों से मिलना-मिलाना कम होता जा रहा था और जानने वालों के मोबाइल नंबर याद रखने के बजाय उसे सेव करना सीख गये थे। कई बार इन सेव नंबरों से वर्षों बातचीत नहीं होती थी और मेमोरी पुफल होने पर उन्हें डिलिट कर देने में कोई दिक्कत भी नहीं होती थी।
इन्हीं दिनों में वह दूसरी बार मिला।
वह यानी पिन्टू कुमार। वह अब नायक होने जा रहा है, इसलिए अब वह, वह नहीं पिन्टू कुमार है।
पिन्टू कुमार जब दूसरी बार मुझसे मिला, तब उसे पहचानने में थोड़ी दिक्कत हुई। वह तकरीबन आठ-नौ साल बाद मिल रहा था, लिहाजा उसकी शक्ल-सूरत, पहनावे, ओढ़ावे में कापफी परिवर्तन आ गया था। संक्षेप में बताउफं तो वह उस दिन सुबह नहीं, दोपहर बाद आया था। दरवाजे पर दस्तक हुई थी 1दरवाजा पत्नी ने खोला था। पत्नी उसे पहचान नहीं पाई थीं। तब उसने कहा था, ‘मेरा नाम पिन्टू कुमार है। ढिबरी से आया हंू।’
पिन्टू कुमार! तकरीबन दस साल पहले सुना-जाना नाम, ढिबरी की वजह से याद आया और सोलह-सत्राह साल के लड़के का चेहरा आंखों में उभर आया। थोड़ा ताज्जुब भी हुआ कि इतने अर्से तक वह कहां गुम रहा और आज अचानक उसे मेरी याद कैसे आ गई? कई-कई सवाल, खयाल मन में अनायास आते गये और मैं जो इस वक्त एक प्रेम कहानी पढ़ रहा था, उसे छोड़कर दरवाजे तक आया।
पिन्टू कुमार दवाजे पर प्रतीक्षारत था। उसने मुझे देखते ही प्रणाम किया। उसके भाव-मुद्रा में पहलीबार का-सा संकोच नहीं था। मैने उसे उफपर से नीचे तक देखा। उसने चारखाने की हापफशर्ट और नीलेरंग की जींस पहन रखी थी। पैरों में स्पोट्र्स शू थे। बाल करीने से कटे। चेहरा भरा-भरा और क्लीनशेव्ड। एक भरापूरा जवान। जमाने के आईने में खड़ा कुछ-कुछ माचोमैन-सा।
मैने परिचय के पुराने सिरे को पकड़कर पिन्टू कुमार का हुलसकर स्वागत किया, ‘आओ भाई, आओ। कहां रहे इतने दिन? तुम तो एकदम गुम ही हो गये?’
वह मेरे पीछे-पीछे ड्राइंग रूम में आया। मैंने उसे बैठने का इशारा कर पूछा, ‘अच्छा पहले ये बताओ, क्या लोगे, चाय या कुछ ठंडा-वंडा?’
‘सर, कोई तकलीपफ करने की जरूरत नहीं है।’ सोपफे पर बैठते पिन्टू कुमार ने जवाब दिया, ‘बस, एक गिलास पानी चलेगा, सर।’
मैं अन्दर गया। ट्रे में खाली गिलास और एक बोतल ठंडा पानी लेकर लौटा तो पिन्टू कुमार को बुकशेल्पफ के सामने खड़े होकर किताबों के टाइटल पढ़ते पाया। मुझे देखते ही वह लपककर मेरे पास आया और मेरे हाथों से ट्रे लेते हुए बोल पड़ा, ‘सर, आपसे कुछ लंबी बात करनी है। आपके पास टाइम होगा?’
जरूरी बात? मेरे दिमाग में घंटी-सी बजी- कहीं यह लेखक तो नहीं बन गया और इस वक्त मुझे अपनी कोई रचना तो नहीं सुनाना चाहता? अपनी कोई किताब छपवाने-वपवाने के लिए मेरी मदद तो नहीं चाहता? या इन गुजिश्ता वर्षों में उसे कोई बड़ी कामयाबी तो नहीं हासिल हो गई, जिसकी दास्तानगोई से अपने मौजूदा रुतबे का अहसास कराना चाहता हो? जो भी हो, वह इतनी दूर से, इतने साल बाद मुझसे मिलने आया है, लिहाजा शिषचारवश मैंने उसे आश्वस्त किया, ‘टाइम की कोई बात नहीं है, पिन्टू कुमार, तुम इत्मीनान से बात कर सकते हो।’
पिन्टू कुमार के चेहरे पर आश्वस्ति दिखी। उसने गिलास में पानी भरा और पूरा गिलास एक ही सांस में खाली कर दिया। खाली गिलास टेबुल पर रखकर बोला, ‘सर, इतने साल बाद मैं आपके पास इसलिए आया कि मुझे लगा, आप ही हैं, जिसने भरोसा दिलाया था कि जैसे-जैसे शिक्षा बढ़ेगी। लोग बदलेंगे। समाज बदलेगा।’
मैंने ऐसा कुछ कहा था, ठीक-ठीक याद नहीं। लेकिन पिन्टू कह रहा है, तो हो सकता है, प्रसंगवश मैंने ऐसा कहा होगा। मैंने मुस्कराकर पूछा, ‘तो तुमको मेरी बात अब तक याद है?’
‘हां सर!’ वह संजीदा था, ‘आपकी एक-एक बात याद है। मुझे भी लगा था, पढ़ने-लिखने से ही हालात बदलेंगे। आपके यहां से जाने के बाद मैं आपने पिता के पास गया था। सोचा था, उनके साथ ही रहकर यहां पढ़ूंगा। लेकिन सर, जब मैं पिता से मिला तो उनकी हालत देखकर सदमा पहुंचा। वह दिनभर रिक्शा खींचते थे। रात में दारू पीकर पफुटपाथ पर ही सो जाते थे। वह टी.बी के मरीज हो चुके थे। वह जीने के लिए पीते थे या पीने के लिए जीते थे। मुझे कुछ समझ नहीं आया। उनकी हालत देखकर मैं घबरा गया। उस वक्त पिता के अलावा मेरे लिए कुछ भी सोचना संभव नहीं था। पटना में एक-दो डाॅक्टरों को दिखाया। लंबा इलाज,आराम और अच्छा भोजन उनके लिए जरूरी था। मैं उन्हें लेकर ढिबरी चला गया।’
पिन्टू कुमार रुका। पहलीबार उसे इतना लंबा और धरा प्रवाह बोलते सुन रहा था । समझते देर नहीं लगी कि वह भीतर तक भरा हुआ है। वह जैसे वह सब कुछ कह जाना चाहता है, जो इन वर्षों में उसके साथ गुजरा है। लिहाजा मैंने उसे टोकना उचित नहीं समझा।
उसने बात जहां खत्म की थी, वहीं से पिफर आगे बढ़ा, ‘सर, ढिबरी में हाईस्कूल से आगे पढ़ने की सुविध नहीं थी। मां की मजदूरी से मेरी पढ़ाई भी संभव नहीं थी। मेरे सामने कमाने की मजबूरी थी। मैंने सोचा, दो-चार ट्यूशन मिल जायेगा, तो कुछ आसानी होगी। लेकिन, सर, मुशहर से कोई अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए तैयार नहीं हुआ। उल्टे लोग ताना मारते-अब ये दिन आ गया है कि हमारे बच्चों को मुशहर-डोम पढ़ायेगा।’
पिन्टू कुमार की आवाज सीली-सीली लगी1 मुझे लगा, शायद उसका मन भी भर आया है। मैंने झट से गिलास में पानी भरकर, उसे पानी पीने का इशारा किया। उसने इस बार महज दो घूंट पानी पिया। पिफर खुद को संयत कर बोला ,‘क्या करता, भागकर समस्तीपुर चला गया1 वहां कुछ दिन मजदूरी करता रहा। वहीं एक ठेकेदार मिला। वह लड़कों को मजदूरी के लिए पंजाब भेजता था। उसी ने बताया कि वहां ज्यादा मजदूरी मिलती है। वहां छुआछूत का भी चक्कर नहीं है। बस, एक दिन आठ-दस लड़कों के साथ मुझे लेकर वह ठेकेदार लुध्यिाना चला गया।’
पिन्टू की तपफसील में उसके बीते दिनों के दृश्य सहज ही आकार लेने लगे थे। वह बता रहा था, ‘सर, दो साल एक पफैक्ट्री में काम करने के बाद, मैंने वहीं मोबाइल रिपेयरिंग का काम सीखना शुरू कर दिया। काम सिखाने वाला सरदार बोला, इसका बहुत स्कोप है। तू चाहे तो अपने देस में भी यह काम कर सकता है। भूखों नहीं मरेगा।’
पिन्टू के बोलने में जितनी सापफगोई थी, उतने ही मोड़ भी थे,यह समझना मुश्किल नहीं था। वह हर मोड़ पर रुकता और पिफर जैसे मेरे चेहरे का जायजा लेता, कहीं मैं उसकी बातों से उफब तो नहीं रहा। वाकई मैं उफबने के बजाय उत्सुकता से भरा हुआ था और शायद यह मेरे चेहरे से भी जाहिर हो रहा था। उसका मुझ पर इत्मीनान बढ़ता जा रहा था और वह जिस मोड़ पर रुकता ठीक उसी से आगे बढ़ता। उसने आगे बताना शुरू किया, ‘एक दिन खबर मिली कि पिता जी नहीं रहे। मेरे लिए यह खबर अप्रत्याशित नहीं थी। मैं जानता था, यह अनहोनी तो एक दिन होनी ही है। आश्चर्य तो यह था, सर, कि वह इतने वर्षों तक चल कैसे गये?’
यह पिन्टू कुमार का सवाल था, या तंज, मैं समझ नहीं पाया। लेकिन यह समझना मुश्किल नहीं था, कि उसके अंदर एक किस्सागो बैठा है, जो अपनी बात तरतीब से कहना जानता है। उसने उसी तरतीब के साथ कहना जारी रखा, ‘सर, मैं लौटकर ढिबरी आ गया। यहां आने पर पता चला मां भी ज्यादा बूढ़ी और बीमार हो चुकी हैं। पिता के बाद उसकी देखभाल के लिए कोई सहारा नहीं था। मैने लुध्यिाना लौटने का इरादा छोड़ दिया। वहीं ढिबरी में सड़क किनारे एक खोखा ;गुमटीद्ध डाला और मोबाइल रिपेयरिंग की दुकान शुरू कर दी।’
‘अरे वाह, यह तो तुमने बहुत ही अच्छा किया!’ मैंने उसे दाद देने के साथ हौसला आपफजाई की, ‘मोबाइल तो अब गांव-गांव हो गया है। आजकल तो इसका बिजनेस खूब चल रहा है।’
पिन्टू कुमार बड़ी देर बाद मुस्कराया लेकिन उसकी मुस्कराहट का रंग चटख नहीं था। मेरे अन्दर कुछ चटखा-कहीं कुछ गलत तो नहीं कह गया? वह बोला तो कुछ नहीं, लेकिन बहुत कुछ अनबोला उसकी मुस्कराहट में शेष था।
ढिबरी बाजार में पिन्टू कुमार
नेशनल हाईवे बन जाने के बाद ढिबरी की रौनक बढ़ गई थी। ढिबरी का वह हिस्सा, जो नेशनल हाईवे से सटा हुआ था, अब अच्छे-खासे बाजार में तब्दील हो गया था और वह बकायदे ढिबरी बाजार कहा जाने लगा था। ठीक इसके उलट बाकी हिस्से का मूल रूप बरकारार था और इस प्रकार ढिबरी गांव और बाजार साथ-साथ बने हुए थे। दोनों के होने से हुआ यह था कि गांव की चैपाल उजड़ गई थी और बाजार में बैठकें बढ़ गई थीं। चाय-पान की दुकानों पर लोग एक सुबह से जो जुटते , तो दुनियाभर की बतकही में दुपहरिया कर देते। खाद-सीमेंट की दुकानों पर आस-पास के गांवों के लोगों की भीड़ जुटनी शुरू होती तो देर शाम तक खरीद-बिक्री जारी रहती। शाम को एगरोल और चाउमिन के ठेले गुलजार हो जाते, जहां ज्यादातर जवान हो रहे लड़कों की भीड़ स्वाद के चटखारे ले रही होती। उसी के बगल में देसी शराब की दूकान तो देर रात तक खुली रहती और पीने वाले आपस में गाली-गलौज करते जमीन-आसमान के बीच कुलांचे भर रहे होते। चिप्स, कुरकुरे, पेप्सी, कोकाकोला तो पान की दुकानों पर भी बिक रहे थे और वहां स्कूली लड़के-लड़कियों की आमद-रफ्रत दिनभर बनी रहती।
वह हाई स्कूल, जहां से पिन्टू कुमार ने मैट्रिक किया था और अब वह उत्क्रमित होकर इंटर हो गया था, इसी नेशनल हाईवे पर था, जिसके चारों ओर बाउंड्री बन गई थी और सामने एक बड़ा-सा गेट भी बन गया था, जिसके उफपर नीले रंग से स्कूल का नाम लिखा था- उत्क्रमित राजकीय उच्च मध्य विद्यालय, ढिबरी।
इस स्कूल के इंटरमीडिएट हो जाने की सूचना से पिन्टू कुमार के अंदर एक गहरी हूक उठी थी और आगे की पढ़ाई न कर पाने का मलाल हमेशा के लिए घर कर गया था। उसने इस अपफसोस को साझा करने के लिए मास्टर शिव प्रसाद की तलाश की, तो पता चला कि उनका तबादला हो गया है और वह समस्तीपुर चले गये हैं।
ये बेहद उदासियों और बेचैनियों से भरे दिन थे।
पिता की मौत के बाद मां को छोड़कर कहीं जाना संभव नहीं था और ढिबरी में रहकर बेकारी और हिकारत के बीच रहना मुश्किल था। लुध्यिाना से लेकर आया जमा-पूंजी धीरे-धीरे खत्म हो रही थी और संघर्ष के दिन नजदीक आते लग रहे थे। लेकिन कोई दो टूक पफैसला लेना भी संभव नहीं हो रहा था।
मुशहर टोली के हालात जस के तस थे। बच्चे दिन भर सूअरें चराते और खेतों में मूस ढूंढ़ते पिफरते। औरतें खेतों में मजदूरी करतीं और खाली वक्त में आपस में लड़ती-झगड़ती रहतीं। मर्द कच्ची पीकर निठल्ले पड़े रहते और कच्ची का जुगाड़ नहीं होने पर अपनी बीवियों से गाली-गलौज, मारा-पीटी करते।
इन सबके बीच पिन्टू कुमार का कलेजा कलपता। वह अगर किसी को समझाने की कोशिश करता तो दारू के नशे में पिनका कोई मर्द उसकी ऐसी-तैसी कर देता, ‘मुशहर पैदा हुए हैं, मुशहरे मरेंगे। पढ़-लिख के कोई बाभन ना बन जायेगा।’
पहलीबार यह बात दिल को लगी तो जरूर थी, लेकिन धीरे-धीरे उसे भी अहसास होने लगा था, कि वह मुशहर ही पैदा हुआ है और मुशहर ही मरेगा।
यह रोज का जीना था, रोज का मरना।
वह रोज सोचता, ढिबरी बाजार में मोबाइल रिपेयरिंग की दुकान खोले और रोज यह पफैसला दम तोड़ देता।
आखिरकार, उसने एक दिन बहुत साहस जुटाकर डिबरी बाजार में एक-छोटी-सी दुकान लेने की पहल की। ढिबरी बाजार में उस खाली दुकान के मालिक थे विशंभर मिश्रा। छूटते ही आग बबूला हो गये, ‘मुशहर स्साला, तोरा दिमाग खराब हो गया है क्या, रे? अब हमरी बराबरी में बिजनेस करेगा तू? एतना जूता मोरेंगे कि ढिबरी बाजार भुला जायेगा।’
उस अपमान के बाद कई दिनों तक पिन्टू को ढिबरी बाजार जाने की हिम्मत नहीं हुई। पड़े-पड़े वह दिन रात बस यही सोचता-मां मरे, चाहे जिये, वह लुध्यिाना लौट जायेगा। इस जिल्लत से तो बेहतर है, वह कहीं बाहर चला जाये, जहां कम से कम अपनी जाति तो छुपा ही सकता है। लेकिन यह छुपा-छुपाई क्यों? यह सवाल उसका मन मथने लगता और पिफर उसका निर्णय कमजोर पड़ने लगता। उसे जैसे ही लगता कि वह भागना चाहता है, उसके अंदर से कोई पूछता, ‘अपने घर-गांव के बीच वह क्यों नहीं रह सकता?’
