ISSN - 2455-2011
RNI - UPHIN/2017/74803

पाँच साल बाद गाँव लौटी कामिनी अपने प्रेम के लिए नहीं, बल्कि अपने पिता की संपत्ति में बराबरी के हक के लिए खड़ी होती है। यह कहानी है एक पढ़ी-लिखी लड़की की, जो पंचायत, जाति और पितृसत्ता के खिलाफ कानून और हिम्मत के साथ लड़ती है।

 

beti ka huqa

पाँच साल पहले जिस लड़की के नाम से गाँव की इज़्ज़त काँपती थी, वही लड़की आज फिर उसी गाँव की चौखट पर खड़ी है। लेकिन इस बार वह किसी रिश्ते, प्रेम या समझौते के लिए नहीं लौटी — वह लौटी है अपने अधिकार लेने
“फिर लौट आई कामिनी” एक पढ़ी-लिखी, जागरूक और साहसी बेटी की कहानी है, जो पितृसत्ता, जाति व्यवस्था और पंचायत की धमकियों के सामने झुकने से इनकार कर देती है। यह कहानी सिर्फ एक लड़की की नहीं, बल्कि उन तमाम बेटियों की आवाज़ है जो अपने हिस्से का आसमान माँगती नहीं — लेकर रहती हैं।

