

मंगत की खोपडी में स्वप्न का विकास
अब जरा इस स्वप्नदर्शी मंगत राम के बारे में जान लीजिए। वह दिल्ली के न्यू अशोक नगर इलाके में रहता है और मयूर विहार में एक हाउसिंग सोसाइयी के आगे फुटपाथ पर सिलाई मशीन लेकर बैठता है। आठ साल पहले उसका दुबला-पतला और खाँसता-खैखारता बाप इसी फुटपाथ पर इसी सिलाई

निदा नबाज़ की कविताएँ
अतीत के गहरे जख्मों से रिसते दर्द पर भविष्य के सुखद मानवीय क्षणों का मरहम रखती, ‘निदा नवाज़‘ की कविताएँ……| अँधेरे की पाज़ेब निदा नबाज़ अँधेरे की पाज़ेब पहन आती है काली गहरी रात दादी माँ की कहानियों से झाँकतीनूकीले दांतों वाली चुड़ैल सीवह मारती रहती है चाबुकमेरी नींदों की

एक सम्पूर्ण कविता
‘सीमा आरिफ़’ की लेखकीय सामाजिक सरोकारी प्रतिबद्धता उनकी रचनाओं की तरह बेहद गहरी होती जान पड़ती है | इन गहराती आशंकाओं के बीच प्रेमारोहण, उस मानवीय स्पर्श सा जान पड़ता है जो घोर अन्धकार और हताशा के क्षणों में भी आदिम को एक नई उर्जा से लबरेज़ कर देता है

मुहब्बत ही दीन-औ-इमां मेरा
वसंत से जब मेरी बात होती थी तो कहता था, तबस्सुम बेहद संजीदा और दानिशमंद लड़की है, इसलिए उसे पसंद आई. ‘मॉड’ होना एक बात है, और प्रोग्रेसिव होना दूसरी बात. उसकी कल्चर में ही देखो कितने लोग अपने को मॉडर्न कहते हैं, मगर भीतर से तहजीब के पल्लू के

साल्व इन लव
साल्व इन लव कक्षा में हमारा रोल नंबर एक ही अक्षर से शुरू होने की वजह से, हम दोनों एक ही सीट पर बैठते थे | हम दोनों लगभग एक ही उम्र, यही कोई पन्द्रह या सोलह वर्ष के रहे होंगे | लेकिन वन्दना मुझसे लम्बी थी | मेरी लम्बाई

जश्न-ए-आज़ादी (Jashan-e-Azadi)
जश्न-ए-आज़ादी उसका घर इन नवधनाड्य और विकसित, अविकसित कॉलोनियों से दूर बंजर ज़मीन पर बसे उस मुहल्ले में था जो अभी तक किसी ग्राम पंचायत या टाउन में शामिल नहीं हो पाया था | उसकी बस्ती का कोई नामकरण भले ही न हो पाया था लेकिन शहर में आने-जाने वालों

ईदा (कहानी) Eeda (Story)
ईदा (कहानी) Eedaa (Story) -हनीफ़ मदार(Hanif Madaar) बीस वर्ष लम्बा काल खंड भी ईदा को मेरी मनः-स्मृतियों से मिटा नहीं पाया । उस समय ईदा को समझ पाने की न मेरी उम्र थी न ताक़त । पूरे गांव के लिए आधा पागल ईदा मेरे लिए भी इस से ज्यादा कुछ