इन कविताओं में पहाड़ केवल दृश्य नहीं, बल्कि प्रेम, विरह, प्रतीक्षा और स्मृति के जीवंत संसार की तरह उपस्थित हैं। कवि ने बारिश, बर्फ़, झरनों, सेबों के पेड़ों, भेड़ों, बाँसुरी, पायल और रेल की सीटी जैसे पहाड़ी जीवन के सहज बिंबों के माध्यम से प्रेम को बहुत आत्मीय और दृश्यात्मक बनाया है।
इन कविताओं की खूबसूरती यह है कि प्रेम यहाँ किसी बड़े दार्शनिक कथन में नहीं, बल्कि छोटी-छोटी इच्छाओं और प्रतीक्षाओं में साँस लेता है—कहीं प्रिय के भीग जाने की चिंता है, कहीं उसका हाथ थामकर पथरीली राहों पर चलने की चाह, तो कहीं रेल की सीटी में लौटते प्रिय की आहट खोजती आँखें।
भाषा सरल, बोलचाल के करीब और चित्रात्मक है। विशेष रूप से प्रकृति और प्रेम का समानांतर चलना इन कविताओं को एक कोमल रोमानी रंग देता है। इनमें पहाड़ की ठंडी हवा के साथ विरह की गर्म बेचैनी और सुंदर दृश्यों के साथ प्रेम की अधूरी प्रतीक्षा लगातार बनी रहती है।
1- पहाड़ी के उस पार
पहाड़ी के उस पार कैसा
मौसम है
इस पार तो बारिश हो रही है
सेबों के पेड़ों पर परिंदे बैठें है
एक दूसरे से चिपककर
हौले से बूंदें गिर रही है
पत्थरों के अधरों पर
झरनों से नीर निरंतर बह रहा है
बुलबुले उड़ रहे है मेघों के
कैमरें में कैद कर के ले जा रही है
नजारों को कुछ युवतियां
तुम्हारी बस्ती में भी बारिश हो रही होगी
वहां भी परिंदे बैठें होंगे छुपके से
सेबों के पेड़ों पर
लेकिन तुम बाहर मत निकालना
वर्ना भीग जाओगी
ये बर्फीली बयारें तुम्हारी मुलायम देह को
बिमार कर देंगी
बारिश से पहाड़ खिसक गए है
जहां जम गई है मिट्टी गलियारों में
जो तेरी बस्ती की ओर जाते है
मिट्टी हटाते ही बर्फ़ गिरने लग जायेगी
फिर निकलना मुश्किल हो जायेगा
मेरा इस बार भी नही होगा
तेरी बस्ती की ओर आना
हां कुछ परिंदे उड़कर आयेंगे
जिनके पंखों पर मेरे हाथों की मिट्टी लगी होगी
तुम अपने डूप्पटे पर लगा लेना
कुछ ठंण्डी हवाएं उड़कर आयेंगी
जिसमें मेरी साॅंसे घुली होंगी
तुम अपने होंठों पर रख लेना
कुछ बूंदें गिरेंगी हौले से
जो मेरी ऑंखों से बहकर आयेंगी
तुम अपनी पलकों पर रख लेना
2- किसी ऊंची पहाड़ी की ओट में
किसी ऊंची पहाड़ी की ओट में
भेड़ों के साथ बाॅंसुरी बजाते हुए
मिल जाऊंगा तुम्हें
बाॅंसुरी की धुन सुनकर भेड़ें लौट आती है पथरीली राहों से चरकर
तुम्हें आना हो तो पायल पहनकर आ जाना पाॅंव में
ऊंची चोटी वाली पहाड़ी के पीछे
मैं वही मिलूंगा अपनी भेड़ों के साथ
होंठों पर बाॅंसुरी सजाएं हुए
अगर वादियों में ऑंख भी लग जाए तो
तुम अपने मन में व्यग्रता मत लाना
बस मेरे कान के पास हौले से पायल खनका देना
उसकी तान किसी ऊंची पहाड़ी से टकराकर वापस मेरे कान के
पास आयेगी तो मैं जाग जाऊंगा
पथरीली राहों में मोच आ सकती है
तुम्हारी कोमल एड़ियों में
घनघोर झाड़ियों से चिपके कांटें
खरोंच कर देंगे तुम्हारे फूल से चेहरे पर
इसलिए तुम मेरा हाथ थामकर चलना
और फिर मिलाऊंगा तुमको अपनी भेड़ों से
घाटियों में लथपथ हुए सेबों की झाड़ियों से
बर्फ़ से ढ़की हुई ऊंची चोटियों से
साॅंझ को फिर लौट आयेंगे भेड़ो को घेरते हुए
बस्ती की ओर दोनों
3- फूलों के मौसम में
फूलों के मौसम में अक्सर
परदेसी चले आते है बिन बुलाए
मेहमान की तरह
पहाड़ों की सैर करने
उन परदेसियों पर दिल हार जाती है
पहाड़ों की खूबसूरत लड़कियां
जिनके गालों पर सेब की लालिमा बैठी होती है
जिनकी कमर केले की टहनी की तरह लचीली होती है
जिनके होठ फूलों की पंखुड़ियों की तरह कोमल होते है
जिनकी ऑंखें झील में खिले कंवल की तरह होती है
ऐसी अप्सराओं का दिल तोड़कर चले जाते है परदेसी अपने देस को
और फिर कभी लौटकर नही आते है
लड़कियां देखती रहती है पहाड़ों की चोटियों की ओर
कही वो छुपे तो नही उसकी ओट में
और घंटों खड़ी रहती है डूबते सूरज के आगे
कही उसकी रोशनी को देखने ही आ जाए वो
रेल की सीटी सुनकर भागती है पीछे उसके
कही किसी डिब्बें में छुपकर बैठा हो वो
4. आखिर तुम कब आओगे
अब तो डूब गया सूरज पहाड़ों की ओट में
अब तो छुप गई चांदनी देवधर के पत्तों के पीछे
अब तो चली गई रेल धुंआ छोड़ते हुए शहर की ओर
अब तो उड़ गए बादल आसमान से कही दूर
अब तो आ गए परिंदे अपने घोंसलों की ओर
अब तो लौट आई चाय के बागानों में दिनभर काम करने वाली महिलाएं
अब तो आ गए बोगी वाले लेकर अपने घोड़ों को
मगर तुम नही लौटें अभी तक
आखिर तुम कब आओगे
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निहाल सिंह
जन्मतिथि - 17-02-1977
गांव - दुधवा
जनपद - झुंझुनूं
राज्य - राजस्थान
लेखन प्रारम्भ वर्ष - 2005
व्यवसाय - कृषि
ई-मेल -nihal6376r@gmail.com
मोबाइल - 6376145199
सम्प्रति - अनुनाद, सेतु, कृत्या, समता मार्ग, शब्द बिरादरी, गोल चक्कर, पहली बार, आंच, ईरा, हिन्दी कुंज, साहित्य कुंज, संवाद जान्हवी, छत्तीसगढ़ मित्र इत्यादि में रचनाएं प्रकाशित हो चुकी है।