पिन्टू को इस सवाल का तोड़ चाहिए था।
तोड़ थे दिगंबर मिश्रा। ढिबरी पंचायत के मुखिया और विशंभर मिश्रा के गोतिया। दोनों में छत्तीस का रिश्ता था। मुखियागिरी हथियाने के लिए विशंभर मिश्रा हमेशा भितरघात में लगे रहते और मुखियागिरी बचाने के लिए दिगंबर मिश्रा हमेशा कमान कसे रहते। दिगंबर मिश्रा का थाना-पुलिस, बीडीओ, सीओे सबके साथ जुगाड़ सेट था और इकबाल बुलंद । उनकी ढिबरी पंचायत में तूती बोलती थी, जिसकी काट उनके गोतिया विशंभर मिश्रा अभी तक नहीं निकाल पाये थे।
विशंभर मिश्रा से चोट खाया पिन्टू कई दिनों तक आगा-पीछा सोचने के बाद किसी अंतःप्रेरणा के वशीभूत एक दिन सीधे दिगंबर मिश्रा की दुआर पर जा पहुंचा। सिर झुकाकर प्रणाम किया और चुपचाप गेट की ओट थामकर खड़ा हो गया।
दिगंबर मिश्रा झकझक कुर्ता-धेती पहने सीओ आॅपिफस जाने के लिए निकल रहे थे। पिन्टू पर नजर पड़ते ही कड़ककर पूछे, ‘क्या है, रे पिन्टुआ, काहे गेट थामे खड़ा है?’
‘हम ढिबरी बाजार में मोबाइल रिपेयरिंग की दुकान खोलना चाह रहे हैं। लेकिन कोई जगह नहीं दे रहा है?’ बगैर किसी लाग-लपेट के पिन्टू ने आने का मकसद बता दिया।
‘सुने तो थे कि विशंभर मिश्रा तोरा दुकान देवे से मना कर दिये हैं।’ दिगंबर मिश्रा मुस्कराये। इस मुस्कुराहट में ‘सब खबर’ रखने का दर्प चुगली खा रहा था।
‘जी!’ पिन्टू पफुसपफुसाया।
‘तब?’ दिगंबर मिश्रा की आंखें पिन्टू के चेहरे पर आकर टिक गईं।
‘जी, आप गांव के मालिक हैं । कुछ उपाय कर देते, तो जीने-खाने का सहारा हो जाता।’ पिन्टू याचना की हद तक दोहरा हो आया था। उसे अहसास तक नहीं हुआ कि उसकी पीठ में रीढ़ भी है।
दिगंबर मिश्रा कुछ हड़बड़ी में दिखे। शायद उन्हें देर हो रही थी। वह गेट की दीवार से लगी खड़ी मोटरसाइकिल पर बैठते हुए बोले, ‘दुआर पर आये हो तो कुछ सोचना पड़ेगा। सांझी को मिलो तो बात करते हैं।’
पिन्टू के मन के किसी कोने में आस जगी। दिगंबर मिश्रा की मोटरसाइकिल धुंआ उगलते हुए आगे बढ़ गई और वह देर तक उस ध्ुएं का तीखापन पफेपफडों में महसूस करता रहा।
उस शाम दिगंबर मिश्रा ने सापफ-सापफ कहा,‘देख पिन्टुआ, ढिबरी बाजार में तोरा कोई दुकान देवे वाला ना है। दुकान तो हमरो खाली है। लेकिन हमू समाज से अलग तो जा नहीं सकते हैं। इसलिए तोरा मदद करना बड़ा मुश्किल बुझाता है।’
पिन्टू का दिल बैठ गया। वह सिर झुकाये-झुकाये बोला, ‘तब हम चले जाते हैं लुध्यिाना। वहीं मर-खप जायेंगे।’
क्षणभर को चुप्पी बनी रही, पिफर दिगंबर मिश्रा खैनी थूककर उसकी ओर मुखातिब हुए, ‘एक उपाय है। स्कूल के कोना में खाली जगह है। वहीं एक ठो गुमटी डाल ले।’
‘ले…ले… लेकिन कोई मना किया तो?’ उसने आशंका जताई।
‘किसका मजाल है, रे जो मना करेगा? दिगंबर मिश्रा का दिन इतना खराब ना हुआ है।’ एकबारगी गरज पड़े दिगंबर मिश्रा, गोया उनका अहं तड़प उठा हो।
पिन्टू सकते में खड़ा रहा। दिगंबर मिश्रा बोलते रहे, ‘एक बात कान खोल के सुन ले, पिन्टुआ, गुमटी का सौ रुपया महीना देना पड़ेगा।’
‘जी!’ बड़ी मुश्किल से बोल पाया पिन्टू।
उस शाम घर लौटते हुए पिन्टू के पांव बोझिल थे। लेकिन मन हल्का हो चुका था। उसने उस दिन जहर से जहर काटने का गुर सीख लिया था।
जिस दिन पिन्टू ने उत्क्रमित राजकीय उच्च मध्य विद्यालय की बाउंड्री के कोने में अपनी गुमटी रखी, उस दिन विद्यालय के छात्रों का कौतुहल से भरा हुजूम इर्द-गिर्द जमा हो गया था। सामान जमाते,काउंटर संभालते-संभालते ढिबरी बाजार में आश्चर्यजनक रूप से हलचल बढ़ गई थी। इन हलचलों के बीच ही पिन्टू ने गुमटी के उफपर साइन बोर्ड टांगा-पिन्टू मोबाइल रिपेयरिंग सेंटर। इसके ठीक नीचे लिखा था-यहां हर प्रकार के मोबाइल की उचित मूल्य पर रिपेयरिंग की जाती है।
विद्यालय के छात्रों ने साइनबोर्ड पढ़कर तालियां बजाईं। अचानक एक लड़का उत्साह से भरा करीब आया और पिन्टू को अपना मोबाइल दिखाते हुए बोला, ‘देख तो रे, इसका ‘पी’ वाला बटन काहे नहीं काम करता है?’
पिन्टू ने उस लड़के के मोबाइल को खोला । झाड़-पफूंक किया । पिफर थोड़ी देर तक अपनी कारीगरी में लगा रहा। जब उसने मोबाइल उस लड़के को लौटाया और लड़के ने की पैड दबाकर जांच लिया कि ‘पी’ ठीक से काम करने लगा है, तो उसकी आंखें पफट पड़ीं । उस लड़के के मुंह से बेसाख्ता निकला, ‘अर्रे, ई तो कमाल हो गया, रे!’
उस लड़के के चेहरे पर हैरानी और खुशी के भाव थे। वह उसी रोमांच से भरा अपने साथियों को मोबाइल दिखाते हुए बोला,‘ देख न रे,देख सांचो बना दिया है।’
लड़के ने इस कमाल से चमत्कृत हो पूछा,‘कितना पैसा हुआ?’
पिन्टू मुस्कराया। बोला, ‘पहला कस्टमर हैंे इसलिए प्रफी।’
इतना सुनते ही लड़कों ने जोश में तालियां बजाईं, जिसकी अनुगंूज ढिबरी बाजार में दूर तक सुनी गई।
गोपाल पांडे का शास्त्रा-ज्ञान और दिन का सपना
पूरे ढिबरी बाजार में मोबाइल रिपेयरिंग की पिन्टू की दुकान इकलौती थी, जबकि ढिबरी ही क्या, आसपास के दसों गांवोें में मोबाइल रखनेवालों की अच्छी खासी तादाद थी। गरज कहिए या विकल्पहीनता,झिझकते-झिझकते ग्राहक आने लगे। पिन्टू कुमार व्यस्त रहने लगा। हाथ में हुनर था, व्यवहार में शालीनता, इसलिए उसके सामने तत्काल कोई समस्या नहीं आई । छोटी-मोटी मुश्किलें जरूर आतीं, जिन्हें वह अपने तरीके से हल करना सीख गया था। ऐसी ही एक मुश्किल तब आई, जब ढिबरी के रमेश पांडे अपना मोबाइल बनवाने आये और बन जाने पर पैसों को लेकर बकझक करने लगे । इसी क्रम में उन्होंने पिन्टू को औकात बताने की कोशिश की, ‘स्साला मुशहर, तोर दिमाग ढेर चढ़ गया है, क्या रे?’
पिन्टू मुस्कराया और पूरे ध्ैर्य से रमेश पांडे को जवाब दिया, ‘हम तो मुशहर हैं, बाबा । मुशहर ही रहेंगे। लेकिन आप कौन बाभन का ध्रम निभा रहे हैं?’
‘अब तू हमको ध्रम-करम सिखायेगा?’ रमेश पांडे टेंटियाये, ‘तू सिखायेगा ध्रम?’
‘रजकुमारिया पासिन को एक से एक लभ मैसेज भेजते हैं, तब ध्रम-करम नहीं सोचते हैं?’ पिन्टू ने सीध्े रमेश पांडे की कमजोर नस दबा दी थी ।
रमेश पांडे का तो चेहरा ही पफक पड़ गया। एकबारगी बोलती बंद हो गई। लगा गला जाम हो गया हो। बड़ी मुश्किल से थूक घोंट कर मिमियाये, ‘तू… तू… तू क्या बोल रहा है पफालतू बात?’
‘रजकुमरिया का मोबाइल हमी बनाये हैं, बाबा।’ सकते में पड़े रमेश पांडे को पिन्टू ने थोड़ा और झटका दिया, ‘एक से एक मस्त मेसेज भेजते हैं। है न ,बाबा?’
उस दिन रमेश पांडे, पिन्टू के आगे घिघियाये सो घिघियाये ही, उसे अपना राजदार बनाने के लिए भी विवश हो गये। उस दिन के बाद तो उनका पिन्टू की दुकान पर आना-जाना ही नहीं बढ़ गया, धीरे-धीरे हंसी-मजाक का भी दोस्ताना हो गया।
रमेश पांडे इंटर पफेल करने के बाद अपने पिता के साथ पुरोहिताई का काम करने लगे थे। जजमानों के यहां जब पूजा-पाठ कराने जाते तो धेती-कुर्ता और गमछा पहनते, नहीं तो बाकी दिनों में जींस, टी-शर्ट पहने हीरो बने पिफरते1 उन्हें जितने श्लोक नहीं याद थे, उससे ज्यादा पिफल्मी गाने याद थे और वह पिंटू की दुकान पर बैठे-बैठे रामचरित मानस की चैपाइयों को फिल्मी धुन में तब्दीलकर इस कदर भव-विभोर हो सुनाते कि स्कूल आने-जाने वाले लड़के जानबूझकर रुकते और भक्ति-भाव से उनकी भगवद-कथा का रसास्वादन करते1
रमेश पांडे मूड में आते तो एक से एक मौलिक चैपाइयां भी सुनाते। उनकी विरचित एक चैपाई इन दिनों कापफी मशहूर हो रही थी-सिया लिन्हीं सिर पर संदूका। राम लिए कर में बंदूका। आगे चल रिक्शा किन्हा। उतर गये पैसा नहीं दीन्हा।
कुल मिलाकर रमेश पांडे की पिन्टू की दुकान पर स्थाई अड्डेबाजी होने लगी थी1 धीरे-धीरे पिन्टू को भी यह विश्वास होने लगा था कि रमेश पांडे के लखेड़ेपन में एक तरह का विद्रोह है। वह ब्राह्मण कुल में पैदा होने के बावजूद, अपनी ही तरह से परंपरा-भंजक भी हैं। यही वजह थी कि घर-समाज के बरजने के बावजूद उन्होंने पिन्टू की दुकान पर उठना-बैठना बंद नहीं किया। जिस दिन वह नहीं आते खुद पिन्टू को खाली-खाली-सा लगता।
ऐसे ही एक खालीपन वाले दिन, जबकि रमेश पांडे किसी जजमान के यहां संकल्प कराने गये थे, तारा कुमारी का पिन्टू की दुकान पर आना हुआ।
पिन्टू उस वक्त ‘चुनी हुई शायरी’ पढ़ रहा था। तारा कुमारी को सामने देखकर हड़बड़ाया और किताब काउंटर पर रखकर खड़ा हो गया। तारा कुमारी ने एक निगाह ‘चुनी हुई शायरी’ पर डाली और दूसरी निगाह पिन्टू पर। पिफर अपना मोबाइल काउंटर पर रखकर बोली, ‘देखिए तो क्या गड़बड़ी है?’
