अनीता के सभी लेख

घंटा बुद्धिजीवी : व्यंग्य (अनीता मिश्रा ) http://humrang.com/

“अगर कोई स्त्री इन्हें गलती से भी पोजिटिव रिस्पोंस दे देती है तो इनके मन में मंदिर की सामूहिक आरती के समय बजने वाले हजारों घंटे बजने लगते हैं . ये उसको समझाते हैं कि नारी मुक्ति का रास्ता देह से होकर जाता है इसलिए देह से मुक्त होना बहुत ही जरुरी है अप्रत्यक्ष रूप से ये भी बता देते हैं कि इस मुक्ति के लिए वही बेस्ट माध्यम हैं . कई दफा भारी भरकम किताबों और लेखकों का नाम लेने के कारण आतंकित लडकी इनके झासें में आ भी जाती है…….”

सोशल मीडिया के ‘जीजा जी’: व्यंग्य (अनीता मिश्रा) http://humrang.com/

“इन जीजाओं की किस्मत उस वक़्त खुल जाती है जब इन्हें कोई इनके जैसी मजेदार साली मिल जाती है. मसलन जीजा ने लिखा ‘बहुत शनदार’ तो साली साहिबा एक आँख बंद वाली इमोजी बनाते हुए लिखेंगी ..’क्या ? मैं या मेरी ड्रेस’ बस फिर तो मानो जीजा जी की लाटरी लग जाती है. फिर जीजा जी अपने सड़े हुए शेरों को ग़ालिब साहेब का नाम देकर चेपते हुए लिख देते हैं कि ड्रेस तो इसलिए सुन्दर है क्योंकि आपने उसको पहना है. अब ब्यूटी एप के प्रयोग से खींची हुई फोटो पर शेर देखकर साली साहिबा को भी लुत्फ़ आ जाता है.” ‘अनीता मिश्रा’ का सामयिक व्यंग्य …..

पोखर से नदी बनने की यात्रा है …..’पार्च्ड’: (अनीता मिश्रा) http://humrang.com/

मेरे पीछे बैठे दो लड़कों में से किसी की आवाज आयी ‘बहुत सही’ । शायद उसके हिसाब जो औरत जो पति की मार का विरोध कर रही है मार खाने लायक है । परदे पर एक सामंती चरित्र का साथ देता वो आदमी जो हाल में मौजूद था ‘बहुत सही’ कहकर शायद वो हम सबको जवाब दे रहा था कि खुलकर जीने का हक़ तुम लोगों को नहीं है सोचोगी तो मार खाओगी और बहुत लोग होंगे जो इस बात पर ‘बहुत सही’ भी कहेंगे ।

मेरा रुझान विजुअल आर्ट और लेखन दोनों के प्रति रहा है: “असग़र वजाहत” साक्षात्कार http://humrang.com/

अपनी किताब ‘असग़र वजाहत –चुनी हुई कहानियां’ के पर एक चर्चा के लिए कानपुर आये लेखक डाक्टर असग़र वजाहत | वैसे कानपुर शहर उनके लिए अजनबी नहीं है । ननिहाल होने के नाते उनके ताल्लुक के तार यहाँ के एक मोहल्ले राम नारायण बाज़ार से जुड़े रहे हैं। इसलिए उन्हें कानपुर की उस गली के खस्ते ,समोसे, जलेबी ….सब याद रहते हैं | शायद कानपुर यात्रा के दौरान वे यह सब खाना पसंद भी करते हैं। उनका औरा इतना वाइब्रेंट है कि सारा माहौल गर्मजोशी से भर जाता है । जितने लोग भी मौजूद हों सब श्रोता होते हैं और वो वक्ता ..सबको लगता है कि उन्हें वजाहत साहेब ने बहुत तवज्जो दी क्योंकि वो सबसे बराबर मुखातिब होते रहते हैं । ये उनकी सहजता है कि अगर सामने वाले ने बहुत पढ़ा लिखा ना भी हो तो बात करने के दौरान किस्से, चुटकुले सुनाते हुए वो किसी को अपने बड़े लेखक होने से आतंकित नहीं करते हैं । यहीं उनसे साहित्यिक, राजनीतिक और सामाजिक विभिन्न पहलुओं पर लम्बी बातचीत की ‘अनीता मिश्रा’ ने……

