कैलाश मनहर की कविताएँ—समकालीन जीवन की संवेदनहीनता, सामाजिक पाखंड और मानवीय अनुभवों की गहराई को बेहद सहज लेकिन तीखे ढंग से उजागर करती हैं। ये कविताएँ केवल घटनाओंका वर्णन नहीं करतीं, बल्कि हमारे समय की नैतिक स्थिति पर एक शांत, पर प्रभावशाली टिप्पणी प्रस्तुत करती हैं। भाषा सादगीपूर्ण है, लेकिन अर्थ-स्तर पर अत्यंत गहन। उनकी कविता दिखावे से मुक्त,अनुभवजन्य और मानवीय सरोकारों से जु1ड़ी हुई है। ये रचनाएँ इस बात की पुष्टि करती हैं कि जब समाज दर्द और सच से मुँह मोड़ लेता है, तब कविता ही उसका सबसे ईमानदार साक्ष्य बनती है।
खोया हुआ आदमी एवं अन्य कविताएं
1- खोया हुआ आदमी
एक खोये हुये आदमी से मिला मैं कल शाम
जो सब कुछ भूल चुका था और
जिसे अपने गंतव्य का भी कुछ पता नहीं था
लेकिन रात घिरने वाली है और
इस घटाटोप में तुम कहाँ रहोगे भले आदमी
मैंने अपनी चिन्ता प्रकट की तो
तनिक भी विचलित नहीं हुआ वह और कहा
मुझे बीड़ी बण्डल और माचिस
चाहिये रात भर के लिये यदि तुम दिला सको
एक बीड़ी से गुज़ार सकता हूँ मैं आधा घण्टा
और तब तक सुबह हो जायेगी
पूर्णत: निर्विकार और निर्लिप्त लगा वह मुझे
इतने तो ठिकाने हैं इस शहर में
पार्क बस अड्डे और रेल्वे स्टेशन
टीनशेड छतनुमा पुलियायें और खुले बरामदे
बेघरों का घर यात्रायें ही होती हैं
मांग कर पी लूँगा किसी से सुबह की चाय भी
चार दिन काटना जिसे आ गया
वह उम्र भी काट सकता है अन्जान दुनिया में
2- वह पागल आदमी
सब लोग उसे पागल कहते थे और बच्चे
बावळा बावळा कह कर चिढ़ाते रहते थे हमेशा कि
पता नहीं वह कहाँ से आया था अचानक
मैनें उसे पहली बार जब देखा तो वह
चाय वाले से चाय ले कर अपनी ज़ेब से
दोतही सूखी रोटी निकाल कर खाने लगा था और
फिर “भाड़ में जाये यह ज़िन्दगी” बोलता
नारे की तरह हाथ हिलाता चला गया था
श्मसान की तरफ़ जबकि
बाद में भी अक्सर
भटकता हुआ दिख जाता था बाज़ारों में
कभी किसी दुकानदार के तराज़ू पर ग़ौर करते या
किसी मालिक द्वारा नौकर को गालियाँ देते हुये
देख कर बोल ही पड़ता था वह बीच में
“पूरा तोल:मीठा बोल” किसी ब्रह्म-वाक्य की तरह
और एक दिन तो हद़ हो गई जब
भाषण देते मंत्री की तरफ़ वह
“झूठ बोलता है”
चिल्लाते हुये मुठ्ठियाँ तान कर उछलने लगा एकदम से
और पता नहीं क्यों कि उस दिन जब
मुरली बाबू गुस्सा हो रहे थे अपने बेटे पर
कोई काम-धंधा न करने के कारण तो
बुदबुदाता हुआ निकल गया था वह कि
“दुनिया और हालात का गुस्सा
हमेशा कमज़ोर पर उतारते हैं कायर लोग”
तो मैं चाह कर भी नहीं रोक पाया उसे
आज नगर निगम की हथ-ठेली में ले जा रहे हैं उसे
कुछ सफ़ाई कर्मचारी तो याद कर रहा हूँ मैं
पहली बार देखना उसे कि
अघिकतर इसी तरह होती है शायद
दर्दनाक कविताओं की मृत्यु
इस सकारात्मक समय में आख़िरकार
जरूरत भी क्या है दर्द में डूबे पागलपन की
जब ईमानदारी को मान लिया गया हो
बेवकूफ़ी भरी नकारात्मकता का पर्याय-सा
3- भरपूर प्रेम
पीले छींटो वाली वह भूरी तितली
हमेशा सदाबहार के फूलों पर मंडराती है और
सफ़ेद धारियों वाली वह गुलाबी तितली
अक्सर कनेर के फूलों के पास आती है जबकि
काले रंग पर लाल बिन्दुओं वाली तितली
हर शाम गुलाब के फूल पर आ बैठती है
मैं बहुत दिनों से देख रहा हूँ उनका
अपने निश्चित फूलों की ओर उड़ कर आना
मुझे अपने लिये पक्के तौर से नहीं पता
लेकिन तुम शायद इन सभी रंगों वाली तितली हो
क्या मुझ में भी तुम्हें अहसास होता है
इन सभी फूलों की खुश्बू और रंगों का
क्या इसीलिये हम भरपूर प्रेम करते हैं हमेशा
कि छूट न जाये कोई रंग या खुश्बू
कैलाश मनहर
जन्म:--02अप्रेल 1954
ग्यारह कविता संग्रह प्रकाशित।
जनवादी-प्रगतिशील विचारधारा।
अनेक सम्मान और पुरस्कार।
मनोहरपुर(जयपुर-राज.)
मोबा.9460757408