‘गड़बड़ी तो आप न बताइएगा !’ पिन्टू ने तारा कुमारी को भर आंख देखा।
‘हमी बताएंगे तो आप कौन बात के मेकेनिक हैं!’
ताराकुमारी की टनक आवाज और अंदाज से तो पिन्टू लाजवाब होकर रह गया। गुदगुदी भरे मन के साथ काउंटर पर रखा ताराकुमारी का मोबाइल उठाया और ‘की बटन’ दबा कर देखा। मेन्यू चेक किया। पिफर तारा कुमारी से मुखातिब हुआ, ‘सब तो ठीक है।’
‘उध्र से आवाज आती है। हमारी आवाज दूसरे को सुनाई नहीं पड़ती।’ तारा कुमारी ने पिन्टू के ज्ञान को चुनौती दी।
‘ओह, तो ये बोलिए न!’ पिन्टू इस बार सचमुच मुस्कराया।
तारा कुमारी मुस्कराई नहीं। लेकिन उसके मुखमंडल पर व्याप्त चंचलता गजब ढा रही थी।
पिन्टू ने मोबाइल का कवर खोला। पफोरसेप से कुछ चेक किया, पिफर बोला, ‘टाइम लगेगा। मोबाइल छोड़ जाइए तो बना देंगे।’
‘ठीक है। चार बजे तक बना दीजिएगा।’ स्वयं ही मियाद तय करती तारा कुमारी पलटी और सड़क किनारे खड़ी अपनी साइकिल की ओर बढ़ गई।
पिन्टू अवाक तारा कुमारी को देखता रहा। सपफेद सलवार, ब्लू कुर्ता, सपफेद चुन्नी में चपल चंचला तारा कुमारी अपनी दो चोटियों को झटका देते हुए साइकिल पर चढ़ी और पफुर्र से उड़ गई।
पिन्टू के हाथ में तारा कुमारी का मोबाइल था और आंखों में तारा कुमारी का चेहरा। जाने कैसे तो मन में कोई नामालूम-सा रिंगटोन बजने लगा, जिसे वह ठीक-ठीक पकड़ नहीं पा रहा था। इस कोशिश में उसने खुद को असहाय-सा महसूस किया और बेबसी में सिर को यूं झटका दिया, गोया खुद को बेखुदी से बाहर लाने की जिद कर रहा हो। लेकिन उसकी इस जिद को बार-बार परे ढकेलती तारा कुमारी जेहन से जाने का नाम ही नहीं ले रही थी। थक-हार कर उसने आंखें मूंदीं और कल्पनाओं के सारे घोड़े खुले छोड़ दिये। ये घोड़े समतल हरियालियों के बीच चैकड़ी भरते-भरते, हवा में उड़ने लगे। बादलों को चीरते, समंदरों को लांघते वे अचानक किसी कंदरा में घुस गये। घुप्प अँधेरे से भरी इस कंदरा में सांसें घुटती-सी लगीं। देह छिलती जान पड़ी। तारी होती मूच्र्छा से मोर्चा लेता वह घबराहट के मारे पसीने-पसीने हो आया। आंखें खुलीं, तो सामने रमेश पांडे खड़े दिखे।
रमेश पांडे काउंटर पर अपनी दाहिनी हथेली पीटे जा रहे थे, ‘क्या रे पिन्टुआ, दिने में सपना देखे लगा क्या?’
पिन्टू हड़बड़ाया जैसे रंगे हाथ पकड़ा गया हो। सामने खुले पड़े तारा कुमारी के मोबाइल को काउंटर के अंदर बने दराज में ध्ीरे से खिसकाते हुए मुस्कराया, ‘बाबा, दिन में सपना देखने का क्या अर्थ होता है?’
‘बेटा, दिन को देखा सपना कब्बो सांच ना होता है।’ रमेश पांडे स्टूल खींचकर अपनी पंडिताई बघारने लगे, ‘शास्त्रा में कहा गया है सपना और संभोग दिन के प्रहर में वर्जित कार्य है1 जो यह कार्य करता है, पाप का भागी होता हैै।’
‘तब तो आप पर अब तक बहुत पाप चढ़ गया होगा,बाबा!’ पिन्टू ने दाहिनी आंख दबाकर रमेश पांडे को टहोका।
‘स्साला, तुम क्या जानो शास्त्रा की बात?’ रमेश पांडे की गाढ़ी होती मुस्कराहट में चुहल अठखेलियां करने लगी, ‘शास्त्रा में हर पाप का निवारण बताया गया है।’
‘तो दिन में देखे सपना के पाप का निवारण बताइए न, बाबा !’ पिन्टू के निहोरे में भी हास्य मुखर था।
‘शूद्दर के लिए शास्त्रा-ज्ञान वर्जित है।’ रमेश पांडे का ज्ञान-दर्प हास्य पर हावी हुआ, ‘पाप निवारण तो बिल्कुल असंभव।’
‘बाबा, तब अपना शास्त्रा अपने पास रखिए। हमको अपना काम करने दीजिए तो!’ घड़ी देखता पिन्टू इस शास्त्रार्थ को टालने की गरज से बोला, ‘बहुत अरजेंट काम करना है।’
‘कितना तो बोले हैं कि हमको भी मोबाइल बनाना सिखा दो। तुमरा सब अरजेंट काम हम निबटा देंगे।’ खैनी में चूना मलते रमेश पांडे ने उलाहना दिया।
‘ए बाबा, शूद्दर का काम बाभन से ना निबटेगा।’
‘जिनगी भर शूद्दर ही रह जाओगे!’
‘तो आप भी जिनगी भर बाभन ही रह जाइएगा।’ तुर्की-बतुर्की जवाब देते पिन्टू ने पिफर घड़ी देखी। ढाई बज रहे थे। पता नहीं क्यों, उसको शक हुआ कि घड़ी स्लो चल रही है। शक दूर करने के लिए रमेश पांडे से पूछा बैठा, ‘आपकी घड़ी में टाइम क्या हो रहा है, बाबा?’
रमेश पांडे ने खैनी ठोंकी, चुटकी से मुंह में डाला पिफर घड़ी देखते हुए गुलगुलाये, ‘अढ़ाई बज रहा है।’
‘आपकी घड़ी स्लो तो नहीं ना है?’ पिन्टू अब भी आश्वस्त नहीं हुआ।
‘मंगनी का बूझ लिये हो क्या?’ रमेश पांडे ने दांतों के बीच दबाकर जीभ की नोंक से थूक की लंबी पिचकारी छोड़ी।
इससे पहले कि पिन्टू रमेश पांडे को कोई जवाब देता रमेश पांडे का मोबाइल बजने लगा । रमेश पांडे ने मोबाइल जेब से निकाला। स्क्रीन पर देखा, पिफर कंटीली मुस्कान के साथ उठ खडे हुए, ‘उसी का है। आते हैं।’
‘उसी का है’ मतलब रजकुमरिया पासिन का। पिन्टू मुस्कराया। रमेश पांडे कान में मोबाइल सटाये एकांत की तलाश में उत्क्रमित राजकीय उच्च मध्य विद्यालय के पिछवाडे की ओर बढ़ गये।
पिन्टू ने राहत की सांस ली। घड़ी पर नजर डाली। दो बजकर चालीस मिनट हुए थे। यानी तारा कुमारी के आने में एक घंटा बीस मिनट का समय बाकी था। उसने जल्दी से दराज में हाथ डाला। हाथ में कोई कील चुभी। झट से हाथ बाहर खींचा। बीच की उंगली में खून की बूंद रिस आई थी। क्षण भर को खून को निहारा, पिफर उंगली मुंह में रखकर चूसने लगा। पीड़ा कुछ कम हुई। तारा कुमारी का मोबाइल निकालकर काउंटर पर रखा और बनाने में जुट गया।
रमेश पांडे जब तक लौटकर आये, तारा कुमारी का मोबाइल बन चुका था। मोबाइल दराज में रखकर पिन्टू ने घड़ी देखी-सवा तीन बजे थे। उसे पिफर लगा कि उसकी घड़ी स्लो है। तस्दीक के लिए पिफर रमेश पांडे से पूछा, ‘ए बाबा, टाइम बताइए तो कितना हुआ है?’
‘काहे रे, हमको घंटाघर बूझ लिया है क्या कि तोरा जब ना तब टाइम बताते चलें!’ रमेश पांडे मूड में दिख रहे थे। लग रहा था रजकुमारिया से मनभर बतियाकर मिजाज बन गया है।
‘बाबा, हम मजाक नहीं कर रहे हैं। सीरियसली बताइए न क्या टाइम हो रहा है?’ पिन्टू चाहकर भी व्यग्रता नहीं छुपा पाया।
‘सवा तीन!’ रमेश पांडे ने पिन्टू की व्यग्रता को लक्ष्य किया, ‘क्या बात है, आज बार-बार टाइम पूछ रहा है?’
‘बस ऐसे ही।’ पिन्टू ने बात बनाने की कोशिश की, ‘काहे तो लग रहा है कि हमारी घड़ी स्लो चल रही है।’
‘बाभन पर कुछ खर्चा-पानी ना करोगे, तो स्लो तो चलबे करेगी।’ रमेश पांडे दाहिनी आंख दबाकर हंसे, ‘तोरा कुछ याद है, कितना दिन हो गया दारू पिये?’
‘सांझ को आइएगा, तो सोचेंगे।’ पिन्टू ने सही अवसर ताड़कर रमेश पांडे को टालना चाहा, ‘अभी जाइए। हमको बहुत काम करना है।’
‘अब तो चार बजने ही वाला है।’ कलाई घड़ी पर नजर गड़ाते रमेश पांडे ने एलान किया, ‘अब तो बाबा रसपान करके ही टलेंगे1’
पिन्टू का दिल ध्ड़क गया। वह एकांत चाहता था और रमेश पांडे थे कि टलने को तैयार नहीं थे। घड़ी की सूई जैसे-जैसे खिसक रही थी उसे लग रहा था, पांव के नीचे से जमीन भी खिसक रही है। उसने बड़ी मुश्किल से जमीन पर पांव जमाने की कोशिश की ही थी, कि राजकीय उत्क्रमित उच्च मध्य विद्यालय की घंटी के साथ ही पिन्टू के भीतर भी घंटियां बजने लगीं। उसे आज पहली बार महासूस हो रहा था कि किसी की प्रतीक्षा की नैसर्गिक अनुभूति उसकी नसों में सनसना रही है। इस अलभ्य क्षण के स्वागत में उसने अपनी चेतना के सारे द्वार खोल दिये।
रमेश पांडे हुलक-हुलक कर सड़क से गुजरती लड़कियों को ताक रहे थे । अंदाज कुछ ऐसा कि हर लड़की को नख-शिख से तौलकर ही मानेंगेे। किसी-किसी को तो वह सीध्े लक्ष्य कर आप्तवचन भी उछाल दे रहे थे, ‘का हो, खइबू कि जियान करबू?’
लड़कियां आपस में खुसर-पफुसर करतीं। पिफस्स से हंसतीं और तेज कदमों से आगे बढ़ जातीं। रमेश पांडे किसी दूसरे गोल की ताक में ताक-झांक करने लगते।
पिन्टू को रमश्ेा पांडे की उपस्थिति अब नागवार गुजरने लगी थी । वह मन ही मन कसमसा रहा था और इस आशंका से दो-चार हो रहा था कि तारा कुमारी के आने पर रमेश पांडे कोई लंपटई ना कर बैठें। ऐसा कुछ हुआ तो वह रमेश पांडे को सापफ-सापफ कह देगा कि बाबा, दुकान पर आये ग्राहक से बद्तमीजी हमको पसंद नहीं है। अध्कि से अध्कि क्या होगा, मुंह पफुलायेंगे। तो पफुलाओ भाई, हमरी बला से।
लेकिन बला अपने-आप टल गई।
‘आते हैं रे, सिंगेसरा की दुकान से अपनी साइकिल लेकर ।’ लपकते हुए रमेश पांडे भीड़ में गुम हो गये।
तारा कुमारी और सौ का नोट
जब तक पिन्टू राहत की सांस लेता, तारा कुमारी की साइकिल सामने आ लगी। स्टैंड पर साइकिल खड़ी करती तारा कुमारी लगभग चिल्लाई, ‘लाइए तो हमरा मोबाइल।’
पिन्टू की आंखें तारा कुमारी के चेहरे पर जमी थीं । तारा कुमारी की आंखें पिन्टू के चेहरे पर पड़ीं, तो वह उसी टनक आवाज में बोली, ‘भटर-भटर क्या देख रहे हैं? लाइए हमरा मोबाइल?’
पिन्टू हड़बड़ाया। आंखें चुराते हुए चोर आंखों से तारा कुमारी को देखने का लोभ संवरण नहीं कर पाया। दराज से मोबाइल निकालकर तारा कुमारी को ओर बढ़ाते हुए महसूस हुआ कि उसके भीतर कोई रोमांटिक-सा रिंगटोन बजने लगा है।
‘कितना पैसा हुआ?’ तारा कुमारी ने पूछा।
‘पैसा?’ जी में तो आया कि कहे, पैसे की क्या जरूरता है? लेकिन आवाज घुटकर रह गई।
‘बोलिए न, कितना देना है?’ इस बार तारा कुमारी के स्वर में आजिजी थी।
‘पचास रुपया दे दीजिए।’ किसी के लिए मन से कुछ करने का सुख पहलीबार महसूसते पिन्टू के स्वर में बेबस उदासी थी।
तारा कुमारी ने बैग से टिन का एक डिब्बा निकाला। टिन के डिब्बे में रखे तुड़े-मुड़े सौ के नोट को सीध करते हुए बोली, ‘ठग नहीं न रहे हैं?’