जो डूबा सो हुआ पार…: आलेख (अनीता मिश्रा) http://humrang.com/

”क़ैद बन जाए मुहब्बत तो मुहब्बत से निकल”, या ”ज़न्नत एक और हैं, जो मर्द के पहलू में नहीं..” आमतौर पर लोग प्रेम के मायने बंधना या बांधना समझते हैं। लेकिन एक स्त्री और पुरुष के बीच का प्रेम फैसला लेने की एक आजाद पहल है, इसलिए प्रेम होते ही आजादी का अहसास होता है। प्रेम की तरह ही आजादी भी हमारी बुनियादी जरूरत है। इसलिए स्वतंत्र महसूस किए बिना एक दूसरे से प्रेम भी नहीं किया जा सकता हैं। एक दूसरे को मुक्त करके ही अपने साथी को प्रेम में बांधा जा सकता है। बंधन और मुक्ति के इस अहसास को खलील ज़िब्रान ने बहुत ख़ूबसूरती के साथ जाहिर किया है—- “एक दूसरे के साथ/ रहकर, एक दूसरे के लिए/ जगह छोड़ें/ एक दूसरे से प्रेम करें/ लेकिन प्रेम को बंधन न बनाएं/ हम वीणा के उन तारों की तरह रहें/ जो अलग-अलग होतें हैं/ पर उनसे एक ही/ धुन बजती है।”

क्यों अखरती हैं मुखर स्त्रियाँ…: आलेख (अनीता मिश्रा) http://humrang.com/

“शायद दुनिया में अधिकतर जगह ऐसा है कि ज्यादा तर्क – वितर्क करती स्त्री को उस तरह से सम्मान नहीं मिल पाता है जिस तरह पुरुष को मिलता है । ऐसा करने वाला पुरुष जहाँ सबकी नज़रों में महान बन जाता है ,बुद्धिमान समझा जाता है । वहीं ऐसी स्त्री हठी और कुतर्की का दर्जा पाती है ।

ड्रामा क्वीन: कहानी (अनीता मिश्रा) kahani in hindi http://humrang.com/

“सरिता ने हाथ की रस्सी को झटक कर फेंका और घूरकर लखन को देखने लगी। वह इतनी कसकर हिचकी लेकर रो रही थी कि उससे कुछ बोला नहीं जा रहा था। सास ने लानत भरी आवाज में कहा, ‘’दुल्हिन ! तुम दुई कौड़ी की निकली। अरे, धीरे –धीरे आदमी बस में हो जाते हैं। तुम तो गज़ब किये हो ऐसे तो मरद भी नहीं करते ,थोडा सबर रखो।‘’ ये सुनते ही सरिता का सब्र टूट ही गया चीख पडी ‘’ क्या किया है हमने पांच महीने हो गए शादी के पत्नी का हक़ मांग रहें हैं। हम कब तक अकेले पड़े रहें यहाँ? हमें भी आश्रम ले जाएँ। हम भी जोगन बन जाते हैं। ले चलो हमको हम पूछेंगे सरकार से कि यही सिखाते हैं अपने शिष्यों को पत्नी फालतू सामान है। घर में पडी रहने दो। आखिर शादी करने की जरूरत क्या थी ? सरकार की चाकरी करते। हमारी ज़िन्दगी क्यों बरबाद कर दी।‘’ बस नाम भर की पत्नी होकर रह गएँ हैं।” पित्रसत्ता की क्रूर पुरुषवादी ग्रंथि को खोलती ‘अनीता मिश्रा’ की कहानी …….

मुल्ला जी की गाय : व्यंग्य (अनीता मिश्रा) http://humrang.com/

टुन्ना पंडित को ये समस्या राम मंदिर जैसी बड़ी पेचीदा समस्या लगी इसलिए तत्काल एक पुड़िया निकाली.. मुहं में डाल कर बोले..मुल्ला जी समस्या बहुत कठिन है, वो भी आजकल के माहौल में…अब मोहल्ले की बात है तो कुछ तो करना पड़ेगा ….इस समस्या का एक समाधान है ..ऐसा करो मैं गाय को अडॉप्ट कर लेता हूँ | पिता की जगह मेरा नाम लिखा दो और गाय का नाम गौरी मिश्रा लिखवा दो …..