फिर लौट आई कामिनी

सवेरा होते ही यह खबर आग की तरह फैल गयी कि कामिनी रात पूरे पाँच साल के बाद लौटकर अपने गाँव दौलतपुर में आ गयी थी। गाँव के हर गली कुचे व नुक्कड़ पर तीन चार व्यक्ति खड़े होकर उसी चर्चा में लगे थे। ऐसा लग रहा था कि इस समय ये सब लोग कितने निठल्ले व फुरर्सत में है, इनके पास कोई नही है सिर्फ इस चर्चा में शामिल होने के लिए इन सब लोगों ने अपने-अपने कामों से छुटटी लेली हो। सब इसी इंतजार में थे कि देखते है, खेमी और उसके बेटे क्या करते है। मुश्किल से तो गाँव वाले इस नाम को भूल पाये थे। यदा-कदा फिर भी, यह नाम उनकी जुबान पर अक्सर आ ही जाया करता था। आये भी क्यों नही ? क्योंकि कामिनी का अपने गाँव के अलावा आस-पास के सभी गाँवों में लोग उसकी मेहनत, हिम्मत तथा पढाई-लिखाई से सम्बंधित किसी भी जानकारी के लिए, सब उसी के पास आया करते थे। जब भी वह गली मुहल्ले से बाहर निकलकर जाती तो लड़को बेवजह गप्पबाजी करता या खेलता हुआ देखकर उनमें लताड़ लगाती ’’तुम लोग पढ़-लिख नही सकते हो। सुबह के निकलते हो, शाम को घरर में घुसते हो। यूँ ही मुँह उठाये इधर-उधर घूमते रहते हो। सभी लड़के उसकी बातों को हवा में उड़ाते हुए जोर का ठहाका लगाते और कहते ‘‘ हम लड़को को पढ़ने की जरूरत नही है। हम तो बिना पढ़े-लिखे भी लड़के है और तुम जैसी पढ़ी-लिखी लड़कियों पर अपना आर्ड़र चला सकते है, समझी। तू खूब पढ़-लिख किसी ने तुझसे मना किया है क्या ? वह उनके इस कमेन्ट की परवाह किये बगैर उनकी तरफ मुँह चिढ़ाती हुई निकल जाती। खेमचन्द ने भी गाँव वालों के लाख मना करने पर भी कामिनी को बड़े कॉलेज में पढ़ने के लिए भेजा। वह सारे गाँव में बड़े शान से कहता, “मेरी तो बेटी ही मेरा नाम ऊँचा करेगी। बेटे तो दोनों गघे है मेरे।” कुछ दिनों बाद तो गाँव वालों को भी अपने गाँव पर नाज होने लगा था कि उनके गाँव की बेटी भी अब बी0 ए0, एम0 ए0 की पढ़ाई एक बड़े नामी विश्वविद्यालय से कर रही है। और वहां से कुछ बनकर ही आयेगी। सब लोग बच्चों को कामिनी का ही उदाहरण देते थे। “देख लो उस खेमी की लड़की को, अरे दूसरे शहर में अकेली रहकर पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ अपनी पढ़ाई कर रही है।” खेमी ने भी कोई कसर नही छोड़ी थी हर तरीके से उसकी सहायता करने में जब भी कोई त्यौहार आता, आठ दस दिन पहले से ही घर में नयी-नयी तरह की मिठाईयाँ तथा पकवान बनने लगते और डिब्बों में भरकर खेमी खुद उनको लेकर अपनी बेटी से मिलने जाता। भगवान की कृपा से खेमी के पास रूपयों-पैसों की कोई कमी न थी। पूरे साल खेत में फसल बहुत जो हो जाया करती थी, खेमी के पास लगभग 60 बीघा खेत था। जिसे वह अकेला ही जोतता था गाहे-बगाहे उसके लड़के कहते भी थे कि क्या करना है पढ़-लिखकर, अरे हमारे बाप के पास ढेर जमीन है अगर अपने-अपने हिस्से की भी बेच बेचकर पूरी जिन्दगी बैठकर आराम से खा सकते है। बेटो की इस तरह की बात सुनकर खेमी बहुत दुखी होता था। लेकिन बेटी की तरफ से वह सुखी था, चलो तीनो औलाद में से एक तो पढ़ने लिखने में ठीक है। जब भी कॉलेज की छुटिटयां होती कामिनी गाँव आती। वह सबके साथ ऐसी ही खिलनदड़पने से घूमती हुई, बात-चीत करती जैसे वह पहले किया करती थी। गाँव वालों को बहुत अचम्भा होता था क्योंकि शहर जाने के बाद उसका अपना पहनावा व गेटअप एकदम शहर की लड़कियों की तरह हो गया था। परन्तु उसने अपनी आदतों में कोई परिवर्तन नही किया था। इसलिए भी सब उसकी तारीफ करते थे कि शहर में पढ़ने-लिखने के बावजूद वह अपने गाँव से कितना लगाव रखती है। अब कामिनी ने ग्रेजुएशन पूरा कर लिया था। आगे एम0 ए0 की तैयारी में जुटी थी। वह समाज शास्त्र से पी0 एच0 डी0 करना चाहती थी। उसकी ख्वाहिश थी कि वह किसी भी सामाजिक बिन्दु पर शोध करें। बचपन में जब भी वह अपने पिता के साथ खेतों पर घूमने जाया करती थी। वह रास्ते में कुछ लोगो को देखती थी । जो कि टूटे फूटे घरों व झोपडियों में रहते थे। इन घरों में मैल से चीकट कपडो को पहने ढेर बच्चें खेलते रहते। वह हमेशा यही पूँछती ‘‘ पिताजी ये लोग हमारे जैसे घरों में क्यों नही रहते और इनके बच्चे स्कूल क्यों नही जाते है।‘‘ पिताजी का हमेशा एक ही जबाव होता ‘‘ये गरीब पिछड़ी जाति के लोग है। ये हमेशा से ऐसे ही अपना जीते आये है। वह शांत हो जाती लेकिन उसके भीतर अनेक प्रश्न अपना फन उठाये, उसे काटते रहते कि इसकी वजह क्या है ? वह समाज की हर चीज को पढ़ लेना चाहती थी। इसलिए उसने एम0 ए0 में समाजशास्त्र ही लिया था। बोलने तथा पढ़ने में हमेशा से ही कामिनी तेज तरार्ट थी | इसी खूबी के कारण एम0 ए0 के प्रथम वर्ष मे आते-आते ही वह कक्षा की नेता बन गयी थी। कॉलेज में छात्र चुनाव हुए तो वह चुनाव जीत गयी और दूसरे दिन अखवार के मुख्य पृष्ट पर कॉलेज की खबर के साथ उसका फोटो भी छपा था। गाँव के सभी लोग खुश थे और खेमी को बधाई देने आरहे थे। ‘‘बधाई हो खेमी आज कामिनी ने तुम्हारा ही नही इस गाँव का भी नाम रोशन कर दिया । वह आज पूरे कॉलेज में नेता बन गयी। हम तो पहले ही कहते थे कि हमारी बेटी कहीं भी जायेगी, हमारा नाम ही ऊँचा करेगी। खेमी के मुँह से बस इतना ही निकल पाया कि यह सब आप लोगों के प्यार और आशीर्वाद का कमाल है। छात्रसंघ की नेता बनने के बाद तो कामिनी बहुत व्यस्त रहने लगी। अब उसके फोन भी आना कम हो गये थे। जबकि पहले वह रोज किसी भी वक्त फोन करके घर की राजी खुशी पूँछ ही लिया करती थी। अब यह सिलसिला लगातार घटता ही जा रहा था। 10-10 दिन निकल जाते थे, उसका फोन नही आता था। माँ को चिन्ता होती तो खेमी उसे समझाता, तू चिन्ता मत किया कर हमारी बेटी ठीक है और अब वह छात्रों की नेता बन गयी है तो उनकी समस्याओं को भी तो हल करती होगी और फिर अपनी पढ़ाई भी | इसलिए उसे फोन करने का वक्त नही मिल पाता होगा और क्या हुआ महीने में दो-चार बार तो फोन कर ही लेती है न | कमला भी खेमी की बात सुनकर चुप हो जाती लेकिन वह अपने अन्तरमन को शान्त न कर पाती | उसे हर समय एक ही भय सताता कि लड़की के साथ कुछ गलत न हो जाये। परन्तु वह इस मन की व्यथा को किसी से कह न पाती। अपनी मधुर भाषा और बात को एकदम अदभुत स्टाइल से कहने के कारण, वह सभी छात्रों के दिलों के बहुत करीब रहती थी। और सभी की परेशानियों को भी समझती, उनका चिन्तक मनन करके हल निकालने की कोशिश भी करती। वह छात्रों की किसी भी समस्या को लेकर कॉलेज प्रबंधक समिति से अकेली ही मिलती और उन समस्याओं को उनके सामने रखती और उनपर बहस करती | ऐसे तर्क देती जिनका कोई काट नही होता, अन्ततः जीत छात्रों की होती। उसकी इस वकपदुता तथा इंटेलीजैन्सी को वजह से बहुत से लड़के उससे दोस्ती करने के लिए हाथ आगे बढ़ाते तो वह तुरन्त बोल देती कि मै तो पहले ही तुम्हारी दोस्त हूँ। इस खास दोस्ती की क्या जरूरत है। इतना सुनते ही लड़के अपना हाथ पीछे कर लेते और इधर-उधर आँखे चुराने लगते। जब भी ये लड़के कामिनी को देखते तो उसपर कमेन्ट करने लगते। सन्दीप जो कि उनका साथी होने पर भी, थोड़ा सा उन लड़कों से अलग था, उसको बहुत बुरा लगता और कहता अगर हिम्मत है तो उसके सामने आकर कहो। पीठ पीछे तो सभी गालियां दे लेते है। सभी लड़के उसकी बात पर ताली पीट-पीट कर हंसते और कहते। अबे साले तुझे बहुत प्राबलम होती है जब हम कुछ कहते है। तेरी क्या वो बहिन लगती है। उस दिन उनमें से किसी ने कहा, यार एकदम ठीक कह रहे हो। हो सकता है इसने उसे अपनी बहिन बना लिया हो | यह भी तो उसके गाँव के पास का ही है। और फिर सभी जोर-जोर से ठहाके मारकर हँसने लगे | सन्दीप चिढ़ गया, धीरे-धीरे उन लड़कों की ये हरकते कॉलेज में फैलने लगी थी। इसलिए सन्दीप ने उनका साथ छोड़ दिया था। अब ज्यादा तर वक्त वह लाइब्रेरी में बैठकर पढ़ने में व्यतीत करता था। जब कामिनी को उन लड़कों से सदीप के झगड़े के बारे मे पता चला तो उसके मन में सदीप के लिए एक सकारात्मक सोच पैदा होने लगी | एम0 ए0 फाइनल परीक्षाए नजदीक आ गयी थी। इसलिए कामिनी ने फिलहाल सभी समस्याओं को छोड़कर अपनी पूरी एकाग्रता अपनी पढ़ाई पर लगा दी थी। क्योंकि वह अपने अध्ययन के लिए ही इस अनजाने शहर में आयी थी। किताबों की अदला-बदली के कारण यदाकदा लाइब्रेरी चली जाती तो सदीप से भी उसकी हाय हेलो होने लगी थी। एक दिन बातचीत के दौरान ही उसे पता चला कि संदीप उसी के इलाके का है। और संदीप का गाँव उसके गाँव से 25 किमी आगे है। कामिनी को बहुत खुशी हुई कि चलो कोई एक तो है जो उसके इलाके का, उसके जैसा है । कामिनी को अपने गाँव जाये बिना करीब छः महीने गुजर चुके थे। और फोन से बातचीत का दायरा भी कम हो गया था | अब खेमी को भी चिन्ता होने लगी थी | वह एक दिन अचानक ही उसके कॉलेज पहुँच गया था। अपने पिता को देखकर कामिनी बहुत खुश हुई । पास में सनदीप को खड़ा देखकर खेमी ने संदीप के बारे पूछा तो कहने लगी, पिताजी यह सदीप सिह है। यह भी मेरे साथ एम0 ए0 कर रहा है। ठीक मेरी तरह ही सोचता है और पी0 एच0 ड़ी0 करके कुछ रिसर्च करना चाहता है। ये भी अपने ही गाँव के पास का है। खेमी लगातार कामिनी के चेहरे को देख रहा था। वह बहुत खुश होकर तथा पूरे एक्साइट मेन्ट के साथ ये सब बता रही थी। उसके सामने खेमी सिर्फ इतना ही कह पाया था। चलो अच्छा है अपने गाँव का न सही पर अपने इलाके का एक बालक यहाँ मौजूद है। अब मेरी चिन्ताए भी कुछ कम हो जायेंगी |