ठगा-सा पिन्टू तारा कुमारी को देखता रह गया। जवाब देते न बना।
‘लीजिए पैसा काटिए।’ तारा कुमारी ने नोट बढ़ाया, ‘हमको जल्दी है।’
‘पफुटकर तो नहीं है।’ पिन्टू थोड़ा परेशान दिखा।
‘तब रखिए। कल दे दीजिएगा।’ तारा कुमारी नोट काउंटर पर रखकर पलटी और अपनी साइकिल की ओर बढ़ गई।
पिन्टू और तारा कुमारी के बीच अगली मुलाकात की संभावना बना नोट पफड़पफड़ा रहा था। पिन्टू ने झट से पकडकर नोट को भींच लिया।
तारा कुमारी साइकिल पर सवार होकर चार कदम बढ़ी ही थी कि रमेश पांडे अपनी साइकिल लिये-दिये आ पहुंचे1 जाती हुई तारा कुमारी को देखकर कुछ ज्यादा ही गहरे तक मुस्कराये ।
‘तारा तुमरी दुकान पर काहे आई थी, पिन्टुआ?’ मुस्की छंाटते रमेश पांडे ने दरयाफ्रत किया।
‘तारा? कौन तारा बाबा?’ पिन्टू अनजान-सा बना।
‘यही लड़किया, जो अभी साइकिल से गई है!’
‘अच्छा, उसका नाम तारा है क्या?’ नाटकीय भोलेपन से पिन्टू ने सवाल उलट दिया।
‘हां रे, कोहरा के रामदहिन शुक्ला की बेटी है।’ रमेश पांडे ने तारा कुमारी की कुंडली बांच दी, ‘इसका बाप स्साला हमरे जजमानी में टांग अड़वले रहता है। उसी के चलते कितना जजमान छिटक गया है।’
पिन्टू को रमेश पांडे का यह लहजा अच्छा नहीं लगा। लेकिन प्रतिवाद करने का साहस भी नहीं हुआ।
रमेश पांडे का प्रलाप जारी था, ‘बाबू जी बोले, गरीब बाभन है। जिये-खाये दो। यही सोच के हमू चुप लगा गये।’
रमेश पांडे चुप होने का नाम नहीं ले रहे थे। पिन्टू से रहा नहीं गया तो झनक पड़ा, ‘ए बाबा, अपना निंदा-पुराण बंद कीजिए तो।’
‘निंदा-पुराण क्या होता है, रे?’ रमेश पांडे की पेशानी पर बल उभरे।
‘जैसे वेद-पुराण होता है, वैसे ही निंदा-पुराण होता है।’ पिन्टू ने चुहल की।
‘हम तो इस पुराण का नाम ना सुने हैं।’
‘आज सुन लिए न।’
‘स्साला, चार अच्छर पढ़ क्या लिया है, लगा हमी को पिंगल पढ़ाने।’ रमेश पांडे ने झिड़की दी।
पिन्टू मुस्कराया। हथेली में दबा सौ का नोट कसमसा रहा था और उसका मन कोहरा गांव की ओर बेलगाम भागा जा रहा था।
पिन्टू की मुस्कराहट को झटका देते रमेश पांडे बोले, ‘हम तो तुमको बताना भूल ही गये थे कि दिगंबर मिश्रा किराया का सौ रुपया पहुंचा देने को बोले हैं।’
पिन्टू की हथेली में बंद सौ के नोट की सांस घुटती-सी जान पड़ी। उसका चेहरा पफक पड़ गयाा।
पिन्टू के पास कुल जमा-पूंजी सौ का यही नोट था और इसे वह दिगंबर मिश्रा को दे दे, ऐसा सोचना ही कष्टकर था। तब? कहां से लाये वह सौ रुपए? ठीक इसी वक्त उसकी छठी इंद्री जागृत हुई और उसने अंधेरे में तीर दाग दिया,‘ए बाबा, लाइए न सौ रुपया उधर1 एकाध् दिन में दे देंगे।’
पिन्टू के लहजे में निहोरा था। रमेश पांडे ने मन ही मन मजा लेते हुए चुटकी ली,‘स्साला, कहां तो दारू पिला रहा था, कहां उधर मांगे लगा। तुमरा कौनो भरोसा ना है।’
‘बताइए, दीजिएगा कि नहीं?’ पिन्टू ने बेसब्री से दो टूक पूछा।
‘रजकुमरिया को देने के लिए रखे थे।’ रमेश पांडे शर्ट की जेब से सौ का नोट निकालते हुए बोले, ‘अभी काम चला देते हैं, काहे से कि दिगंबर मिश्रा कसाई हंै। उनका पैसा देवे में देरी किये तोे दुकानदारी बंद करा देंगे। लेकिन एक बात कान खोल के सुन ले,जल्दिए लौटा देना।’
पिन्टू की आंखें चमकीं। चेहरे पर रौनक लौटी। झपटकर रमेश पांडे से नोट लिया और आवेग की रौ में लगभग चीख पड़ा, ‘बाबा की जय हो । सूद समेत लौटा देंगे।’
पिन्टू तारा कुमारी का नोट किसी कीमत पर खरचना नहीं चाहता था, लेकिन मुश्किल यह थी कि कल वह तारा कुमारी के पचास रुपए लौटयेगा, तो किस तरह? उसके पास रमेश पांडे का दिया सौ का नोट था,जिसे वह मुखिया दिगंबर मिश्रा को दे देगा। लेकिन तारा कुमारी को पचास रुपए कैसे लौटाएगा? पिफलहाल, कोई राह नहीं सूझ रही थी। लेकिन जो भी हो वह तारा कुमारी का सौ वाला नोट किसी को नहीं देगा, यह तय हैै।
उस शाम दुकान बढ़ाते-बढ़ाते अचानक सिमेंट दुकानदार राजनाथ यादव का बुलावा आ गया। पिन्टू लपककर सड़क पार राजनाथ यादव की दुकान पर पहुंचा। राजनाथ यादव उसे देखते ही बोला, ‘अरे पिन्टुआ, देख तो हमरा मोबाइल काहे बार-बार बंद हो जा रहा है।’
पिन्टू के भीतर चालाकी ने सिर उठाया। उसने राजनाथ यादव से मोबाइल लेकर मुआयना किया, टप-टप ‘की बटन’ दबाकर मर्ज जानने की कोशिश की पिफर बोला, ‘आपका मोबाइल तो हैंग हो जा रहा है। लगता है वायरस लग गया है।’
‘तब? कैसे होगा?’ राजनाथ यादव ने बचैनी से पहलू बदला, ‘हमरा तो सब काम ही ठप्प हो जायेगा, पिन्टुआ । कुछ उपाय कर न रे तू।’
‘अरजेंट है तो सौ रुपया लगेगा!’ पिन्टू जानता था कि राजनाथ यादव का सारा बिजनेस मोबाइल पर निर्भर है, लिहाजा उसने शुष्क लहजे में उसकी तरपफ पांसा पफेंका।
‘सौ रुपया?’ राजनाथ यादव ने रौब में लेने की कोशिश की, ‘लूट है, क्या रे?’
‘आपको लूट बुझाता है तो जाने दीजिए।’ पिन्टू चलने को उ(त हुआ, ‘समस्तीपुर-पटना भेज के बनवा लीजिए। रेट पता चल जायेगा।’
राजनाथ यादव हड़बड़ाया। पिन्टू को रोकते हुए बोला, ‘स्साला, बहुत भाव खा रहा है। बता, कब तक बना देगा?’
‘एक घंटा लगेगा!’ राजनाथ यादव को रास्ते पर आते देख पिन्टू नरम पड़ा।
‘ठीक है। बना दे।’ राजनाथ यादव ने मोबाइल पिन्टू के हवाले किया।
पिन्टू जानता था कि राजनाथ यादव का मोबाइल ‘हैंग’ नहीं कर रहा, बल्कि बैटरी को टच करनेवाला क्लिप ढीला हो गया है और उसे बनाने में दस मिनट से ज्यादा समय नहीं लगेगा। लेकिन इस काम के लिए राजनाथ यादव से सौ रुपए झींटना संभव नहीं था। ‘हंग’ ‘वायरस ‘और ’ एक घंटा’ ही वह तरीका था, जिससे मोबाइल की बीमारी की गंभीरता को राजनाथ यादव समझ सकता था। और पिन्टू की जरूरत ने उसे यह गुर सिखा दिया था।
मुखिया दिगंबर मिश्रा को रुपए दे देने के बाद उस रात पिन्टू की शर्ट की जेब में तारा कुमारी का दिया सौ का नोट था, तो पैंट की जेब में राजनाथ यादव से मिले पचास-पचास के दो नोट थे। वाकई तारा कुमारी का नोट उसके लिए सौभाग्यशाली साबित हुआ था , तभी तो राजनाथ यादव के रूप में उसे तत्काल एक ग्राहक मिल गया था, लिहाजा तारा कुमारी का दिया सौ का नोट साबुत बच गया था। उस रात उसने सौ के उस साबुत नोट को कई-कई कर चूमा, गोया तारा कुमारी के अहसास को चूम रहा हो।
दूसरे दिन, वह दुकान पर बैठा बेसब्री से तारा कुमारी के आने का इंतजार कर रहा था। बार-बार घड़ी देखता। बार-बार सड़क को निहारता। ब्लू कुर्ता, ह्वाइट सलवार और दो चोटियों वाली साइकिल से आती हर लड़की उसे तारा कुमारी जान पड़ती। उसकी उम्मीद टूटती। प्रतीक्षा का ध्ैर्य टूटता। आखिरकार तूपफानी गति से आती तारा कुमारी की साइकिल ठीक उसकी दुकान के सामने आकर लगी । तारा कुमारी जब तक साइकिल स्टैंड पर खड़ी करके काउंटर तक आती कि इसी बीच एक साथ दो लड़के आ टपके । दोनों के हाथ में मोबाइल थे। दोनों के मोबाइल में कोई गड़बड़ी थी। पिन्टू को लगा तारा कुमारी के आने के साथ ही दो-दो ग्राहकों के टपकने का मतलब है, तारा कुमारी का पैर उसके लिए बहुत शुभ है। लेकिन मलाल इस बात का हुआ कि ऐन इसी वक्त उन दोनों लड़कों के आने से मिलने वाला एकांत भंग हो गया था। मन मारकर उसने लड़कों को जवाब दिया, ‘मोबाइल छोड़ जाइए। शाम तक बन पायेगा।’
उसकी बात खत्म होते न होते तारा कुमारी काउंटर के पास आ खड़ी हुई। उसने जेब से पचास का नोट निकाला और तारा कुमारी की ओर बढ़ा दिया।
तारा कुमारी नोट लेते हुए टनक आवाज में बोली, ‘खुदरा रखा करिए। बेमतलब न आना पड़ा।’
‘जी ।’ बेहद संकोच से भरे पिन्टू ने जैसे अपनी गलती स्वीकार की।
तारा कुमारी उलटे पांव लौटी और साइकिल पर सवार हो पफुर्र हो गई ।
एक लड़के ने आह भरी, ‘बड़ी टपारा है हो!’
इससे पहले कि दूसरा लड़का कुछ बोलता, पिन्टू की भौंहें तन गईं, ‘स्टूडेंट हैं और लड़की पर घटिया टोंट कसते हैं। शरम नहीं आती?’
दूसरा लड़का सकपकाया, लेकिन पहला लड़का ढिठाई पर उतर आया था, ‘मोबाइल बना, मोबाइल । मुशहर स्साला, उपदेश झाड़ता है।’
पिन्टू के भीतर गहरे तक कुछ ऐसा करका कि उसका वजूद चटखकर रह गया। दोनों लड़के उसकी औकात बताकर जा चुके थे।
जिन्दगी मनहूस रिंगटोन
पिन्टू सन्नाटे में डूबा काउंटर पर खड़ा कसमसाता रहा। मन में कई-कई सवाल मथ रहे थे-इस लड़के की बद्तमीजी से वह इतना आहत क्यों है? तारा कुमारी ने ही कौन-सा पफूल बरसाया था? जिस दुराव से वह पेश आई थी, उसमें उसका घमंड नहीं तो क्या था? बाभन की बेटी है, अपनी जाति का दर्प कैसे भूल सकती है? लेकिन वह, अपनी औकात कैसे भूल गया? कैसे भूल गया कि ढिबरी बाजार का बच्चा-बच्चा जानता है कि वह मुशहर है?
पिन्टू के सिर की नसें टभकने लगीं। आंखों के सामने बेशुमार ख्याल भरभराकर गिर रहे थे । वह उस मलबे में गर्क हुआ जा रहा था, जिसमें एक लंबी रात की अकुलता थी। अनखुली-अनकही बातों के सिरों में उलझी बेचैनी थी। सौ के नोट पर चस्पां स्पर्श-गंध् को रोम-रोम में महसूसने का उल्लास था। एक स्वप्न जिसे आंखभर देखने की इच्छा पहली बार जागी थी।, उन्हीं आंखों के सामने सब ध्वस्त हुआ दिख रहा था।
अचानक उसके मोबाइल की घंटी बजी। बेमन से स्क्रीन पर नजर डाली। नंबर ध्ुंध्ला दिख रहा था। एकदम रिसीव करने की इच्छा नहीं हुई। बजते-बजते घंटी चुप हो गई। उसने एक गहरी सांस ली। आंखों की नमी को पोंछा और काउंटर पर रखे दोनों लड़कों के मोबाइल उलट-पुलट कर देखने लगा। मोबाइल की घंटी पिफर बजी। बजती रही। आजिजी में मोबाइल उठाकर कान से सटाया, ‘हल्लो।’
‘हम राजकुमारी बोल रहे हैं।’ दूसरी ओर राजकुमारी पासिन थी, ‘रमेश पांडे को देखे हैं?’
‘ना। आज तो ना दिखाई दिये हैं।’ पिन्टू ने बेमन से पूछा, ‘क्या बात है?’
