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ISSN - 2455-2011
RNI - UPHIN/2017/74803

सीमा आरिफ की कविताएँ – आभासी दुनिया में खोती मानवीय संवेदना और प्रेम की तलाश

सीमा आरिफ की कविताओं में डिजिटल युग के युवाओं की बेचैनी, ह्रास होती संवेदनाएँ और प्रेम की गहरी तलाश का मार्मिक चित्रण। पढ़ें humrang.com पर।
seema arif ki kavitaayen

सीमा आरिफ की ये कविताएँ केवल साहित्यिक रचनाएँ नहीं हैं — ये एक ज़िम्मेदार रचनाकार की वो आवाज़ें हैं जो आभासी शोर में दबती जा रही असली मानवीय संवेदनाओं को बचाने की कोशिश करती हैं। प्रेम हो, राजनीति हो, स्त्री-जीवन हो या सत्य की खोज — सीमा आरिफ हर विषय को अपनी अनूठी भाषिक संवेदनशीलता से छूती हैं और पाठक के भीतर कुछ हिला जाती हैं।

यह फेसबुक पर जन्मे

मुहब्बत टाइप अफ़साने
लम्बी सड़कों से
तेज़ दौड़ लगाते हैं प्रारम्भ में
दोनों छोर से
दिन रात का भेदभाव
सोचे बिना
फुल स्पीड में आते है
और फिर धीरे धीरे
बुध बाज़ार की आखिरी
रेड लाइट जैसे गुज़रते है
कभी चौराहे पर होती चर्चाओं
से दाईं ओर मुड़ते ही नहीं
जम जाते हैं दिल के अंतिम
कोने से सटे गगनचुम्बी
मॉल में ब्रांडेड दुकानों पर,
दूर से चमकदार दिखने वाले
भ्रम जैसे
नज़दीक आए तो कागज़ी,ख़ुश्क
मुट्टीभर गलतफ़हमी जितने।।

2- 

गुनाहों की सज़ा मिलती है इसी जहाँ में
पर यह लेते नहीं सबक़ पिछले दफ़ा से

करते रहते है ऐतबार इन पर हम
होता है हर बार मायूस भरोसा भी

बदलते रहते हैं शक्लें मुखोटे सियासतदा
चुनाव की रैली से इस इलेक्शन तक

खुद्दारी का खेलते है खेल यहाँ सब सिपाही
होती है शर्मसार इंसानियत भी हर दिशा से

लो ये वादा दोस्तों अब ख़ुद से इस बरस
नहीं रहेगा कोई साथी मरहूम इन्साफ से

करते है बात हर बात अपने हिसाब से
नापते हैं मेरी वफ़ा को अपने मिज़ाज से ||

3- 

सुंदरता की गुड़िया
थी वो साँवली
बड़ी नयनों वाली
मेरे गाँव की लड़कियाँ
जो शाम ढले
घर की मुंडेर पर
बिसर पड़ती थी
तय करती थी
ख़ुद अपने
रास्ते एक घर की छत से
दुसरे घर की छत तक
नमकीन थी उनकी वो आहटें
जो गलियों की लम्बाइयाँ
बस अड्डे से गुजरते हुए
नापा करती थी
ऊँची थी बहुत उनकी
सब आशाएँ/सपने
जो सिर्फ़ ह्रदय में ही छिपी रहते थे
कभी पंख लगाए आकाश पे
अपनी धरती नापा करती थी
रिसती रहती थी घोर
सियाह प्रश्नों से निडर
देह उनकी देह
जो रह गई थी मात्र एक शरीर
आत्मा विहीन
बिन अपनी पहचान के
पर याद रखो
मर्दों के सिद्धांत पे
बनाए गए उसूलों तुम
जितना काटोगे इनके
आशाओं की उड़ानों को
यह पुनः उग आएगी
समाज के जिस्म पर
अपने स्वयं के द्वारा
बनाए गए धरातल पर
निसंकोच संध्या से पहले ||

4- 

तुम ने जो भी कहा
वो सत्य रहा होगा
मैंने जो अनसुना किया
वो असत्य था
यथार्थ के इस जीवित
रूपी धरातल पर
तुम सात्विक हो और
मैं तुम्हारा सच
सत्य असत्य के
मध्यम में एक
धुरी है जो निरंतर
चक्कर लगा रही
है तुम्हारे सत्य
और वास्तविकता
के करीब
यही सत्य है मानुषी
जो में ने जन्मा है
वो केवल असत्य मात्र है
जो तुम पढ़ रहे हो अभी
मेरी रचनाओं के उस पार

5 – 

सोई आँखों के तसव्वुर को इंतज़ार कहते है

जागती आँखों ने हमने मिलकर ख्वाब देखा है

ये मालूम नहीं था कि सच को कड़वा कहते है
नहीं तो हमने यहाँ झुटों को सच्चा होते देखा है

बंद दरवाज़े इनके ज़हनों के,आलिम हो गए मशहूर
इल्म की किताबों को हम ने सरे-आम जलते देखा है

हो ऐसी ग़ज़ल भी जो मेरे नाम से हो ममनून
ज़ाहिद हर शेर पे दीवाने को दाद देते हुए देखा है

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सीमा आरिफ़

जन्म-10 दिसम्बर 1986 उत्तर प्रदेश ( ज़िला बिजनौर)
जामिया मिल्लिया इस्लामिया दिल्ली से इतिहास में पोस्ट ग्रेजुएशन एवं जर्नलिज्म में डिप्लोमा
PSBT की डॉक्यूमेंट्री फिल्म -"There is something in the Air" में अभिनय ( फिल्म 2011 में केरल फिल्म और कोरियन फिल्म फेस्टिवल द्वारा राष्ट्रीय फिल्म पुस्कार से सम्मानित)
तीन वर्ष तक नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में लेखन
विभिन्न मैगज़ीन,न्यूज़ पेपर्,पोर्टल में लेखक के रूप में सक्रीय
हिंदी एडिटर के रूप में दिल्ली में कार्यरत
D 94/ 10 प्लाट नंबर 44 ,ज़ाकिर नगर,
दिल्ली 110025

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