बेटी के पास से वापस लौटते समय खेमी सारे रास्ते बस में बैठा यही सोचता रहा कि जो लड़की कभी किसी लड़के को भाव नहीं देती थी किसी भी लड़के से बातचीत करने में रुची नही दिखाती थी। वह आज संदीप के बारे में कितनी उत्साहपूर्ण बातें कर रही थी | जरुर कुछ बात तो है जो उसने मुझे नही बताई है। कही कामिेनी उसके साथ……? नहीं नही ऐसा नही हो सकता, मेरी बेटी बहुत समझदार है। बस के अचानक ब्रेक लगने की बजह से उसका सिर पास की खिड़की के शीशे से जा टकराया, उसकी तन्द्रा टूटी। उसने देखा कि बस एक सुनसान जगह पर खड़ी थी। बस का टायर पंचर हो गया था | वहां से शहर भी काफी दूर था। सभी लोग बस से नीचे उतर चुके थे । उसे भी बस से नीचे उतरना पड़ा | वह सड़क पर इधर से उधर टहलता हुआ सिर्फ कामिनी के बारे में ही सोचता रहा। अंततः उसने अपने आप को समेझााया कि जब लड़की घर से बाहर रह रहीं हो तो उसकी मित्रता किसी से भी हो सकती है। लड़की या लड़का मैटर नहीं करता है। उसने अपने आप को इस विषय पर सकारात्मक किया और गांव पहुंच गया ।

Image from Canava

कमला लगातार दरवाजे पर टकटकी लगाए बैठी खेमी का इन्तजार कर रही थी । उसके मन में भी ढेर सारी अच्छी बुरी अकाक्षांऐं समुद्र की लहरों की तरह उठ रही थीं। तो कभी शान्त हो रही थी। उसका मन कामिनी के शहर आने के पहले दिन से ही चिन्तित था। वह नही चाहती थी कि जवान लड़की घर से दूर शहर में अकेली रहे लेकिन खेमी की जिद के आगे उसकी एक न चली थी । खेमी के घर में घुसते ही उसने सवालो की झड़ी लगा दी। ‘‘कामिनी कैसी है..? उसने इतने दिनों से फोन क्यों नही किया था ? वह सही तरह से तो रह रहीं है न ? वह खाना समय से खा रही है न ? वह शहर में ज्यादा घूमने फिरने तो नहीं लगी है न ?’’ और कहते कहते हांफने लगी ।

‘‘अरी भागवान तुमने न पानी की पूछी न चाय की और सवालों की इतनी झड़ी सी लगा दी। पहले मुझे आराम से बै़ठ तो जाने दे, तभी तो तेरे सवालों के जवाब दूंगा।’’ खेमी ने हाथ में लगे थेले को कमरे मे लगी एक खूंटी पर टांगते हुए कहा। इतना सुनते ही कमला झैंप गई, उसे लगा कि वह कुछ ज्यादा ही भावावेश में आगई थी। और तुरन्त पानी लेने चली गई। पानी पीने के बाद चैन की लम्बी सांस लेकर इत्ंमीनान से कमला के सभी सवालों का जवााब देते हुए खेमी ने कहा ‘‘कामिनी एकदम सही है परीक्षा नजदीक होने की वजह से उसने फोन नही किया था। वह अधिकतर अपना समय पढ़ने में ही व्यतीत करती है।’’ इतना सुनते ही कमला खुश होकर अपने घर के कामों में व्यस्त हो गई।