‘ना। बस ऐसे ही पूछ रहे थे।’ राजकुमारी की आवाज में मायूसी थी।
पिन्टू चुप रहा, इस प्रतीक्षा में कि शायद राजकुमारी कुछ और कहे। लेकिन दूसरी ओर से काॅल कट गई थी। उसने एक बार अपने मोबाइल को घूरा, पिफर ठंडी सांस खींचते एक आह-सी उभर गई-अभागी को नहीं पता कि रमेश पांडे उसे छल रहा है। बाभन सब दुआरी मुंह मारेगा, अपने दुआरी झांकने भी ना देगा।
डूबते-उतराते दिन की शाम चार बजे, पिन्टू ने उत्क्रमित राजकीय उच्च मध्य विद्यालय की छुट्टी की घंटी को अपने सीने पर टन्न, टन्न, टन्न बजता महसूस किया। एक नामालूम उम्मीद से आंखें सड़क पर टांक दीं। भीड़ में एक पहचाना-सा चेहरा तलाशने की तमाम सावधनी के बावजूद, वक्त हाथ से पिफसल चुका था।
पिफसलते वक्त के बीच, कई दिन निकल गये।
इस दौरान पिन्टू ने कई कविताएं लिख डालीं। ‘चुनी हुई शायरी’ के कई पन्नों पर अपने हाले दिल की तस्दीक करते शेरों को ‘अंडर लाइन’ किया। अपने मोबाइल में एक उदास ध्ुन वाला गाना डाउन लोड किया, ‘मैं तेरा कल भी इंतजार करता था, मैं तेरा अब भी इंतजार करता हूं।’
इस रिंगटोन को सुनकर एक दिन रमेश पांडे ने टोका, ‘यही मनहूस गाना एक ठो मिला था तुमको?’
‘हमारी जिन्दगी का तो ‘रिंगटोन’ ही मनहूस है, बाबा।’ पफीकी-सी हंसी होंठों पर पसरी, ‘जनमजात मनहूस!’
‘ए पिन्टू एक बात बोलें।’ रमेश पांडे गंभीर दिखे। रोज की तरह खिलंदड़े भाव से परे उनकी यह मुद्रा अप्रत्याशित थी, ‘तू लुध्यिाना चला जा। तोरा वहीं गुजारा है।’
‘क्या? ऐसा क्यों कह रहे हैं,बाबा ?’ पिन्टू की आंखों में आश्चर्य था।
‘यहां रहेगा, तो जनम-जात तोरा पीछा ना छोड़ेगा। बाभन, बनिया, लाला, राजपूत, यादव, भूमिहार, पासी, मुशहरे से मुक्ति ना मिले वाला है।’ रमेश पांडे के भीतर से जैसे कोई और रमेश पांडे बोल रहा था। आवाज, अंदाज सबकुछ अप्रत्याशित।
‘क्या हुआ बाबा, आज दिने-दोपहरिया चढ़ा लिये हैं, क्या?’ पिन्टू कुमार सचमुच रमेश पांडे के होशो-हवास की पुष्टि करना चाहता था।
‘तुमको पता है, हम नेम के पक्का हैं। दिन में नो दारू!’ रमेश पांडे अभी भी संजीदा थे।
‘बाबा, एक बात बताइए, अपना घर, जमीन, जन सब छोड़ के हम काहे भागें? जैसे सबका नाल यहां गड़ा है, वैसे ही हमारा भी यहीं गड़ा है।’ पिन्टू ने तर्क किया।
रमेश पांडे को तर्क-वर्क में कोई रुचि नहीं थी। उन्होंने इसे विरोध् समझा। झट से पिन्टू को झिड़क बैठे,‘ तो स्साला, मर। तोरा माथा में कुच्छो घुसे वाला ना है।’
पिन्टू मुस्कराकर रह गया।
अभी वह अपनी मुस्कराहट से बाहर भी नहीं निकला था कि उसकी सांसंे टंगी कि टंगी रह गईं। आंखें पफैलीं और जिस्म किसी तिलिस्म की गिरफ्रत में कसता जान पड़ा। एक करिश्मा बिल्कुल सामने था।
तारा कुमारी अपनी एक सहेली के साथ पैदल-पांव आती, ठीक उसकी दुकान के सामने खड़ी हो गई थी। रमेश पांडे ने रहस्यमय मुस्कराहट के साथ पिन्टू को देखा। लेकिन पिन्टू रमेश पांडे को देखे, इतना होश कहां था।
‘देखिए, इसका मोबाइल खराब हो गया है।’ अपनी सहेली की ओर इशारा करती तारा कुमारी बोली।
पिन्टू तारा कुमारी की आवाज और उपस्थिति के जादू में बंध चुप था।
‘शाम तक बना दीजिएगा?’ तारा कुमारी के स्वर में मियाद के बावजूद पिन्टू से आश्वासन की अपेक्षा थी।
‘बना दे रे, पिन्टुआ, बना दे।’ तपाक से बीच में ही टपक पड़े रमेश पांडे ने तेज आवाज में पैरवी-सी की।
पिन्टू को स्थिति का आभास हुआ। चोरी पकड़े जाने जैसा बोध्। झटपट बोल पड़ा, ‘क्या खराबी है?’
‘जब ना, तब अपने आप बंद हो जाता है।’ जवाब तारा कुमारी की सहेली ने दिया।
‘बन जाएगा!’ दो टूक सख्त लहजे में बोला पिन्टू।
तारा कुमारी अपनी सहेली के साथ जाने के लिए मुड़ी कि रमेश पांडे ने टोक दिया, ‘बाबू जी का क्या समाचार है, तारा?’
‘उनका समाचार वही जानें। उन्हीं से पूछिएगा!’ टन्न से जवाब देती तारा कुमारी सहेली का हाथ खींचती आगे बढ़ गई।
पिन्टू समूचा कान हो गया था। तारा कुमारी के अंदाज पर उसके मन में उठा- जियो, तारा, जियो। रमेश पांडे के होंठों पर मुस्कान तिर्यक हो आई थी।
‘जैसा बाप, वैसी बेटी। सबके सब चढ़बांक ।’
‘ऐसा काहे बोलते हैं, बाबा?’
‘इसका बाप अपने आपको बड़का बाभन बूझता है। सरयूपारी। क्या तो तरवा का बिआह सरयूपारिये में करेगा!’ रमेश पांडे ने पिच्च से खैनी के साथ ही जैसे तिताई भी थूकी, ‘बाभनो सब में कम घोर-मट्ठा नहीं है।’
पिन्टू का चेहरा स्याह पड़ गया। वह जो उसके अंदर जादू-सा जगा रहा था, तिरोहित होता-सा जान पड़ा। उसने कांउटर कसकर पकड़ लिया। पैर जमीन पर जमाया, गोकि खुद को जमीन पर लाने की कोशिश कर रहा हो।
सायास खिंच गई चुप्पी के इस पार पिन्टू था, तो उस पार रमेश पांडे थे।
भारी मन से पिन्टू तारा कुमारी की सहेली के मोबाइल का मुआयना करने लगा। रमेश पांडे उठे और बगैर बोले खिसक गये।
पिन्टू को आज रमेश पांडे का व्यवहार अजीब-सा लग रहा था। लगा, उनका चित्त स्थिर नहीं है।
चित्त तो पिन्टू का भी स्थिर नहीं था। मोबाइल बनाने के बजाय उसने दराज में से एक पुरानी पत्रिका निकाली और उलटने-पुलटने लगा। पत्रिका पढ़ चुका था, पिफर भी वह किसी-किसी पन्ने पर रुकता, कुछ पढ़ता और आगे बढ़ जाता। वह, जो वह खोज रहा था, किसी पन्ने पर उसके न मिलने की व्यग्रता उसके चेहरे पर सापफ दिख रही थी।
जिंदगी की सबसे हसीन हंसी
शाम चार बजे, रोज की तरह उत्क्रमित राजकीय उच्च मध्य विद्यालय की घंटी बजी-टन्न…टन्न…टन्न। लेकिन ताज्जुब कि पिन्टू भीतर के न कोई घंटी बजी,न कोई ध्ुन उठी। सन्नाटों से भरी आंखे अनायास ही रोज की तरह स्कूली लड़कों-लड़कियों के हिलकोरे लेती झुंड को ताकती-निहारती रहीं।
इसी भीड़ से निकलती तारा कुमारी अपनी सहेली के साथ साइकिल लिये-दिये दुकान पर आ खड़ी हुईं।
पिन्टू ने दराज से निकालकर मोबाइल काउंटर पर रखकर शुष्क स्वर में कहा, ‘साठ रुपया। खुदरा दीजिएगा।’
तारा कुमारी सकपकाई। उसकी सहेली तो तारा कुमारी का चेहरा ही देखती रह गई।
‘लगता है, गुस्सा हैं क्या?’ तारा कुमारी की आवाज अनेपक्षित रूप से नरम थी।
पिन्टू का चेहरा सपाट था।
‘उस दिन खुदरा वाली बात बोले। इसी से ऐसा बोल रहे हैं?’ तारा कुमारी को जैसे शब्द नहीं मिल रहे थे। स्वर में सचमुच संकोच था।
पिन्टू चुप था।
‘छोड़ दीजिए, आज पैसा नहीं है। कल ले जायेंगे।’ मायूस-सी तारा कुमारी ने सहेली का हाथ पकड़कर खींचा, ‘गौरी चल!’
कसमसाती-सी सहेली गौरी हिली नहीं। शायद, कोई उम्मीद उसे रोके हुए थी। पिन्टू ने देखा, गौरी की आंखों में याचना-सी थी। लेकिन तारा का चेहरा तो पूरी तरह उतरा हुआ था। निष्प्रभ-सी वह, किसी शून्य में खड़ी थी।
पिन्टू उस शून्य में गहरे पछतावे के साथ दाखिल हुआ, ‘ले जाइए। पैसा बाद में दे दीजिएगा।’
गौरी की आंखें चमकीं। बगैर देरी किये मोबाइल झट से कब्जे में लेकर, उसने पिन्टू को भरोसा दिलाया, ‘कल आपका पैसा पक्का मिल जायेगा।’
पिन्टू ने तारा कुमारी को भर आंख देखा। तारा कुमारी अभी भी शून्य में खड़ी थी। गौरी ने उसे हाथ पकड़कर खींचा, ‘तारा, चल!’
तारा कुमारी घिसटती-सी साइकिल तक गई। सिर झुकाये-झुकाये साइकिल के हैंडिल को थामा और सिर झुकाये हुए ही साइकिल पर सवार हो गई।
पिन्टू को उम्मीद थी कि तारा कुमारी एक बार मुड़कर जरूर देखेगी।
वह उम्मीद की आंखों को तारा कुमारी की पीठ पर उसके ओझल हो जाने तक टिकाये रहा। लेकिन तारा नहीं मुड़ी, तो नहीं मुड़ी।
जाते हुए इस दिन के साथ पिन्टू के भीतर एक ध्ूसर बियाबान हांय-हांय करने लगा। सड़क पर रोशनियां थीं। बाजार में रौनक। लेकिन पिन्टू के लिए ये सबकुछ बेमानी-सा था। वह तो बस तारा कुमारी के चेहरे की मायूसी के मायने बूझने में डूब-उतरा रहा था। ऐसे में, जबकि होना नहीं चाहिए था, पता नहीं क्यों पिन्टू को रमेश पांडे की बेतरह याद आई। रमेश पांडे का कोई पता नहीं था। पता नहीं बबवा कहां मंुह मार रहा है? न इध्र आया, न पफोन-वोन किया। जी में आया कि रमेश पांडे को पफोन करे। मोबाइल हाथ में लिया ही था कि अचानक रिंगटोन बजने लगा- ‘मैं तेरा कल भी इंतजार करता था, मैं तेरा अब भी इंतजार करता हूं।’ अनजान नंबर था। बेमन से ‘रिसीव’ किया।
‘हलो!’
दूसरी ओर से आवाज आई, ‘हम तारा बोल रहे हैं।’
पिन्टू को अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ। खुद को विश्वास दिलाने के लिए पिफर से पूछा, ‘कौन? कौन बोल रहा है?’
‘तारा। तारा कुमारी बोल रहे हैं।’ आवाज तारा कुमारी की ही थी।
बजते जल-तरंगों की ध्ुन ऐसी ही होती होगी, महसूस किया पिन्टू ने। खुद पर काबू रखने की कोशिश करते हुए पूछा, ‘आपको मेरा नंबर कैसे मिला?’
‘दुकान के बोर्ड पर तो लिखा है।’ तारा कुमारी की आवाज में गजब की मासूमियत थी।
‘क्या बात है? काहे पफोन की?’
‘आप गुस्सा हैं क्या?’
तारा कुमारी के इस सवाल पर लरजकर रह गया पिन्टू। वह गुस्सा है, ऐसी पिफक्र तारा कुमारी को क्यों हुई? आजतक तो किसी ने उसके गुस्सा या गम की पिफक्र नहीं की? यकायक उसका मन भर आया। जवाब देते नहीं बना।
‘हमको लगा, आप गुस्सा हैं।’ तारा कुमारी उसके जवाब का इंतजार कियेे बगैर बोली, ‘हमको अच्छा नहीं लगा। इसीलिए पफोन किये हैं।’
पिन्टू की इच्छा हुई कि वह चुपचाप तारा कुमारी को सुनता रहे। लेकिन यह सोचकर कि उसकी चुप्पी से वह नाराज न हो जाये, बोला, ‘हम काहे गुस्सा होंगे?’