बंदिशों में ‘सोशल मीडिया की स्त्री’: आलेख (अनीता मिश्रा) http://humrang.com/

निसंकोच हमारे समय और सामज ने तरक्की के कई पायदान और चढ़ लिए हैं ! तब सहज ही यह सवाल मन में आ खड़ा होता है कि क्या तरक्की में संवेदना के स्तर पर मानसिक वैचारिकी का कोई पायदान भी हम चढ़ पाए हैं ? इसके अलावा क्या इन प्रगति के सोपानों को संपूर्ण समाज चढ़ रहा है या आधी दुनिया के बिना ही हमने पूर्ण समाज की संज्ञा से सुशोभित भर कर दिया है ? वास्तविक दुनिया से चलकर आभासी दुनिया तक के सफर में क्या हम स्त्री की मानवीय रूप में समान, सहज और स्वतंत्र अभिव्यक्ति को सुनने, पढने और इंसानी रूप में स्वीकारने की क्षमता भी विकसित कर पाने में सफल हुए हैं ? कुछ ऐसे ही मानवीय सवालों से जूझता ‘अनीता मिश्रा’ का यह आलेख……

हाल ही में प्रकाशित

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

पंकज तिवारी 44 2019-01-15

पहाड़ों की रानी, शिमला में जन्में चित्रकार और कहानीकार रामकुमार ऐसे ही अमूर्त भूदृश्य चित्रकार नहीं बन गये अपितु शिमला के हसीन वादियों में बिताये बचपन की कारस्तानी है, रग-रग में बसी मनोहर छटा की ही देन है इनका रामकुमार हो जाना। अपने में ही अथाह सागर ढूढ़ने वाले शालीन,संकोची रामकुमार बचपन से ही सीमित दायरे में रहना पसंद करते थे पर कृतियाँ दायरों के बंधनों से मुक्त थीं शायद यही वजह है उनके अधिकतर कृतियों का 'अन्टाइटल्ड' रह जाना जहाँ वो ग्राही को पूर्णतः स्वतंत्र छोड़ देते हैं भावों के विशाल या यूँ कहें असीमित जंगल में भटक जाने हेतु। किसी से मिलना जुलना भी कम ही किया करते थे। उन्हे सिर्फ और सिर्फ प्रकृति के सानिध्य में रहना अच्छा लगता था - उनका अन्तर्मुखी होना शायद इसी वजह से सम्भव हो सका और सम्भव हो सका धूमिल रंगों तथा डिफरेंट टेक्स्चरों से युक्त सम्मोहित-सा करता गीत। 

- पंकज तिवारी का आलेख 

मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक: आलेख (अरविंद जैन)

मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक: आलेख (अरविंद जैन)

अरविंद जैन 58 2019-01-15

आदेश ! अध्यादेश !! ‘अध्यादेश’ के बाद, ‘अध्यादेश’

'यह संसद और संविधान की अवमानना है। ‘राजनितिक फ़ुटबाल’ खेलते-खेलते, ‘मुस्लिम महिलाओं की मुक्ति’ के रास्ते नहीं तलाशे जा सकते। संसद में बिना विचार विमर्श के कानून! देश में कानून का राज है या ‘अध्यादेश राज’? बीमा, भूमि अधिग्रहण, कोयला खदान हो या तीन तलाक़। सब तो पहले से ही संसद में विचाराधीन पड़े हुए हैं/थे। क्या यही है सामाजिक-आर्थिक सुधारों के प्रति ‘प्रतिबद्धता’ और ‘मजबूत इरादे’? क्या यही है संसदीय जनतांत्रिक व्यवस्था की नैतिकता? क्या यही है लोकतंत्र की परम्परा, नीति और मर्यादा? यह तो ‘अध्यादेश राज’ और शाही निरंकुशता ही नहीं, अंग्रेजी हकुमत की विरासत का विस्तार है। ऐसे नहीं हो सकता/होगा ‘न्यू इंडिया’ का नव-निर्माण। अध्यादेशों के भयावह परिणामों से देश की जनता ही नहीं, खुद राष्ट्रपति हैरान...परेशान होते रहे हैं।' 

मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक पर गहरी क़ानूनी समझ सामने लाता वरिष्ठ अधिवक्ता 'अरविंद जैन' का आलेख 

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