एम0 ए0 की परीक्षा पूरी होते ही कामिनी और संदीप एक दूसरे के करीब आ गये थे। दोनो अपना अधिकतर समय लाइब्रेरी में ही व्यतीत करते थे। और दोनेा ही पी० एच० डी० के लिए नैट की त्यारी करने में जुटे हुए थें। गर्मी की छुट्टियां हो चुकी थीं | सभी बच्चे अपने-अपने घरों को जा रहे थे। और कुछ अपने रिसर्च में लगे थे। खेमी ने इस बार भी बेटी को गर्मी की छुट्टियां गाँव  में बीताने के लिए कहा तो कामिनी ने भी बहुत खुश होकर कहा ‘‘हां पापा जी इस बार में छुटिटयां गांव में ही व्यतीत करुंगी हांलाकि मेरी नैट की त्यारी चल रही है लेकिन कोई बात नही अगर मुझे कोई समस्या अऐगी तो मैं संदीप से डिसकस कर लुंगी । वह भी छुटिटयों में अपने गांव आ रहा है।’’ इतना सुनते ही खेमी ने फोन काट दिया। और थोड़ा परेशान सा होने लगा। पास में खड़ी कमला खेमी के चेहरे को देखते ही बोली ‘‘क्या बात है तुम फोन पर बात करते ही परेशान क्यों हो गये ? क्या कहा कामिनी ने वह आ नही रही है क्या ?’’ पत्नि की बात सुनते ही खेमी ने स्वम को संयत कर तुरन्त फुर्ती से जोश भरे अंदाज मे कहा ‘‘अरे! कामिनी दो दिन बाद गांव आ रही है, वह भी पूरे एक महीने के लिए’’ इतना सुनते ही घर में सब लोगों के चेहरे खुशी से खिल गये। कमला से कहे बिना रहा नहीं गया तो आटे के सने हाथ लिए ही रसोई से निकल कर, बाप बेटों की बात केा बीच में काटते हुए बोली ‘‘कहे देती हूं इस बार में किसी की भी मानने बाली नहीं हूं मेरी कम्मो कई सालों में इतनी लम्बी छुटिटयां बिताने आ रही है। इस बार तो मैं भगवान सत्यनारायण की कथा जरुर कराउंगी | उन्होने मेरी प्रार्थना सुन ली है। मेरी बेटी सही सलामत अच्छी तरह से अपनी पढ़ाई पूरी कर रही है ।’’ उसका छोटा बेटा रन्नो जो एकटक अपनी मां के चेहरे को पढ़ रहा था, तुरन्त ही बोला ‘‘मम्मी तुम कितनी जल्दी भूल जाती हो कि जिसके लिए यह कथा करवाने की सोच रही हो, क्या वह करने देगी तुम्हें ? याद नहीं एक बार श्राद् के समय तुमने छत पर पत्तल लगा कर अपने प्रेतो के लिए खाना रख दिया था जिसे पक्षी चौंच मार-मार कर खराब कर रहे थे तो उसने कितना हल्ला मचाया था कि जीवित इन्सानों के लिए तुम्हारे पास खाना है नहीं और तुम लोग कर्म काण्डों के नाम पर खाना फैंक रहे हो। और गुस्से से उसने सारा खाना गांव बाहर बनी वस्तियों में रहने बाले सभी बच्चों केा खिला दिया था। इस बात से तुम बहुत दिनो तक दीदी से गुस्सा हो गई थी | अब तो उनके पास ढेर सारे भाषण होगे तुम्हे सुनाने के लिए, वैसे भी अब वह प्रोफेसर बनने की त्यारी जो कर रही हैं। इतना सुनते ही कमला का जोश कुछ ठंडा सा पड़ गया। और बोली ‘‘हां, हां ठीक है तुम सब बहन भाई ज्यादा होशियार हो गये हो , हम तो अनपढ गवांर हैं जिन्हे कुछ नही आता है। और बड़बड़ाती हुई रसोई में घुस गई।

                खेमी अपने बड़े बेटे जग्गो के पास बैठा अंगोछा में मुंह छिपाए हंस रहा था। पत्नि के जाते ही वह अपने बेटों के साथ फिर से पूरे एक महीने के प्लानिंग चार्ट पर काम करने लगा। वेशक खेमी के दोनो बेटे रन्नो और जग्गो पढ़ने में होशियार नही थे, न ही ज्यादा पढ़े लिखे थे लेकिन वह भी पूरे गांव में अपना सीना तान कर रहते थे कि उनकी बहन अब प्रोफंसर बनने जा रही थी | यह भी तो उनके लिए एक गौरव की बोत थी वह गांव की इतनी पढी-लिखी पहली लड़की थी। अब मिलकर तीनो ने अपने अपने हिस्से के दिनो को कामिनी के साथ मिलकर बिताने की प्लानिंग पक्की कर ली। जिसमें पिकनिक से लेकर शादी पार्टी, शिक्षण भ्रमण सभी रंग मौजूद थे।

                तीनों आपस में इस बात पर बहस करने लगे थे कि पहले 15 दिन मैं घूमने जाउंगा उसके बाद तुम उसके बाद तुम उनके झगड़े के शोर शराबे को सुनकर मां भी कमरे में आ गई और बोली ‘‘जिसके लिए तुम झगड़ा कर रहे हो पहले उसे आ जाने दो, तब वही अपने आप बेता देगी कि पहले उसे किसे साथ घूमने जाना है।’’ कमला की बात सुनकर सभी शान्त हो गये। खेमी ने भी कमला का सर्मथन करते हुए उसकी हां में हां मिलाई। ढेर सारे सपनों केा अपनी आंखों में लिए दोनेा भाई अपने अपने पलंग पर लेट गये। यह अलग बात है कि बचपन में बच्चे आपस में बहुत झगड़ा करते हैं लेकिन उनकी नौक झौंक व झगड़ों में भी कितना प्यार होता है, यह दूर रहकर ही समझ में आता है। अब इस बात को रन्नो व जग्गो भी समझ गये थे जब वह कामिनी से पूरे पांच वर्ष अलग रहे थे। इन्हीं खट्टे मीठे सपनों को देखते-देखते रात के किस पहर में जाकर वह कब गहरी नीद में उतर गये यह पता भी न चला।