‘आप मेरी सहेली के सामने कितना खराब से बोले!’ तारा कुमारी की आवाज का संगीत बज रहा था, ‘हम कितना अध्किार से उसको बोले थे कि मोबाइल बन जायेगा। हम कहेंगे तो पैसा उधर भी रह जायेगा।’
‘जी…जी…, आप ठीक बोली थीं।’ बड़ी मुश्किल से बोल पाया पिन्टू।
‘जी…जी…क्या कर रहे हैं? हमरी बेइज्जती हुई, उसका क्या?’ तारा कुमारी के स्वर में उलाहना था।
‘ग…गलती हो गई।’ पिन्टू हकलाया
‘कुछ बूझते नहीं हैं। गलती हो गई। यही करते हैं।’
उलाहने का अंदाज झिड़की में तब्दील हो चुका था।
‘जी!’ क्या कहे, कुछ नहीं सुझा पिन्टू को।
‘जाइए, मापफ किया!’ हंसी तारा कुमारी।
पिन्टू के भीतर यह हंसी अनारदानों-सी बिखर गई। उसे बड़ी देर तक वह हंसी महसूस होती रही, गोकि दूसरी ओर से आवाज आनी बंद हो गई थी। यकीन की सतह पर यह उसकी जिंदगी की सबसे हसीन हंसी थी, जिसे वह सात तालों में महपफूज रखना चाहता था। उसने ताले बंदकर चाभी हवा में उछाल दी। आसमान की ओर देखा तो चाभी उड़ती हुई चांद के पार जा चुकी थी।
दो दूनी चार आंखें
आसमान में हजारहा तारे टिमटिम कर रहे थे और पिन्टू उन तारों की आंखों में आंखें डाले सारी रात गुफ्रतगू करता रहा। यह अनिंदी रात उसकी तमाम रातों से कहीं ज्यादा जगमग थी। उसने खुद को एक ऐसे इंसानी जिस्म के रूप में तब्दील होता हुआ महसूस किया, जिसके अंदर प्यार करने वाला दिल ध्ड़क रहा था। यह दिल इस कदर जोर-जोर से ध्ड़कने लगा था कि पिन्टू को खुद से बतियाना मुश्किल हुआ जा रहा था। वह अपने-आप से पूछना चाहता था कि पिन्टू, आग के इस खेल में समिध हो जाने की चाहना आखिर किस ईश्वर का अभिशाप है? लेकिन ध्ड़कते दिल के शोर में कोई संवाद संभव नहीं हो पा रहा था।
वह बतियाना चाहता था खूब-खूब। किसी से भी, कुछ भी। लेकिन किससे? किससे करे दिल की बात? आस-पास की झोपड़ियों से ध्ुआं उठ रहा था। बच्चे सूअरों के पीछे ‘हुल्ल-हुल्ल’ कर रहे थे। मर्द बच्चों को गलिया रहे थे। औरतें अपने मर्दों के इस शौर्य पर हुलस रही थीं। पिन्टू को ये सारा का सारा दृश्य बेहद खुशगवार लगा। वह बेसख्ता बच्चों के इस खेल में शामिल हो गया।
बच्चे ठिठके। क्षणभर को उसे कौतुक से देखा। पिफर ‘हो-हो’ कर उछल पड़े। मर्द-औरत सबके सब पिन्टू को बच्चों के साथ खेलते देख आपस में मुस्काये। यह इस सुबह की सबसे ताजा मुस्कराहट थी।
मां ने आवाज दी, ‘पिन्टू, मोबाइल बज रहा है, रे?’
पिन्टू चिहुंका। अपने-आप में लौटा। मोबाइल बज रहा है? कौन है? कहीं तारा कुमारी तो नहीं? कलेजा मुंह को आ लगा। भागा-भागा झोंपड़ी में घुसा। मोबाइल की घंटी बंद हो चुकी थी। स्क्रीन पर मिस काॅल देखा- रमेश पांडे!
हड़बड़ा कर रमेश पांडे को काॅल लगाया। उध्र से आवाज आई-यह नंबर पहुंच से बाहर है।
पता नहीं किस खोह में है बबवा कि मोबाइल लग ही नहीं रहा। दुबारा पिफर काॅल लगाता कि एक मैसेज आ गया। खोलकर देखा, तो दिल ध्क्क कर गया-गुड माॅर्निंग।
वाकई, यह सुबह बेहद खुशगवार थी। मैसेज के साथ नाम नहीं था। लेकिन नंबर तारा कुमारी का था, इसमें कोई शक नहीं। अपने मोबाइल को चूमता पिन्टू हवा में उड़ रहा था। उड़ता हुआ वह बच्चांे के पास आया और रजवा को पकड़कर बोला, ‘तुमको मोबाइल का काम सीखना है न?’
रजवा चकित। गर्दन हिलाकर रजवा ने हामी भरी।
‘तो चल, आज से शुरू कर।’ रजवा के सिर पर हाथ पफेरते पिन्टू ने प्यार से एक धैल जमाया, ‘हम दुकान जा रहे हैं। तुम तैयार होकर आ जाना।’
थोड़ा चकित, थोड़ा आह्लादित रजवा पिन्टू को जाता देखता रहा।
दुकान खोलकर पिन्टू अभी काउंटर पर बैठा ही था कि तारा कुमारी की साइकिल आ लगी। पिन्टू के जिस्म के सारे तार झनझना उठे। लगा कि कंठ सूखा, कि होंठ सूखे, कि आंख पथराई, कि पांव कांपे, कि हाथ सुन्न हो गये।
तारा कुमारी साइकिल खड़ी कर पास आई। पिन्टू गुम था। तारा कुमारी की खनकती आवाज गूंजी, ‘गौरी आज नहीं आई। पैसा भिजवाई है, वही देने आये हैं।’
पिन्टू चुप था।
तारा कुमारी साठ रूपये काउंटर पर रखते हुए बोली, ‘गिन लीजिए।’
पिन्टू ने पचास और दस के नोट को निहारा।
‘ऐसे क्या देख रहे हैं? गिन लीजिए।’ तारा ने जिद-सी की।
‘आप दी हैं, तो क्या गिनना!’ पिन्टू को अपनी आवाज अनचीन्ही-सी जान पड़ी
‘अच्छा ये बात बताइए, आप इतना सब क्या पढ़ते रहते हैं?’ तारा कुमारी की उत्सुकता में उसी की-सी चपलता थी।
‘बस ऐसे ही।’ पिन्टू बोलना तो बहुत कुछ चाहता था, लेकिन भीतर की जकड़न टूट नहीं रही थी।
‘हम तो जब देखते हैं, आप किताबे में घुसे रहते हैं।’ तारा कुमारी मचल-सी पड़ी।
‘मन लगाने के लिए कुछ-कुछ पढ़ते हैं।’ पिन्टू ने थोड़ा साहस किया।
‘अच्छा करते हैं। यहां तो पढ़वइया लड़का सब भी कुछ नहीं पढ़ता है। सबका सब लखेड़ा है।’ तारा कुमारी ने मुंह बिचकाया,‘सोचता है सब चोरी करके पास हो जाएंगे,तो पढ़ने की क्या जरूरत है?’
‘जाने दीजिए। जो पढ़ेगा अपने लिए, जो नहीं पढ़ेगा अपने लिए।’ इस बार पिन्टू थोड़ा और खुला,‘जो चोरी से पास करेगा,वो जिन्दगीभर खाली चोरी-चकारी ही करेगा।’
तारा कुमारी को पिन्टू की यह संजीदगी अच्छी लगी। उसने मुग्ध्भाव इसरार किया,‘सुनिए न, पढ़ने के लिए हमको कुछ दीजिएगा?’
अप्रत्याशित था यह आग्रह । पिन्टू ने अविश्वास से देखा तारा कुमारी को। तारा कुमारी उसके उत्तर की प्रतीक्षा में उसे टुकुर-टुकुर ताके जा रही थी। जी में आया, काश! दुनिया की सारी खूबसूरत किताबें तारा कुमारी को दे पाता। लेकिन खुद पर काबू रख इतना ही पूछ पाया, ‘क्या पढ़िएगा?’
‘आपको जो पसंद हो, वही दीजिए!’ तारा कुमारी के बंद होंठों में मुस्कुराहट दबी हुई थी, ‘पढ़के लौटा देंगे।’
पिन्टू ने साहस कर तारा कुमारी की मुस्कराहट में पहली बार अपनी मुस्कुराहट मिलाई। दो मुस्कुराहटें मिलकर चार गुना र्हो आईं।
खुमारी में डूबा पिन्टू काउंटर के बगल में बनी शेल्पफ में रखी किताबों को तजबीजता रहा। पिफर कुछ सोचता हुआ, किताबों के बीच से एक किताब निकाली-तुम्हारे लिए। यह नीरज की कविताओं का संग्रह था। किताब तारा कुमारी की ओर बढ़ाते हुए उसका हाथ कांपने लगा। तारा कुमारी ने पिन्टू के कांपते हाथ में कांपती किताब का टाइटल गौर से देखा, पिफर पिन्टू को देखा। दोनों की आंखें मिलीं। निमिष मात्रा को एक-दूसरे में गुंथी आंखों ने पिन्टू के पूरे वजूद में हलचल-सी पैदाकर दी। जब तक वह कुछ समझता, तारा कुमारी ने किताब उसके हाथ से खींचकर अपने बैग में डाला और लगभग पफुसपफुसाते हुए बोली, ‘जा रहे हैं। स्कूल को देरी हो जाएगी।’
पिन्टू की इच्छा हुई, पूछे, ‘देर न होती तो कुछ देर और रुकती क्या?’
तारा कुमारी जा चुकी थी। प्रश्न प्रश्न ही रह गया था।
खुद से प्रश्न करते, खुद ही उत्तर देते पिन्टू का मन किसी काम में नहीं लग रहा था। यहां तक कि कोई किताब उठाने की भी इच्छा नहीं हो रही थी। बस दो दूनी चार आंखें, आंखों में तिर-तिर जातीं और वह आंखें मूंदकर उस सिहरन को महसूस करता। इसी मनःस्थिति के बीच ही रजवा की आवाज आयी, ‘भइया हो, मुखिया जी आपको बुला रहे हैं।’
पिन्टू ने अचकचाकर आंखें खोलीं। सामने खड़ा रजवा हांपफ रहा था।
‘क्या हुआ, रे? काहे इतना हांपफ रहा है?’
‘भइया, मुखिया जी का आदमी आपको खोजते टोला में आया था।’ रजवा की सांसंे तेज चल रही थीं। आवाज भी उतनी ही तेज थी, ‘आप नहीं मिले, तो हमको बुलाने के लिए भेजा है। जल्दी चलिए।’
पिन्टू को कुछ समझ नहीं आया। मुखिया जी काहे बुलाये हैं? ऐसा क्या अरजेंट काम आ गया? किराया तो बाकी ना है, पिफर मुखिया जी हमको काहे खोज रहे हैं?
जो भी हो, जाना तो पड़ेगा ही। मन मारकर दुकान बंद किया। ताला लगाकर रजवा के साथ चल पड़ा।
रमेश बाबा और नेटवर्क गायब
मुखिया दिगंबर मिश्रा की दुआरी पर भीड़ जमा थी। वहां मौजूद बेकली किसी अनहोनी की तस्दीक कर रही थी। वातावरण में इस कदर तनाव व्याप्त था कि पिन्टू का दिल जोर-जोर से ध्ड़कने लगा। उसे यहां क्यों तलब किया गया है? कहीं तारा कुमारी से उसे बतियाते किसी ने देख तो नहीं लिया ? इस आशंका के साथ ही उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं। वह कठुआया-सा जहां का तहां थम गया था।
उस पर नजर पड़ते ही भीड़ में मरमरी उठी। एक साथ कई जोड़ी आंखें उसपर आ टिकीं। उन आंखों के बीच से बगैर किसी भूमिका के मुखिया दिगंबर मिश्रा का सवाल सीध्े उसके सीने पर ध्क्क से आकर लगा,‘अरे पिन्टुआ, तोरा तो जरूर पता होगा कि रमेश पांडे कहां लुकाया है?’
सवाल रमेश पांडे से जुड़ा है, यह जानकर पिन्टू की जान में जान लौटी। भीड़ उसकी तरपफ देख रही थी। उसने खुद को संयतकर जवाब दिया, ‘ना! हमको कुछ ना पता है,मुखिया जी।’
‘झूठ बोल रहा है, मुखिया जी, झूठ।’ भीड़ के बीच बैठा बौखलाया-सा रामधरी पासी चीखा। यह राजकुमारी पासिन का बाप था। उसके मुंह से झाग निकल रहा था, ‘दिन-रात इसी के साथ बैठते थे रमेश बाबा । इसको सब पता है। चार जूता मारिए सब बक देगा।’
‘इसको जूता काहे मारिएगा, भाई? तुमरी बेटी भागी है रमेश पांडे के साथ, तो इसमें इसकी क्या गलती है?’ यह विशंभर मिश्रा थे। उनका चेहरा तमतमा रहा था। वह एकबारगी हत्थे से ही उखड पड़ेे थे, ‘बाभनटोली को नास के रख दी तुमरी बेटी और सान रहे हो सगरे गांव को?’
पिन्टू सन्न। विशंभर मिश्रा उसका पक्ष ले रहे हैं, सहसा उसे विश्वास नहीं हुआ ।आज सूरज पश्चिम से उगा क्या? सामने जो सुन-देख रहा था, उसे झुठलाये भी तो कैसे? कहीं विशंभर मिश्रा की चाल तो नहीं है, मुखिया दिगंबर मिश्रा के खिलापफ? इस खयाल के साथ ही पिन्टू असहज हो आया।
‘सुनिए, जो हुआ, गलत हुआ । इससे गांव की नाक कटी है। दोनो मिल जाये, इसके बाद ही सब हिसाब होगा।’ मामला बेहाथ होते देख मुखिया दिगंबर मिश्रा लगे हाथ अपने गोतिया विशंभर मिश्रा की काट पर उतर आयेे, ‘अभी तो रजकुमरिया और रमेश पांडे का अता-पता लगाना जरूरी है।’
लहजा म्ुखिया दिगंबर मिश्रा का जितना ठंडा था, उससे कहीं ज्यादा सुननेवालों का कलेजा दहशत से कांपाा।
चैतरपफा तने सन्नाटे के बीच रमेश पांडे के बाबू जी कैलाश पांडे की मिमियाती-सी आवाज उभरी, ‘ससुरा पासिन के पफेरा में सब ध्रम नास के रख दिया। मिलियो जाय तो भी हमरा लिए रमेसवा मर गया, समझिए।’
‘कोई मरे चाहे, जिये। हमरी बेटी ना मिली तो हम केस करेंगे, केस।’ रामधरी पासी तड़प उठा। उसने पूरी पंचायत को खुली चुनौती दे डाली थी।
सभा क्षणभर को सनाके में आ गई। लेकिन अगले ही क्षण विशंभर मिश्रा अगिया बैताल-सा गरज पड़े, ‘स्साला पासी, बेटी से ताड़ी बेचवाता था, तब ना कुछ सोचा। अब केस-मुकदमा बतियाता है। हम लोग क्या यहां चूड़ी पहिनके बैठे हैं, रे मादर…!’
