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ISSN - 2455-2011
RNI - UPHIN/2017/74803

समाज में मरने के भी अलग-अलग स्टैंडर्ड:

जीवन भर पेटभर रोटी नहीं मिलती, लेकिन मरने के बाद सपनों के बाज़ार सज जाते हैं। ‘सुजाता तेवतिया’ का यह व्यंग्य समाज में मौत के अलग-अलग स्टैंडर्ड और बाज़ार की संवेदनहीनता को खोलने का प्रयास करता है।

जीवन भर पेटभर रोटी नहीं… और मरने के बाद ख्वाब सुहाने।

समाज का यह अजीब गणित है कि आदमी जीते-जी भूख, अभाव और संघर्ष में उलझा रहता है, लेकिन मरने के बाद उसके लिए संवेदनाओं, रस्मों और दिखावे के बड़े-बड़े बाज़ार सज जाते हैं।
दरअसल यह व्यंग्य उसी विडंबना की गांठें खोलने की कोशिश है — उस सपनीले बाज़ार की, जहाँ इंसान की जिंदगी की कीमत कम और उसकी मौत का प्रदर्शन ज्यादा मायने रखता है।

इसी विडंबना को समझने के लिए कबीर की यह पंक्ति जैसे भीतर तक चुभती है —

“हम न मरै मरिहै संसारा, हमको मिला जियावन हारा।”

‘सुजाता तेवतिया’ का यह व्यंग्य उसी समाज पर सवाल उठाता है, जहाँ जीते-जी इंसान की तकलीफों की कोई कीमत नहीं, लेकिन मरने के बाद उसके लिए अलग-अलग स्टैंडर्ड तय कर दिए जाते हैं।

marane ke alag alag stendard

“हम न मरै मरिहै संसारा हमको मिला जियावन हारा” ये कबीर का कॉंन्फिडेंस है अपनी भक्ति और ईश्वर के प्यार में ।पर अपन पिछले कई दिनों से ,जब से मृत्यु के शाश्वत प्रश्न पर विचार कर रहे हैं , बडे परेशान हैं । परेशानी का कारण वाकई बडा है । खुद मृत्यु से भी बडा । न भक्ति की है न ईश्वर से प्यार । परलोक के लिए कुछ योजना नही बनाई । सच कहें त इहलोक की भी अभी तक कोई योजना बनाई नही जा सकी । इसलिए जब आस-पास वालों को बीमा एजेंटों से बात करते मृत्यु के बाद के जीवन पर चिंतित देखा तो होश फाख्ता हो गए ,यह सोच कर कि अपन तो अभी तक खाक ही छान रहे थे मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया …. वाले अन्दाज़ में और दुनिया बीमा करा करा कर कबीर का वही दोहा गुनगुना रही है –हम न मरैं……. |

पर हम तो अवश्येअ ही मरिहैं और फोकटी का मरिहैं और तिस पर भी सब स्टैंडर्ड मौत मरिहैं ,हमार का होई ?? बाज़ार देवता ने जियावन हारा का रूप धर लीन्हा है । उनके पास नई नई स्कीम है । बीमा एजेंट ने चिढते हुए कहा –“लोग कडवा सच नही सुनना चाहते , हम मरने की बात करते हैं तो बुरा मानते हैं , मरना तो सच्चाई है , कब मौत आ जाए क्या पता । इसलिए मौत के बाद की प्लानिंग करनी चाहिए | ”

मैक्स या फैक्स जाने वे कहाँ से जियावन हारा की फरिश्ता बन कर आयी थीं ।उदाहरण देने लगीं – एक व्यक्ति ने एक ही प्रीमियम भरा था और कलटी हो लिए दुनिया से ,हमने सारा पैसा दिया । हम ज़्यादातर को सारा पैसा देते हैं ।बस सामान्य ,प्राकृतिक मृत्यु नही होनी चाहिये । एक्सीडेंट में फायदा है । वह भी विमान से हो तो और अच्छा !! –वे मुस्कराईं। ट्रेन, बसों में सफर करने वाले चिरकुट चिर्कुटई मौत मरते हैं और उसी हिसाब से उनका क्लेम बनता है ।देखा जाए तो ट्रेन बस से मरना ज़्यादा कष्टकर है ।और आएदिन ये दुर्घटनाएँ होती ही रहती हैं ।हो सकता है इसीलिए बीमा वालों की नज़र में यह घाटे का सौदा हो । हवा में मृत्यु के आसार भी कम होते हैं और यह शानदार भी है !! ऊपर से ऊपर ही हो लिए !! कोई कष्ट नही । न आत्मा को न परमात्मा को न यमदूत को। न मरने वाले के परिवार को ।खबर बन जाते हैं यह फायदा अलग से ।

अब हमारी चिंता का एही कारन है । निचले दर्जे का मौत नही न चाहिए और हवा में उडने के अभी तक कोई आसार नहीं । अभी तक की जिनगानी में एअरपोर्ट का दर्शन केवल् टी वी में ही किया है । अपनी-अपनी मौत –अपनी अपनी किस्मत । ज़िन्दगी के स्टैंडर्ड से ही मौत का स्टैंडर्ड तय होता है । हम समझ गये हैं ज़मीन पर मरने में कोई फायदा नही । जिनगी की खींचतान मौत के बाद भी बनी रहती है । सो पोलिसी अब तभी लेंगे जब हवाई सफर का कुछ जुगाड हो जाए । वर्ना तो क्या फर्क पडता है कैसे जिए और क्यूँ मरे ।जियावनहारा न हमारी भक्ति से प्रसन्न होगा न योग से न ज्ञान से । उसे धन चाहिये ।

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