                सुबह पास के कमरे से आती घंटियों की आवज ने रन्नो को जगा दिया। वह झट से उठ कर बैठ गया और झकझोर कर जग्गो को भी जगाया। और आंखे फाड़ फाड़ कर इधर उधर देखने लगा। और दोड़ कर बाहर बैठक में लगी घड़ी को देखने लगा। घड़ी सुबह के सात बजा रही थी । वह दौड़कर मां के पास गया जो कि कमरे में अपने गिरधर गोपाल को भोग लगाने में व्यस्त थी । मां को जोर से हिलाते हुए कहने लगा ‘‘तुमने मुझे जगाया क्यों नहीं आज कितनी देर हो गई है। पापा अकेले ही दीदी केा लेने स्टेशन चले गये क्या ?’’ आज उसको हड़बड़ाता देख मां भी बड़े अचरज में थी। कि जो लड़का सुबह हजारों आवाज लगाने पर भी नहीं जागता था वह आज अपने आप उठकर इधर-उधर बौखलाया सा घूम रहा है जैसे कोई कीमती चीज खो गई हो। कमला ने आखिर डांटते हुए कह ही दिया, क्या बात है क्यों इतना परेशान हो रहा है। कम्ंमो का सुबह फोन आ गया था ,वह अपने आप घर आ जाऐगी। हम लोग परेशान न हों और वह दोपहर की गाड़ी से आऐगी। अभी घड़ी में सुबह के सात बजे हैं । तेरे पापा अभी खेत पर गये हैं।’’ इतना सुनते ही रन्नो ने चैन की सांस ली। जैसे उसकी खोई हुई बेशकीमती प्यारी चीज मिल गई हो। अब उसे भी विश्वास हो गया कि बैठक बाली घड़ी सही है।

                आज मां भी दीदी के आने की खुशी में जल्दी उठकर पूजा कर रही है। वर्ना रोज मां का पूजा करने का समय दोपहर बारह या एक बजे का हेाता था। थोड़ी देर बाद कामिनी को घर देखकर मां और भाई बहुत खुश थे | रन्नो ने बताया कि हम तुम्हें स्टेशन लेने आने बाले थे कि तुम…..। उसकी बात को बीच में काटते हुए कामिनी कहने लगी ‘‘वह क्या है न कि संदीप भी इसी ट्रेन की टिकिट ले आया था, दोनो ही साथ आ गये। मां की लगातार संदेह भरी नजरों को देखते हुए कामिनी सिर्फ इतना ही बता पाईे कि संदीप उसका मित्र है उसके साथ ही पढ़ता है और हमारे गांव से आगे बाले गांव का रहने बाला है। इसकी आप लोगों से मिलने की इच्छा थी सेा मेरे साथ आ गया। रात को खाने के समय संदीप से बातचीत के दौरान ही खेमी को पता चला कि वह होशियारपुर का रहने बाला है। जो कि दौलतपुर से पच्चीस किलोमीटर आगे था। कामिनी ने घूमने के सारे प्लान कैंसिल कर दिए। वह सारा दिन कभी अपने कम्प्यूटर पर कभी किताबों के साथ या फोन पर लगी रहती थी यदा-कदा कोई घर में आ जाए तो उससे रामा किशना हो जाया करती थी। लेकिन इस बीच में संदीप कई बार कामिनी से मिलने गांव जरुर आया करता था । और कई कई दिनों तक रहता भी था जिससे गांव के लोग दबी जुवान में कामिनी के बारे में उल्टी सीधी बातें कहने भी लगे थे। एक दिन खेत पर जाते समय खेमी केा रोककर, गांव के ही फुल्लन चाचा ने पूछ लिया ‘‘खेमी एक बात बता बैसे तो तुम्हारे घर में कमला बड़ी धरम करम बाली है और इस जाटव के लड़के को कैसे घर में खिला सुला रही है। अब एक बात मेरी मान बेटी खुब पढ़ ली है अच्छा सा लड़का देखकर उसकी शादी कर दे।’’ इतना कहते ही फुल्लन चाचा चलते बने | शाम को घर आकर खेमी ने कामिनी से कहा तो वह बोली ‘‘पापा आज तक मुझे इसकी जाति जानने की जरुरत नही पढ़ी और मुझे क्या फरक पड़ता है, वह कौन सी जात का है लेकिन इन्सान अच्छा है। और इन्सानियत उसमें कूट-कूट कर भरी है। मेरे लिए इतना ही जानना बहुत है। लेकिन बेटा …..। अभी खेमी इतना ही बोल पाया था कि बेटी ने प्यार से उसके मुंह पर उंगली रखकर उसे चुप कर दिया था। लेकिन खेमी का दिमाग चुप नही था। खेमी तेजी से कामिनी के लिए लड़का देखने में जुट गया था। इसी कारण कई रिश्तेदारों के फोन आना भी शुरु हो गये थे।

                एक दिन गुस्से में कामिनी ने सबके सामने कह भी दिया था जब तक मेरी पी० एच० डी० नहीं हो जाती मैं शादी नही करुंगी। आप लोग चाहे कुछ भी कर लीजिए| इस गरमा गरमी के बीच पिता ने भी फरमान जारी कर दिया कि वह अब लौटकर कालेज नहीं जाएगी, जो कुछ करेगी यहीं रह कर करेगी। कामिनी चुप हो गई और अपनी तैयारी में जुट गई । उसे नैट की परीक्षा दिलवाने स्वय खेमी लेकर गया था। अब उसे रिजल्ट की चिन्ता सताने लगी थी क्योंकि उसकी जिन्दगी इसी रिजल्ट पर निर्भर थी। घर में शादी की बातचीत, खोज खबर और तेज हो रही थीं। वह जानती थी जिस मान मर्यादा रस-रसूख वाले ये लोग हैं | अपनी बेटी केा अपने से ज्यादा ही संपत्ति वाले लोगो से रिश्ता करना पसंद करेंगे। वरना इनकी नाक कट जाऐगी | इसी खोजबीन में लगातार समय निकल रहा था। जो कि कामिनी के हित में था। एक दिन अचानक कालेज से लैटर आया कि उसने नैट की परीक्षा पास कर ली है। वह बहुत खुश थी। उसने अपने पिेता से कहा पापा मैंने नैट पास कर लिया है आप मेरे प्रोफेसर बनने की प्रक्रिया पूरी करवा दीजिए। प्लीज पापा मना मत करना, यह मेरी जिन्दगी का सवाल है। ऐसा मौका दुबारा नहीं मिलेगा। खैमी ने कोई जबाव नहीं दिया | वह उसके सामने हाथ जोड़ती रही। लेकिन खैमी पत्थर की मूरत बना सारी बातें सुन रहा था। वह रिरियाकर कह रही थी। पापा बोलो आप मेंरा एडमीशन पी० एच० डी० करवा देगे न बोलो पापा। प्लीज आप कुछ तो बोालो ……. खैमी सिर्फ इतना ही बोल पाया था ‘‘नहीं …..अब सारी पढाई अपने घर जाकर करना ।’’ आज कामिनी के रोने, गिडगिडाने का खैंमी पर कोई असर नहीं हो रहा था । पास बैठे दोनेा बेटे व पत्नि, खैंमी के इस रुप को पहली बार देख रहे थे। वास्तव में बेटो को आज पहली बार खैमी एक लड़की का पिता नजर आ रहा था। कमरे के दरवाजे पर खड़ी कमला लगातार यही सोच रही थी। कि यह वाही खेमी है जो बेटी के चेहरे पर जरा सी परेशानी की लकीर आ जाने पर अपनी रातो की नीद खो देता था। आज वह इतना पत्थर दिल कैसे हो सकता है ?