इससे पहले कि स्थिति बिगड़े मुखिया दिगंबर मिश्रा झटके से उठ खड़े हुए। झटका इतना तेज था कि उनकी कुर्सी डगमगाती हुई पीछे जा गिरी, जिसे लपककर उनके बराहिल ने उठाया। मुखिया दिगंबर मिश्रा का दीप्त गोरा चेहरा लाल भभूका हो आया था। उन्होंने निहायत आक्रामक स्वर में रामधरी पासी को आड़े हाथों लिया, ‘तोरा जब केस ही करना है, तो जा थाना। यहां पंचायत करने की क्या जरूरत है? लेकिन एक बात कान खोल के सुन ले। पंचायत के बाहर जो जायेगा, उसको गांव में वास ना मिलेगा।’
यह न घोषणा थी, न ध्मकी। सीध पफैसला था। पूरी सभा को सांप सूंघ गया ।
अचानक इस सन्नाटे को तार-तार करती पिन्टू के मोबाइल की घंटी बज उठी। तमाम आंखें उसकी तरपफ आ लगीं। घंटी लगातार बज रही थी। उसने निरुपाय-सा स्क्रीन पर चमकता नाम देखा-रमेश पांडे। उसका चेहरा पफक पड़ गया । दिल डूबने लगा। बेचैनी से इध्र-उध्र देखा। सभी की आंखें उसी पर लगी थीं। उसकी समझ में कुछ नहीं आया । काॅल रिसीव करने के अलावा और कोई उपाय नहीं था उसके पास । अकबकाहट में रिसीव बटन दबा दिया।
‘हल्लो, बाबा, कहां हैं आप?’
दूसरी ओर से कोई जवाब नहीं मिला।
‘हल्लो… हल्लो, रमेश बाबा, कहां हैं आप?’ पिन्टू व्यग्रता में पूछता चला जा रहा था। लेकिन दूसरी ओर से कोई आवाज नहीं आ रही थी। बेबसी में मोबाइल को घूरा। नेटवर्क जवाब दे गया था।
हताश पिन्टू, सपफाई देने की गरज से, स्वगत-सा बोल पड़ा, ‘रमेश बाबा का पफोन था। बात ना हो पाई। नेटवर्क गायब हो गया।’
‘पता कर… पता कर। कौन बिल में लुकाया है कुलबोरन, पता लगाना जरूरी है।’ मुखिया दिगंबर मिश्रा ने आदेश के साथ ही उसे खुलेआम ध्रिाया, ‘पता ना चला, तो बूझ जा, तुमरा भी खैर ना है। स्साला, तोरा दुकान पर क्या-क्या खेला होता है, हमको सब पता है।’
पिन्टू का जिस्म कांप गया। एक साथ कई आशंकाओं ने सिर उठाया और उसे सापफ महसूस हुआ कि वह एकबारगी तमाम शत्राु-आंखों के निशाने पर है।
विशंभर मिश्रा ने मुखिया दिगंबर मिश्रा की ओर मुखातिब हो जैसे आजिजी में जानना चाहा, ‘तब क्या करना है?’
‘करना क्या है? दोनों जहां मिले पकड़कर लाना है।’ मुखिया दिगंबर मिश्रा ने सबको उनका आदेश सापफ सुनाई पड़े इस अंदाज में दो टूक एलान किया, ‘तब तक रामधरी पासी और कैलाश पांडे का हुक्का-पानी बंद।’
सभा में सहमति के सारेे सिर हिले । नीति-अनीति बतियाते लोग धूल झाडते़ उठने लगे। विशंभर मिश्रा भी भीड़ को चीरते हुए तीर की तरह तन्नाते निकले। उनके पीछे भिनभिनाता शोर गाली, गम, गुस्से में लिथड़ने लगा।
प्यार किया तो डरना क्या?
पिन्टू भारी मन, बोझिल पांव, लगभग घिसटता हुआ, कुछ दूर चलकर रुक गया। साथ-साथ लगा रजवा, उसके ठिठकते ही पूछ बैठा, ‘भइया, क्या हुआ? मुखिया जी, क्या बोले?’
मासूम रजवा के चेहरे पर उलझन थी। रजवा को पंच-प्रपंच कुछ नहीं पता। क्या कहे रजवा से?
‘रजवा, तू घर चला जा!’ पिन्टू ने बोझिल मन रजवा को पुचकारा, ‘मन ठीक ना है,बाबू । आज दुकान ना खोलेंगे।’
रजवा कुछ समझा, कुछ नहीं समझा-सा अचकचाया खड़ा था। पिन्टू बगैर उसकी ओर देखे, भुतहा बगइचा की ओर लपक पड़ा। बस एक ही खयाल,गझिन भुतहा बगइचा में आमद-रफ्रत कम रहती है। वहीं किसी ओट में पड़ा रहेगा, तो शायद मन कुछ स्थिर हो।
भुतहा बगइचा में बरगद पेड़ के नीचे गुमसुम पड़े पिन्टू की आंखों में रमेश पांडे और रजकुमरिया के चेहरे उभरते, तो कभी तारा कुमारी की छवि मुस्कराती। मुखिया दिगंबर मिश्रा का ध्रिाना याद आता,तो उनके गोतिया विशंभर मिश्रा का बदला हुआ रूप चकित करता। इन लुकाछिपियों के बीच कब उसकी आंख लग गई कुछ याद नहीं। वह तो मोबाइल की घंटी बजी, तब पता चला कि अंध्ेरा घिर आया है। मोबाइल स्क्रीन पर देखा-रमेश पांडे।
हड़बड़ाकर पफोन कान से सटाया और बौखलाया हुआ बोल पड़ा, ‘हल्लो।’
‘पिन्टुआ, क्या खबर है, रे?’ दूसरी ओर से रमेश पांडे की आवाज आई।
‘खबर क्या पूछते हैं, बाबा? बवाल मचा है, बवाल!’ चारों ओर निगाह दौड़ाते पिन्टू ने भरसक अपने आवेग पर काबू रखने की कोशिश की, ‘बाबा, रजकुमरिया के साथ काहे भागे हैं?’
‘भागते ना तो क्या करते? गांव वाला सब बिआह करे देता?’ रमेश पांडे के स्वर में जिरह करता अपफसोस था।
‘बाबा, आप हैं कहां?’ विकल पिन्टू ने टोह लेने की कोशिश की।
‘पटना में हैं, पिन्टू ।’ रमेश पांडे बिना हिचक के बोले, ‘हम दोनों मंदिर में बिआह कर लिये हैं।’
‘पटना में?’ पटना में कहां हैं, बाबा?’ पिन्टू के भीतर घुमड़ती जिज्ञासा ने सिर उठाया।
कोई उत्तर मिलता, इससे पहले ही नेटवर्क गायब हो गया। पिन्टू ने झल्लाकर मोबाइल स्क्रीन को घूरा और बेबसी में मोबाइल शर्ट की जेब में डालते हुए ठसुआया-सा ठिठका रहा। इस बीच मन में उठती उथल-पुथल के बीच तय किया कि जो हो रमेश पांडे के बारे में जितना जानता है, मुखिया दिगंबर मिश्रा को बता देने में ही भलाई है।
भुतहा बगइचा से मुखिया दिगंबर मिश्रा के घर की दूरी ज्यादा नहीं थी। लेकिन इतनी ही दूरी तय करने में पिन्टू का मन बेतरह आगा-पीछा कर रहा । अभी वह बमुश्किल आध्ी राह में ही था कि मोबाइल पिफर बजा। स्क्रीन पर देखा, तो तारा कुमारी का नंबर नजर आया। कलेजा मुंह को आ लगा। कांपते हाथ से पफोन कान से सटाया, ‘हल्लो।’
‘क्या बात है, आज दुकान बड़ा जल्दी बंद कर दिये?’ तारा कुमारी की आवाज में चिंतानुमा कुछ था।
‘हां!’ पिन्टू बड़ी कठिनाई से बोल पाया।
‘हां। हां क्या?’ तारा कुमारी की झिड़की आई, ‘क्या बात है, बोलते काहे नहीं हैं?’
‘गांव में पंचायत थी। मुखिया जी बुलाये थे।’ दबी जुबान में बोला पिन्टू ।
‘क्या हुआ? कौन बात की पंचायत?’ तारा कुमारी के स्वर में उतावलापन था।
‘रमेश पांडे, रजकुमरिया पासिन के संगे कहीं भाग गये हैं।’ पिन्टू ने हिचकते-हिचकते बताया, ‘इसी बात पर पंचायत थी।’
‘ठीक किया, जो दोनों भाग गया।’ तारा कुमारी के स्वर में गजब की उत्तेजना थी, ‘प्यार किया तो डरना क्या?’
किसी साज के तार से निकली झन्न-झन्न जैसे हवा में तिरने लगी ।
‘हल्लो! चुप काहे हैं?’ तारा कुमारी ने पिन्टू की चुप्पी को लक्ष्य किया, ‘कुछ बोलते काहे नहीं?’
‘जी…जी! आपको सुन रहे हैं।’ पिन्टू ने सपफाई दी।
‘पंचायत में क्या हुआ?’ तारा कुमारी जैसे सब कुछ जानने की उत्सुकता से भरी थी।
‘बहुत बवाल हुआ। सब हमसे रमेश पांडे के बारे में पूछ रहा था। हमको कुछ पता ही नहीं था, हम क्या बताते?’ पिन्टू का मन छलछलाने को हो आया। बड़ी कठिनाई से खुद को जज्ब कर पाया।
‘पता हो, तब भी मत बताइएगा।’ हिदायत-सी देती तारा कुमारी का स्वर अचानक किसी गहरे कुएं से आती प्रतीत हुई, ‘कसाई सब दोनों को कहीं का नहीं छोड़ेगा।’
पिन्टू सिहर गया। हड़बड़ाकर आवाज लगाई, ‘हल्लो…हल्लो! हल्लो!!’
‘बाद में बात करेंगे।’ घबराई हुई-सी जान पड़ी तारा कुमारी । पफोन टक से कट गया था ।
पिन्टू ध्क्क रह गया । मोबाइल को हसरत से देखता जड़ हो गया ।
उस रात पिन्टू की आंखों को नींद छका रही थी। आंखें मूंदते ही रमेश पांडे, रजकुमारिया पासिन और तारा कुमारी की स्मृतियां आवाजाही करती रहीं । बेचैनी से करवटें बदलते रात और नींद के बीच समय कितना सरक गया, कुछ पता ही नहीं चला।
अचानक दरवाजे पर ध्म्म-ध्म्म की आवाज हुई। जब तक कुछ समझ पाता, किसी ने जोर की हांक लगाई, पिन्टुआ। पिन्टुआ है क्या, रे? दरवाजा खोल। खोल दरवाजा।’
मां अध्कच्ची नींद से अकबकाकर उठी। पिन्टू ने मां को देखा। मां की आंखों में दहशत थी। इस दहशत ने उसे भी गिरफ्रत में ले लिया। दरवाजे पर पिफर ध्म्म-ध्म्म हुई। वह उठा। लपककर दरवाजे तक आया। दूसरी ओर से कोई चीखा, ‘खोलता है दरवाजा कि तोड़ें!’
उसने झट से दरवाजा खोल दिया। सामने दो सिपाही थे। उनके पीछे मुशहर टोल के मर्द-औरत। सबके चेहरों पर अव्यक्त भय। वह समझ नहीं पाया, आखिर माजरा क्या है?
‘चल। तोरा थाना पर बुलावा है।’ थुलथुल जिस्म वाले बुजुर्ग सिपाही ने घुड़की के साथ आदेश सुनाया ।
भीतर जकड़े भय के बावजूद, पिन्टू ने खुद को संभालकर साहस जुटाया,‘काहे सर? इतनी रात को? क्या बात है?’
‘चल, थाना। वहीं सब पता चल जायेगा।’ यह दूसरा सिपाही था, अपेक्षाकृत ज्यादा जवान और कम चर्बी वाला।
बेचारगी ऐसी कि कोई जिरह मुमकिन नहीं थी। बगैर हुज्जत पिन्टू सिपाहियों के साथ हो लिया। मां, जो डर के मारे थर-थर कांप रही थी, सिसकते हुए पिन्टू के पीछे लग ली। टोल के मर्द-औरत भी मां के साथ हो लिए थे।
कुचकुच अंध्ेरे के बीच ढिबरी बाजार थाने में टिमटिमाते बल्ब की रोशनी कहीं ज्यादा दहशतनाक लग रही थी। मां, टोल के मर्द-औरत सभी को जवान सिपाही ने गेट के बाहर ही रोक दिया था। थुलथुल सिपाही पिन्टू को लेकर आगे बढ़ा। थाने में मौजूद साये दूर से प्रेत की मानिंद नजर आ रहे थे। नजदीक पहुंचते ही पिन्टू की आंखें पफटी रह गईं । थानेदार बनवारी सिंह के टेबुल के ठीक सामने मुखिया दिगंबर मिश्रा, उनके गोतिया विशंभर मिश्रा अगल-बगल बैठे बतिया रहे थे। उनके पीछे दीवार से सटी बेंच पर कम रोशनी के बावजूद चांदनी की-सी चमक थी। इस चमक में एक बुजुर्ग के साथ सिर झुकाये बैठी थी तारा कुमारी। पिन्टू की आंखों में अंध्ेरा कहीं ज्यादा गाढ़ा और खौपफनाक हो आया। जिस्म में एक गहरी चिलक-सी उठी। चेतना के सारे तार जैसे सुन्न पड़ गये थे।
‘का रे, पिन्टुआ, सुना कि तोरा मोबाइल की दुकान पर मोहब्बत का कनेक्शन बड़ी तेजी से लगता है।’ ठंडे सन्नाटे में थानेदार बनवारी सिंह की निहायत ठंडी आवाज सनसनी पैदा कर गई । बेजान जिस्म से आवाज क्या निकलती? पिन्टू थर-थर कांपने लगा था।
‘चुप रहे से जान ना बचे वाली है।’ थानेदार बनवारी सिंह की भाषा शालीन थी, अर्थ गंभीर, ‘जो पूछते हैं, पफट से बक दे, ना तो बूझ लिहो!’
