ख़लील जिब्रान की दो कहानियाँ

ख़लील जिब्रान की दो कहानियाँ

ख़लील जिब्रान 721 2020-03-25

ख़लील जिब्रान का नाम विश्व के उत्कृष्ट साहित्यकारों में ख़ास सम्मान के साथ गिना जाता है। इतना ही नहीं आपको एक लेखक के अलावा कवि और चित्रकार के रूप में भी विश्व भर में जाना जाता है। ख़लील जिब्रान के लेखन में पाखंड के प्रति विद्रोह, व्यंग्य एवं प्रेरणास्पद विचारों का भाव ही परिलक्षित नहीं होता बल्कि इसमें गहरी जीवन अनुभूति, संवेदना व भावात्मकता भी स्पष्ट दिखाई देती है। आपका साहित्य जीवन दर्शन से ओत-प्रोत है और इसीलिए प्रेम, न्याय, कला, आध्यात्म के अलावा धार्मिक पाखंड, वर्ग संघर्ष, समाज और व्यक्ति प्रमुख तौर पर आपके विषय रहे हैं। कहा जा सकता है कि प्रेरणा देने वाले विचारों का रचनात्मक प्रस्तुतिकरण आपके साहित्य की वेशेषता है। आपकी कहानियाँ पाठकों को आनंदित तो करती ही हैं साथ ही हमें जीवन जीने की कला से भी परचित कराती हैं। आज पढ़ते हैं ऐसी ही कुछ दो कहानियाँ "ख़लील जिब्रान" की

‘कान्दू – कटुए’ : लघुकथा कोलाज़ “भाग दो” (शक्ति प्रकाश)

‘कान्दू – कटुए’ : लघुकथा कोलाज़ “भाग दो” (शक्ति प्रकाश)

शक्ति प्रकाश 283 2018-11-18

आस-पास या पूरे सामाजिक परिवेश में हर क्षण स्वतःस्फूर्त घटित होती घटनाएं या वाक़यात किसी ख़ास व्यक्ति के इर्द-गिर्द ही घटित होते हों ऐसा तो नहीं ही है | सामाजिक संस्कृति में मानवीय संवेदनाओं से उत्पन्न होते ऐसे दृश्य दुनिया ज़हान में हर पल नज़र आते ही हैं | किन्तु सामाजिक रूप से गैर-जरूरी मानकर अनदेखी की जाने वाली इन उत्पत्तियों में, इंसानी ज़ज्बातों को झकझोर देने वाले इंसानी पहलुओं को पकड़ लेने की संवेदनशील दृष्टि ‘शक्ति प्रकाश’ के पास है | घटना या चरित्रों के अलावा सजीव भाषाई मौजूदगी के साथ, खूबसूरत रचनात्मक अंदाज़ में लेखकीय स्मृतियों की कोख से निकलती यह लघुकथाएं वर्तमान के लिए सम्पूर्ण सामाजिकता के सांस्कृतिक ताने-बाने का पुनर्पाठ हैं | – संपादक

‘कान्दू – कटुए’ : लघुकथा कोलाज़ “भाग एक” (शक्ति प्रकाश)

‘कान्दू – कटुए’ : लघुकथा कोलाज़ “भाग एक” (शक्ति प्रकाश)

शक्ति प्रकाश 315 2018-11-18

आस-पास या पूरे सामाजिक परिवेश में हर क्षण स्वतःस्फूर्त घटित होती घटनाएं या वाक़यात किसी ख़ास व्यक्ति के इर्द-गिर्द ही घटित होते हों ऐसा तो नहीं ही है | सामाजिक संस्कृति में मानवीय संवेदनाओं से उत्पन्न होते ऐसे दृश्य दुनिया ज़हान में हर पल नज़र आते ही हैं | किन्तु सामाजिक रूप से गैर-जरूरी मानकर अनदेखी की जाने वाली इन उत्पत्तियों में, इंसानी ज़ज्बातों को झकझोर देने वाले इंसानी पहलुओं को पकड़ लेने की संवेदनशील दृष्टि ‘शक्ति प्रकाश’ के पास है | घटना या चरित्रों के अलावा सजीव भाषाई मौजूदगी के साथ, खूबसूरत रचनात्मक अंदाज़ में लेखकीय स्मृतियों की कोख से निकलती यह लघुकथाएं वर्तमान के लिए सम्पूर्ण सामाजिकता के सांस्कृतिक ताने-बाने का पुनर्पाठ हैं | – संपादक

‘सबाहत आफ़रीन’ की कविताएँ ॰॰॰॰॰

‘सबाहत आफ़रीन’ की कविताएँ ॰॰॰॰॰

सबाहत आफरीन 228 2018-11-18

सचेतन मानवीय अभिव्यक्तियों को वर्गों में बाँटना और दायरों में क़ैद करना मुझे हमेशा ही ख़राब लगता रहा है। मेरे लिए ख़ासकर यह संकट तब और गहरा जाता है जब एक वर्ग विशेष, प्रेम और नैतिकता की दुहाई तो देता है किन्तु प्रेम अभिव्यंजना को सामाजिक रूप से ग़ैर ज़रूरी बताने से भी नहीं चूकता। शब्दों से रिसता प्रेम इंसानी संवेदना का जीवंत प्रतीक है। “सबाहत आफ़रीन” की रचनाओं से गुज़रते हुए मानवीय मन के उस कोने में कुछ अंकुरित सा होने लगता है जहाँ इंसानी ऊर्जा का श्रोत अदृश्य वक़्त के अंधियारों से ओझल है। हादसों के वक़्त की उठती चीख़-पुकारों से सहमे और असफलताओं की निराशा से भरते समय में इनकी कविताओं के शब्दों के संवेग में पिघलकर फूटती रचनात्मक प्रेम अभिव्यक्ति न केवल मानवीय संवेदना को झंकृत करती है बल्कि जिजीविषा के संघर्ष को ऊर्जा प्रदान करती है । कुछ इन्हीं एहसासों से भरना है “सबाहत” की रचनाओं से गुज़रना॰॰॰॰॰॰॰॰

‘कान्दू – कटुए’ : लघुकथा कोलाज़ “भाग तीन” (शक्ति प्रकाश)

‘कान्दू – कटुए’ : लघुकथा कोलाज़ “भाग तीन” (शक्ति प्रकाश)

शक्ति प्रकाश 278 2018-11-18

आस-पास या पूरे सामाजिक परिवेश में हर क्षण स्वतःस्फूर्त घटित होती घटनाएं या वाक़यात किसी ख़ास व्यक्ति के इर्द-गिर्द ही घटित होते हों ऐसा तो नहीं ही है | सामाजिक संस्कृति में मानवीय संवेदनाओं से उत्पन्न होते ऐसे दृश्य दुनिया ज़हान में हर पल नज़र आते ही हैं | किन्तु सामाजिक रूप से गैर-जरूरी मानकर अनदेखी की जाने वाली इन उत्पत्तियों में, इंसानी ज़ज्बातों को झकझोर देने वाले इंसानी पहलुओं को पकड़ लेने की संवेदनशील दृष्टि ‘शक्ति प्रकाश’ के पास है | घटना या चरित्रों के अलावा सजीव भाषाई मौजूदगी के साथ, खूबसूरत रचनात्मक अंदाज़ में लेखकीय स्मृतियों की कोख से निकलती यह लघुकथाएं वर्तमान के लिए सम्पूर्ण सामाजिकता के सांस्कृतिक ताने-बाने का पुनर्पाठ हैं | – संपादक

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