कामिनी अपने पिता के सामने खूब रोती व गिडगिडाती रही, हाथ पैर जोड़ती रही लेकिन उसने एक न सुनी | एक फरमान जारी कर दिया ‘‘आज से यह घर से बाहर कहीं नहीं जाएगी। कामिनी रात भर अपनी मां के पास लेटी रोती, सिसकती रही। वेबस, लाचार मां उसके आंसू पौंछने के सिवा कुछ न कर सकी। कामिनी सारा दिन उदास रहने लगी लेकिन वह अपनी हार मानने को तैयार न थी। एक दिन मौका देखकर वह संदीप के साथ घर छोड़कर हमेंशा के लिए शहर चली गई।  कमला ने मना किया तो कहने लगी ‘‘प्लीज मम्मेी मुझे जाने दो मैं तुम्हारी तरह घुट-घुटकर इन रहीशजादों के बीच मरना नहीं चाहती। मैं खुले आसमान में जीना चाहती हू।’’ कमला ठगी सी अपनी बेटी को जाता हुआ देखती रही।

कामिनी के जाने की खबर पूरे गांव में फैल गई । खैमी उसे लेने के लिए शहर गया उसने गांव लौटने से साफ मना कर दिया और बोली ‘‘अब मैं संदीप के साथ ही रहुंगी ।’’ खैमी भी अपने सारे रिश्ते-नाते तोड़ व गांव कभी न लौटने की चेतावनी देकर गांव वापस आ गया। बेटी न होने के संतोष के साथ ही अपने दिन गुजारने लगा। लेकिन आज कामिनी केा घर में देख कर उसका व उसके बेटों का खून खौलने लगा। जैसे-तैसे करके तो वह खोई हुइ इज्जत को वापस ला रहे थे। पता नही किस किस तरह की बातें समझाकर लोगों का विश्वास हासिल कर रहे थे। कि दोबारा कामिनी ने आकर उस थोड़ी बहुत उग आई नाक को फिर काट दिया। हां मां की आंखों से पानी जरुर टपक रहा था। जब से कामिनी आई थी। वह लगातार उसकेा देखकर रोये जा रही थी । वह इतनी हिम्मत भी न जुटा सकी कि एक बार अपनी बेटी को गले से लगा पाती। अपने गुस्सें केा संयत करते हुए खैमी ने पूछ ही लिया ‘‘यहां क्यों आई हो……? हमारा तुम्हारा रिश्ता तो उसी दिन खत्म हो गया था। जिस दिन तुम घर छोड़कर गयीं थी । अब यहां से चुपचाप चली जाओ।’’

‘‘चली जाउंगी लेकिन पहले मेरी चीज मुझे दे दो।’’

इतना सुनते ही छोटा भाई चिल्लाकर बोला ‘‘तुम्हारा यहां कुछ भी नहीं है।’’ कामिनी ने अपने गुस्से को काबू में करते हुए कहा ‘‘क्यों नहीं है जो तुम्हारा है वह मेरा भी है। इसलिए सबको बराबर का हिैस्सा मिलना चाहिए….. मुझे मेरा हिस्सा चाहिए।’’ इतना सुनते ही बड़ा भाई लाठी लेकर कामिनी की तरफ दौड़ा। कामिनी ने हाथ के इशारे से उसे रोकते हए कहा ऐसी गलती मत करना आप लोग, तुमको क्या लगता है मैं इतनी बेबकूफ हूं जो अकेली चली आती। मुझे पता था तुम लोग मुझे मार सकते हो इसलिए मैं पहले ही पुलिस प्रोटैक्शन के साथ यहां आई हूं। मैने घर में घुसते ही तुम लोगों के हाव-भाव देख लिए थे | उसी समय अपने फोन से यहां बैठे-बैठे ही सिर्फ एक बटन दवाया था | यह पुलिस केा गांव में अन्दर आने का सिग्नल था। अगर मेरी बात आप लोगों केा झूठी लग रही है तो तुम गेट खोलकर देख सकते हो।