पिन्टू की समझ में कुछ नहीं आ रहा था । दिमाग सुन्न पड़ गया था ।
उसे चुप देख, साथ आये थुलथुल सिपाही ने कसकर घुड़की दी, ‘बोलता काहे ना है, रे, मुंह में जाब लगा है क्या?’
‘ये किताब तुम्हारी है?’ थानेदार बनवारी सिंह ने सामने टेबुल पर रखे एक कागज के नीचे से किताब उठाते हुए सवाल दागा।
हवा में टंगी यह किताब नीरज का कविता संग्रह ‘तुम्हारे लिए’ थी। पिन्टू की घिग्घी बंध् गई। मुखिया दिगंबर मिश्रा, उनके गोतिया विशंभर मिश्रा और तारा कुमारी के पिता, उसकी ओर एकटक देख रहे थे। तारा कुमारी का सिर झुका था। चेहरा बुझा हुआ था। आंखें पफर्श में ध्ंसी जा रही थीं।
‘जी!’ थूक निगलते पिन्टू की आवाज गले में ही पफंस कर रह गई।
‘यह किताब तुम तारा कुमारी को काहे दिया?’ कहर बरपाती थानेदार बनवारी सिंह की आवाज मनहूस सन्नाटे में चाबुक-सी गंूजी।
‘जी! वही मांगी थी।’ पिन्टू के कंठ में कांटे उग आये थे।
‘झूठ बोलता है, बनवारी बाबू।’ तमतमाये-सेे तारा कुमारी के पिता बेंच से उठ खडे़ हुए । उनकी आवाज क्रोध् के मारे कांप रही थी, ‘हमरी बेटी का संस्कार ऐसी गंदी किताब पढ़े का ना है। स्साला मुशहर, सबका ध्रम नासे पर लगा है।’
बेबस पिन्टू ने किसी उम्मीद में तारा कुमारी की ओर देखा। तारा कुमारी तो अपने-आप में ध्ंसी जा रही थी।
‘देख, यह देख।’ टेबुल पर रखे कागज को उठाकर हवा में लहराते थानेदार बनवारी सिंह हकड़े, ‘तारा कुमारी तोरा खिलापफ कंपलेन की है। सापफ-सापफ लिखी है कि प्रेम-मुहब्बत वाली यह किताब तुम उसको दिये थे । तुम उससे मोबाइल पर भी बात करते हो। बोल है कि ना?’
‘बनवारी बाबू, स्साला यह क्या बतायेगा। उसको बोले का मुंह है?’ तारा कुमारी के पिता के भीतर जहर खदबदा रहा था। उनके होंठों के किनारे झाग से भरे थे, ‘आज हम अपना कान से सुने कि यह हमरी बेटी से मोबाइल पर बतिया रहा था। बस, उसी घड़ी तरवा के हाथ से मोबाइल छीने और लोढ़ा से कूचकाच के बराबर कर दिये।’
तारा कुमारी के पिता के नथुने पफूलने-पिचकने लगे थे।
‘बोल! अभी भी कुछ कहने को बाकी है?’ थानेदार की सुर्ख आंखें पिन्टू के चेहरे पर गड़ गईं
अबतक, अप्रत्याशित रूप से चुप बैठे मुखिया दिगंबर मिश्रा पफुंपफकार उठे, ‘ए बनवारी बाबू, यह स्साला मुशहर क्या बोलेगा? उलटा टांगकर मारिए, सब पक्क से उगल देगा।’
थानेदार बनवारी सिंह नाटकीय अंदाज में मुस्काराये और रहस्यमय अंदाज में बोले,‘ए मुखिया जी, सब काम कानून के हिसाब से करना पड़ता है। पता है कि ना एससी-एसटी कानून बड़ा सख्त है?’
मुखिया दिगंबर मिश्रा सकपकाये। तनिक संभले, पिफर तनिक संयत हो बोले, ‘यही सोचकर तो हम इसको ढिबरी बाजार में बसाये थे, कि जनमजात के कलंक से निकलकर कमाये खायेगा। लेकिन यह तो बाभने सबको नासे लगा।’
‘हम तो शूद्दर सबका लच्छन चीन्हते हैं। इसीसे इसको दुकान ना दिये थे।’ मौका देखकर विशंभर मिश्रा मुखिया दिगंबर मिश्रा पर ताना मारने से नहीं चूके।
मुखिया दिगंबर मिश्रा कसमसाकर रह गये।
थानेदार बनवारी सिंह ने देह तानी। कुर्सी पीछे खिसकाते हुए उठकर खड़े हुए। पफर्श पर उभरी खर्र-खर्र, पिन्टू के जिस्म पर खरोंचे भर गयी।
‘बनवारी बाबू, रमेश पांडे और रजकुमरिया पासिन कहां लुकाया है, सब पिन्टुआ को पता है।’ विशंभर मिश्रा ने थानेदार को उकसाने के लहजे में टोका, ‘पूछिए, इससे, पता है कि ना?’
थानेदार बनवारी सिंह के बूट चरमराये। पफर्श, सन्नाटा, पिन्टू दहल गये। पिन्टू तो जैसे पीला ही पड़ गया था।
थानेदार बनवारी सिंह किसी दैत्य-सा पिन्टू के सामने आ खड़ा हुआ। उसकी बेंत की छड़ी पिन्टू की ठुढ्डी से टकराई, ‘अपनी जान की खैर चाहता है, तो सीध्े-सीध्े बता दे। कहां लुकाया है दोनों ?’
थुलथुल सिपाही जगह बनाने की गरज से थोड़ा पीछे खिसका। तारा कुमारी थुलथुल सिपाही के पीछे छिप गई थी।
‘सर, दोनों पटना में है।’ दहशत के सामने तारा कुमारी की दी गई नसीहत पफुस्स हो गई। पिन्टू की आंखों से आंसू टपक पड़े।
थानेदारी बनवारी सिंह अपनी कामयाबी पर मुस्कराया। इस मुस्कराहट में क्रूरता अठखेलियां कर रही थी, ‘पटना में कहां? कौन जगह पटना में?’
‘सर, और कुछ ना पता है। रमेश बाबा बस इतने बताये थे कि पफोन कट गया।’ पिन्टू के गीले शब्द थानेदार की बूटों से जा लिपटे।
‘ठीक है। जो तुमको ना पता है, वह हम पता कर लेंगे।’ थानेदार बनवारी सिंह पलटे और थुलथुल सिपाही को पफरमान जारी किया, ‘पासवान जी, बंद करिए स्साले को हजात में। रात भर में होश ठिकाने आ जायेगा।’
ध्रती डोली, कि दिशाएं घूमीं, कि आसमान हिला, पिन्टू का समूचा वजूद उड़ियाता हुआ थुलथुल सिपाही की गिरफ्रत में जा कसा। किसी मेमने-सा वह अंध्ेरे में गर्क हाजत की ओर घसीटा जा रहा था।
‘जाइए, मुखिया जी। आप सब लोग अब जाइए!’ थानेदार बनवारी सिंह की आवाज पिन्टू के कानों से उसके भविष्य का पता बनकर टकरायी, ‘कल भोरे-भोर इसका चालान कर देंगे।’
हवा में घुलती आवाज
पिन्टू ने गहरी, ठंडी सांस छोड़ी। उसकी आंखें झपक रही थीं मानो पिछले दृश्यों से सायास बाहर निकलने की कोशिश कर रहा हो । मेरी उत्सुकता उसकी चुप्पी में अंटकी हुई थी। वह जैसे सुस्ताने की मुद्रा में था।
‘जानते हैं, सर! तीन महीना बाद हमको जमानत मिली।’ पिन्टू के थकेे स्वर में गहरी पीड़ा पैबस्त थी।
मैंने उसे टोकना उचित नहीं समझा। उसका भरा मन स्वतः खुले, इस प्रतीक्षा में उसकी ओर देखता रहा।
‘सर, आप सोच भी नहीं सकते कि इस बीच क्या हुआ?’ पिन्टू मुझसे मुखातिब था। लेकिन उसकी आवाज कहीं और पछाड़ खा रही थी ।
पिन्टू खुद से जूझ रहा था या जो बोलना चाह रहा था, उसकी तैयारी कर रहा था, यह समझ पाना मेरे लिए अब आसान नहीं रह गया था। मैं सांसें रोके उसके बोलने की प्रतीक्षा करता रहा।
अपने जजबात को थामने की कोशिश करता पिन्टू एक झटके से बोल पड़ा, ‘रमेश पांडे और रजकुमरिया पकड़े गये, सर। थानेदार बनवारी सिंह ने दोनों को मुखिया दिगंबर मिश्रा के हवाले कर दिया। पिफर पंचायत बैठी। पंचायत में रमेश पांडे और रजकुमरिया को खड़ा किया गया। दोनों एक-दूसरे के साथ जिये-मरे की गुहार लगा रहा था।’
मेरी सांस टंग गई थी। पिन्टू मेरी तरपफ देखा जरूर रहा था, लेकिन संबोध्ति जैसे स्वयं से ही था, ‘रजकुमरिया का माथा मुंड़ाकर सारे गांव में घुमाया गया। बेचारी कलप-कलप कर रोती रही । लेकिन कोई उसकी मदद को आगे नहीं आया। अगली सुबह उसकी लाश भुतहा बगइचा में बरगद पेड़ पर लटकती मिली।’
पिन्टू की आंखों की कोरें भीग गई थीं। उसके चेहरे पर घनीभूत हो आई पीड़ा से घबराकर मैंने उसे टोका,‘और रमेश पांडे? रमेश पांडे का क्या हुआ?’
पिन्टू की शून्य में खोई आंखों के अन्दर कोई गहरी उथल-पुथल जारी थी। या तो कोई सिरा नहीं मिल रहा था, या कोई शब्द । वह चुप था। उसकी चुप्पी से मुझे डर लगने लगा । उसकी मनःस्थ्तिि से बचने के लिए मैं इध्र-उध्र देखने लगा। पता नहीं पत्नी कब से दायें दरवाजे के बीच आकर निःशब्द खड़ी थीं।
‘रमेश पांडे।’ पिन्टू बुदबुदाया। उसकी आंखें मुंद गई थीं। मैंने गौर किया कोरों पर पानी रिस आया था। उसकी आवाज किसी बियाबान में भटक रही थी, ‘रमेश पांडे की तारा कुमारी से शादी हो गई,सर।’
बियाबान से आई वह आवाज अचानक मेरे ड्राइंगरूम में हहराते बवंडर-सी चक्कर काटने लगी। आलमारी, टेबुल, सोपफा, खिड़की, दरवाजे, छत सबके सब अपनी जगह से हिलते नजर आये। करीने से रखी हर चीज एक-दूसरे से टकराती हुई, बेतरतीब होती जान पड़ रही थीं। सौंदर्यबोध् के सारे प्रतिमान तार-तार हो, निहायत विरूप दिख रहे थे। मैंने घबराहट में पिन्टू को झकझोरा, ‘ पिन्टू…!’
‘सर!’ पिन्टू ने आंखें खोलीं।
‘अब? अब क्या सोचा है तुमने?’ मैंने बदहवास-सवाल किया।
‘सर, केस करना है। तीन-तीन हत्याओं का केस!’ पिन्टू का चेहरा तन गया था। स्वर कहीं ज्यादा सख्त था।
‘लेकिन किसके खिलापफ? किसके खिलापफ केस करोगे ,पिन्टू?’ मेरे सवाल में उलझन थी। मन में उद्विग्नता।
पिन्टू के मन में कोई उलझन नहीं थी। हर सवाल से आगे थी, उसकी सोच और इस सोच में थी निर्णायक दृढ़ता। उसने मेरे चेहरे पर अपनी आंखें गड़ाते हुए जवाब दिया, ‘प्रेम करने के अध्किार की हत्या करने वालों के खिलापफ।’
पिन्टू…मेरे सामने बैठा पिन्टू, महज एक जवाब नहीं था, चुनौती देता एक ऐसी ललकार था, जिससे आंखें मिला पाना मुश्किल हुआ जा रहा था। मैंने बड़े कठिन स्वर में पिन्टू से जानने की कोशिश की, ‘ले…ले…लेकिन यह साबित कैसे होगा, पिन्टू ?’
‘साबित तो आप करेंगे, सर! आप जैसे लोग, जो एक बेहतर दुनिया की कामना में इतना कुछ रच रहे हैं।’ पिन्टू झटके से उठा और एक आदमकद सवाल-सा तनकर खड़ा हो गया था, ‘आखिर आपका लिखा, सच को साबित न कर पाये, तो पिफर किस काम का लिखना?’
मेरे पास उसके सवाल का कोई जवाब नहीं था। असहाय, अनुत्तरित मैं उठा और सहानुभूति भरा हाथ उसके कंध्े पर रखना चाहा कि उसने मेरे हाथ को झटक दिया। जब तक मैं इस झटके से उबरता, वह ड्राइंगरूम का दरवाजा खोलकर बाहर निकल गया। मैंने उसे पुकारना चाहा । लेकिन मेरी पुकार से पहले ही वह पलटा और मेरी ओर मुखातिब होकर बोल पड़ा, ‘सर, मैं पिफर आउफंगा। बार-बार आउफंगा!’
मैं कुछ कह पाता, इससे पहले ही वह हवा में घुलती आवाज की तरह गुम हो गया। उसके पीछे रह गई थी, बस उसकी अनुगूंज।
अवधेश प्रीत
जन्म : 13 जनवरी 1958, तराँव, गाजीपुर (उत्तर प्रदेश )
भाषा : हिंदी
विधाएँ : कहानी
मुख्य कृतियाँ
कहानी संग्रह : हस्तक्षेप, नृशंस, हमजमीन, कोहरे में कंदीलसम्मान- विजय वर्मा कथा सम्मान, बनारसी प्रसाद भोजपुरी कथा सम्मान, डॉ. सूरेंद्र चौधरी कथा सम्मान, फणीश्वरनाथ रेणु कथा सम्मानसुमति पथ, रानीघाट, महेन्द्रू, पटना-800 006 (बिहार)
फोन - 91-9431094596
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