क्रांतिकारी की कथा : राजनीति और समाज का व्यंग्यात्मक सच
‘क्रांतिकारी की कथा’ एक तीखा व्यंग्य है जो समाज, सत्ता और दिखावटी क्रांति की मानसिकता को उजागर करता है। यह […]
‘क्रांतिकारी की कथा’ एक तीखा व्यंग्य है जो समाज, सत्ता और दिखावटी क्रांति की मानसिकता को उजागर करता है। यह […]
विकास की ओर बढ़ते भारतीय गाँवों में जातिगत भेदभाव अब भी एक गंभीर समस्या है। ‘चाँद के पार एक चाभी’
1985 में चकमक से जुड़ाव ने किताबों और वाचनालयों के साथ एक नया रिश्ता बनाया। हर महीने पुस्तकालय में बिताए
‘ड्राइवर साहब, आप मुझे हितैशी समझें या दुश्मन परन्तु बात सच है मुंह से नहीं कह पाया इसलिए लिख कर
कितना तकलीफ़देह होता है उस स्वीकारोक्ति से खुद का साक्षात्कार, जहाँ आपको एहसास हो कि जिस चीज़ की प्राप्ति या
सभ्यता के विकास के साथ ही प्रेम और युद्ध से सम्बन्धित किस्से कहानियां प्रचलित होने लगी थीं ! प्रेम और
पाँच साल बाद गाँव लौटी कामिनी अपने प्रेम के लिए नहीं, बल्कि अपने पिता की संपत्ति में बराबरी के हक
“दयामय की दया” केवल एक कहानी नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर छिपी करुणा, नैतिकता और अंतःकरण की शक्ति का गहरा
‘इदिका राय’ की कविताएँ हमारे समय की सबसे बेचैन और ईमानदार अभिव्यक्तियों में से हैं। ये कविताएँ किसी अलंकारिक शिल्प
दूसरा पड़ाव – संघर्ष ,उम्मीद और बदलाव की कहानी है हनीफ़ मदार की – ‘जब भी उसकी आंखों को देखता
कैलाश मनहर की कविताएँ—समकालीन जीवन की संवेदनहीनता, सामाजिक पाखंड और मानवीय अनुभवों की गहराई को बेहद सहज लेकिन तीखे ढंग
रश्मि सिंह की कविताएँ समकालीन हिंदी कविता के उस सशक्त पक्ष को उजागर करती हैं जहाँ अनुभूति, वैचारिक प्रतिबद्धता और