बाहर पुलिस को खड़ा हुआ देख रन्नों का गर्म खून आधा ठंडा पड़ गया और एक अजीब सी खीज लिए अन्दर वापस आ गया। अभी वे तीनों बाप बेटे कुछ सोच पाते कि तभी मुखिया गांव के कुछ लोगों के साथ खैमी के घर में घुस आया | मुखिया के अन्दर घुसने के साथ ही पुलिस का दरोगा भी उनके पीछे-पीछे अन्दर आ गया। मुखिया के आवाज लगाने के साथ ही तीनो लोग बाहर आ गये । उसके तमतमाते हुए चेहरे को देखकर खैमी उपर से नीचे तक कांपने लगा । वह सिर्फ इतना ही पूछ पाया था कि ‘‘क्या बात है मुखिया जी आप इस तरह ……। खैमी के इस तरह पूछने पर मुखिया गरज कर बोला कुछ ओर बताने को रह गया है कल रात से तूने उस रांड़ी को घर में छुपा कर ररखा है। आखिर तू करना क्या चाहता है, सारा गांव तेरी तरफ आंखें उठए देख रहा है | तूने कोई काम ऐसा नही किया है जिससे थोड़ा सुकून मिला पाता | तू चाहता तो रात में ही उसका काम तमाम कर देता | मगर नहीं अब भी तेरा बेटी से प्यार उमड़ रहा है। इतनी कालिख मुंह पर पोतकर चली गई, क्या वह कम थी जो अब दुवारा उसे घर में घुसा लिया। तुम लोग तो कुछ नहीं कर पाए, अब हमें ही कुछ करना पड़ेगा। मुखिया गालियों की बौछार करते हेुए खैमी से कामिनी को बाहर निकालने के लिए कहने लगा | मुखिया जी की आवाज सुनते ही कामिनी दौड़ कर बाहर आई और बोली, “मुखिया अपनी जवान संभाल कर बात कर, तू मुखिया होगा इस गांव का, यहां के लोग ही तेरी गालियां सुन सकते हैं | अगर एक लफज और मुंह से निकाला तो सारी उम्र जेल में सड़ा दुंगी।” वह दरोगा से मुखिया केा समझाने के लिए कहने लगी| कामिनी की बात सुनकर दरोगा मुखिया के कान में फुसफुसाने लगा, दरोगा की बात पर मुखिया जोर से हंसा और बोला, “अरे देखो भाई लोगो अब हमें यह दो टके को दरोगा कानून बताऐगा।” दरोगा मुखिया के सामने भीगी बिल्ली बना खड़ा रहा। मुखिया कामिनी की तरफ मुखातिव होकर बोला, “अब हो गई न तुझे तसल्ली इस दरोगा की इतनी हिम्मत नही कि हमारे सामने कुछ बोल सके इसका मुंह तो हम पहले से हेी बंद किये हुए है |” मुंखिया उन बाप बेटों को कामिनी को उसी पंच बृक्ष के नीचे ले जाने को आदेश देता है, जहां पर गांव की हर अच्छी-बुरी चीज का फैसला होता है। इस बार थोड़ी हिेम्मत दिखाते हुए दरोगा, मुखिया केा एक तरफ कोने में ले जाकर समझाने लगा, “मुखिया जी इस बार मामला सिर्फ हम तक सीमित नहीं हैं अब मैं भी कुछ नहीं कर पाउंगा ऑर्डर सीधे केन्द्र सरकार से आए हैं रात केा ही एस एस पी साहब का फोन आ गया था। उन्ही के आदेश पर मैं यहां आया हूं आप कोई काम ऐसा मत करना जिससे मुझे ……।” मुखिया ने दरोगा की बात केा हवा में उड़ा दिया और साथ में आऐ लोगो को सभी पंचों को पंच वृक्ष पर इकट्ठा करने का आदेश देकर खुद उसी तरफ चल दिया। धीरे-धीरे गांव के लोग उस चबूतरे के आस-पास इकट्टा होने लगे, कुछ लोग वहां बदले की भावना केा लेकर बैठे थे तो कुछ लोगो के चेहरों पर एक सन्तोष की लहर दोड़ रही थी | जो कभी उनकी बेटी के साथ हुआ था वही अब खैमी की बेटी के साथ होगा | वाकी लोगो के लिए तो यह सिर्फ एक मनोरंजन था जो कि चुटकियां ले लेकर हंस रहे थे। कामिनी को खींचकर ले जाने के लिए जैसे ही जग्गो ने उसका हाथ पकड़ा, उसने जग्गो का हाथ एक तरफ झटक दिया और स्वयं चलने के लिए तैयार हो गई | कामिनी केा देखने के लिए गांव की सभी गलियों में भीड़ लगी थी वह आज भी उसी आत्मविश्वास के साथ चला रही थी जैसे पहले गांव में घूमती थी । उसके चेहरे पर वही तेज था जो पहले था| गांव की सभी औरते उसे देखकर हैरान थी | वह काल के गाल में होते हुए भी तनिक भी भयभीत न थी | आपस में बतियाती कुछ लड़कियां उसकी हिम्मत की दाद दे रहीं थीं, वहीं कुछ औरतें उसके इस कृत्य केा वेहयाई मान कर उसे गालियां भी दे रहीं थीं| इन सब की परवाह किए बगैर वह अपनी उसी रफतार से चली जा रही थी । बरगद के वृक्ष के नीचे बने चबूतरे पर सामने पांच व्यक्ति कुर्सियों पर बैठे थे जिनमें एक मुखिया भी था। कुछ लोग चबूतरे के दोनेा तरफ भी बैठे थे । वहीँ आकर कामिनी भी बैठ गई। बिना लाग लपेट के बात के शुरु करते हुए, उन्ही पंचों में से एक व्यक्ति कामिनी से कहने लगा, “कम्मो जो तुमने किया उसकी सजा को जानते हुए भी तुम यहाँ लोटकर क्यों आई हो ? अगर तुम्हें लगता है कि खैमी तुम्हें बचा लेगा और दुबारा से तुम इस गांव में रहोगी तो यह तुम्हारी भूल है| जो तुमने किया है, उसकी सजा तो तुम्हें भेुगतानी पड़ेगी, वरना इस गांव की प्रत्येक बहू बेटियों की हिम्मत इतनी बढ़ जाऐगी कि पहले वे भागकर जाऐंगी और फिर यहां आकर रहने लगेंगी। हमारे होते हुए यह संभव नहीं है।

कामिनी भरी पंचायत में खड़ी हो गई चारों तरफ हाथ घुमाती हुई बोली यहां जितने भी लोग बैठे हैं | मैं उन सब की समझ साफ करना चाहती हूं कि मैं यहां से रात में भाग कर नहीं गई थी। मैं अपनी मर्जी से सारे गाँव के सामने दिन में अपनी मां से कहकर गई थी| वह भी बपनी पढ़ाई पूरी करने। अगर आप लोग यह समझते हैं | मैं यहां रहने आई हूं तो तुम लोगों की यह गलत फहमी है | मैं अपने पिता की सम्पत्ति में अपना हिस्सा लेने आई हूं। मैं चाहती हूं की मेरे पिता की तीनों संतानो को बराबर की संपत्ति बांट कर मेरे हिस्से की मुझे दे दी जाय | मैं यहां से चली जाउंगी। बस इतनी सेी बात आप लोगो की समझ में नहीं आ रहीं है। इतना सुनते ही दोनेा भाई भरी पंचायत में शेरों की तरह दहाड़ने लगे | अगर संपत्ति के लिए जरा भी मुंह खोलाा तो यहीं काट डालेंगे।

 यह सम्पत्ति हमारी है दोनों तरफ से तनातनी को देखते हुये पंचो ने दोंनो भाइयों को चुप रहने का आदेश दिया। बहुत देर तक चुप रहने के बाद, अपनी चुप्पी को तोड़ते हुए खेमी बोला -‘‘अगर तुम्हें किसी जरूरी काम के लिये चार – छः लाख रूपये की जरूरत हो तो मैं तुम्हें अभी देने को तैयार हूँ। इसके अलावा तुम्हें फूटी कौड़ी नहीं मिलेगी | तुम जो भी चाहो कर लो । मुझे भीख में तुम्हारे ये पैसे नहीं चाहिये। इन पैसों को अपने इन दोनों बेटो को दे देना , जिससे ये कुछ दिन और अय्यासी कर लेंगे । मुझे सिर्फ मेरा हिस्सा चाहिये| घर में से भी और खेत में से भी। कामिनी अपनी आवाज को ऊँची करती हुयी कह रही थी । इधर गाँव में धीर-धीरे पुलिस का घेरा भी बढ़ता जा रहा था । चारों तरफ पुलिस-पुलिस ही दिखायी दे रही थी | गाँव पुलिस की छावनी में तब्दील होने लगा था। काफी देर की बहस व जद्दो-जहद के बाद सारे पंच अब एक ही बात पर अड़े हुए थे कि किस कानून में लिखा है कि शादी हो जाने के बाद पिता के खेत में लड़की का हिस्सा बरकरार रहता है। वह इसकी हकदार सिर्फ शादी से पहले ही होती है और तुम ………………. उनकी बात को बीच में ही काटती हुई कामिनी चिल्लाकर कहने लगी । ’’ मैं शादी -शुदा नहीं हूँ । मैंने कोई शादी नहीं की है। मैं जानती हूँ इस कानून को । इसलिये अपना हक लेने आयी हूँ। अभी वह अपनी बात पूरी भी नहीं कर पायी थी कि खेमी बीच में ही बोल पड़ा ‘‘ तुम तो यहाँ से संदीप के साथ……………………….’’ । हाँ गयी जरूर थी उसके साथ, लेकिन मैंने उसके साथ शादी नहीं की है ’’ इसी बात पर उग्र होता उसका भाई रज्जों पंचों की तरफ मुखांतिफ होकर बोला, “अभी तक नहीं की है तो अब कर लेगी उस नीच जात के साथ शादी । जिससे हमारी सम्पत्ति का एक बहुत बड़ा हिस्सा कमीन के पास चला जायेगा। अगर यही होता रहा इस देश में तो ये नीच लोग हमारी लड़कियों को बहला फुसलाकर हमारी जमीनों पर अपना अधिकार कर लेंगे । जिससे आज तक सिर झुकाकर बात करने वाले ये लोग हमारी बराबरी करेंगें और जरा सा भी कुछ कहने पर हमारे सामने सीना तान कर खड़े हो जायेंगे। मैं किसी भी कानून को नहीं मानता । यह हमारे पूर्वजों की खून पसीने की कमाई है । हम इसे यूँ ही बर्बाद नहीं होने देंगे । जो भी इस सम्पत्ति की तरफ आँख उठाकर देखेगा। उसके टुकड़े – टुकड़े कर देंगे । अब पंचों से मेरा आग्रह है कि बदचलन लड़की को कठोर से कठोर सजा सुनाई जाये जिससे इस गाँव के अलावा आस -पास के गाँव की कोई भी लड़की इस तरह की हिमाकत न करें ।”

कामिनी तन कर अपने भाइयों के सामने खड़ी हो गयी, जोर जोर से चिल्लाकर कहने लगी, “आँखे घुमाकर चारों तरफ देख लो अगर किसी ने भी मुझे छूने की कोशिश की तो यहीं दफन कर दिये जाओगे । यह मत समझना कि ये दरोगा तुम्हारे साथ है तो सारी पुलिस फोर्स तुम्हारे इशारों पर नाचेगी । मैं रात से लेकर अब तक देश के सभी महिला संगठनों व राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय मानव अधिकार मंत्रालय को सुचित कर चुकी हूँ। उन्हीं के दबाब के चलते यह फोर्स यहाँ भेजी गयी है। रही बात सम्पत्ति पर हिस्से की । यह देखो मेरे पास कोर्ट के आॅर्डर हैं ’’ वह भरी पंचायत में सारे गाँव के सामने उन कागजो को लहराती है। पुलिस कामिनी को अपने संरक्षण में ले लेती है और खेमी को अपनी जीप में बैठाकर कचहरी की तरफ चल देती है। सारा गाँव गाड़ियों की उडती हुई धूल में ओझिल हो जाता है ।

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अनीता चौधरी

जन्म - 10 दिसंबर ,मथुरा (उत्तर प्रदेश)
प्रकाशन - कविता, कहानी, नाटक आलेख समीक्षा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित |
कुछ कविताओं का 'संकेत रंग टोली' व 'कोवालेन्ट ग्रुप' द्वारा मंचन
सक्रियता - मंचीय नाटकों सहित एक शॉट व दो फीचर फ़िल्म 'कैद'(ज्ञान प्रकाश विवेक की कहानी व हनीफ मदार द्वारा लिखित)और फ़िल्म 'मटटो की साइकिल'(25 वाँ बुसान,दक्षिण कोरिया अंतराष्ट्रीय फ़िल्म फेस्टिवल 2020)में फ़िल्म मेकर प्रकाश झा के साथ लीड करेक्टर में अभिनय
विभिन्न नाटकों में सह-निर्देशन ,संयोजन और पार्श्व पक्ष में सक्रियता।
लगभग बीस वर्षों से 'संकेत रंग टोली' में निरंतर सक्रिय। हमरंग.कॉम में 'सह-संपादक'
संप्रति- शिक्षण व स्वतंत्र लेखन |
संपर्क - हाइब्रिड पब्लिक स्कूल
डहरुआ रेलवे क्रासिंग, तय्यबपुर रोड, यमुना पार लक्ष्मीनगर, मथुरा (उ०प्र०)
Pin code - 281204
फोन - 08791761875
ईमेल - anitachy04@gmail.com

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