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ISSN - 2455-2011
RNI - UPHIN/2017/74803

चंद्रकांत देवताले की ‘दुनिया का सबसे गरीब आदमी’ एवं अन्य कविताएं

चंद्रकांत देवताले की कविताएँ मनुष्यता, नैतिकता, संघर्ष और विरोधाभासी समाज के यथार्थ को गहराई से उजागर करती हैं। “दुनिया का सबसे गरीब आदमी एवं अन्य कविताएं”

1- दुनिया का सबसे गरीब आदमी

दुनिया का सबसे गरीब आदमी
दुनिया का सबसे गैब इनसान
कौन होगा
सोच रहा हूँ उसकी माली हालत के बारे में
नहीं! नहीं!! सोच नहीं
कल्पना कर रहा हूँ
मुझे चक्कर आने लगे हैं
गरीब दुनिया के गंदगी से पते
विशाल दरिद्र मीना बाजार का सर्वे करते हुए
देवियों और सज्जनों
‘चक्कर आने लगे हैं’
यह कविता की पंक्ति नहीं
जीवनकंप है जिससे जूझ रहा इस वक्त
झनझना रही है रीढ़ की हड्डी
टूट रहे हैं वाक्य
शब्दों के मलबे में दबी-फँसी मनुजता को
बचा नहीं पा रहा
और वह अभिशप्त, पथरी छायाओं की भीड़ में
सबसे पीछे गुमसुम धब्बे-जैसा
कौन-सा नंबर बताऊँ उसका
मुझे तो विश्व जनसंख्या के आँकड़े भी
याद नही आ रहे फिलवक्त
फेहरिस्तसाजों को
दुनिया के कम-से-कम एक लाख एक
सबसे अंतिम गरीबों की
अपटुडेट सूची बनाना चाहिए
नाम, उम्र, गाँव, मुल्क और उनकी
डूबी-गहरी कुछ नहीं-जैसी संपति के तमाम
ब्यौरों सहित
हमारे मुल्क के एक कवि के बेटे के पास
ग्यारह गाड़ियाँ जिसमें एक देसी भी
जिसके सिर्फ चारों पहियों के दाम दस लाख
बताए थे उसके ऐश्वर्य-शानो-शौकत के एक
शोधकर्ता ने
तब भी विश्व के धन्नासेठों में शायद ही
जगह मिले
और दमड़ीबाई को जानता हूँ मैं
गरीबी के साम्राज्य के विरत रूप का दर्शन
उसके पास कह नहीं पाऊँगा जुबान गल
जाएगी
पर इतना तो कह सकता हूँ वह दुनिया की
सबसे गरीब नहीं
दुनिया के सत्यापित सबसे धनी बिल गेट्स
का फोटो
अखबारों के पहले पन्ने पर
उसी के बगल में जो होता
दुनिया का सबसे गरीब का फोटू
तो सूरज टूट कर बरस पड़ता भूमंडलीकरण
की तुलनात्मक हकीकत पर रोशनी डालने के
लिए
पर कौन खींचकर लाएगा
उस निर्धनतम आदमी का फोटू
सातों समुंदरों के कंकड़ों के बीच से
सबसे छोटा-घिसा-पिटा-चपटा कंकड़
यानी वह जिसे बापू ने अंतिम आदमी कहा था
हैरत होती है
क्या सोचकर कहा होगा
उसके आँसू पोंछने के बारे में
और वे आँसू जो अदृश्य सूखने पर भी बहते
ही रहते हैं
क्या कोई देख सकेगा उन्हें
और मेरी स्थिति कितनी शर्मनाक
न अमीरों की न गरीबों की गिनती में
और मेरी स्थिति कितनी शर्मनाक
न अमीरों की न गरीबों की गिनती में
मैं धोबी का कुत्ता प्रगतिशील
नीचे नहीं जा सका जिसके लिए
लगातार संघर्षरत रहे मुक्तिबोध
पाँच रुपए महीने की ट्यूशन से चलकर
आज सत्तर की उमर में
नौ हजार पाँच सौ वाली पेंशन तक
ऊपर आ गया
फिर क्यों यह जीवनकंप
क्यों यह अग्निकांड
की दुनिया का सबसे गरीब आदमी
किस मुल्क में मिलेगा
क्या होगी उसकी देह-संपदा
उसकी रोशनी, उसकी आवाज-जुबान और
हड्डियाँ उसकी
उसके कुचले सपनों की मुट्ठीभर राख
किस हंडिया में होगी या अथवा
और रोजमर्रा की चीजें
लता होगा कितना जर्जर पारदर्शी शरीर पर
पेट में होंगे कितने दाने
या घास-पत्तियाँ
उसके इर्द-गिर्द कितना घुप्प होगा
कितना जंगल में छिपा हुआ जंगल
मृत्यु से कितनी दुरी पर या नजदीक होगी
उसकी पता नहीं कौन-सी साँस
किन-किन की फटी आँखों और
बुझे चेहरों के बीच वह
बुदबुदा या चुगला रहा होगा
पता नहीं कौन-सा दृश्य, किसका नाम
कोई कैसे जान पाएगा कहाँ
किस अक्षांश-देशांश पर
क्या सोच रहा है अभी इस वक्त
क्या बेहोशी में लिख रहा होगा गूँगी वसीयत
दुनिया का सबसे गरीब आदमी
यानि बिल गेट्स की जात का नही
उसके ठीक विपरीत छोर के
अंतिम बिंदु पर खासता हुआ
महाश्वेता दीदी के पास भी
असंभव होगा उसका फोटू
जिसे छपवा देते दुनिया के सबसे बड़े
धन्नासेठ के साथ
और उसका नाम
मेरी क्या बिसात जो सोच पाऊँ
जो होते अपने निराला-प्रेमचंद-नागार्जुन-मुक्तिबोध
या नेरुदा तो संभव है बता पाते
उसका सटीक कोई काल्पनिक नाम
वैसे मुझे पता है आग का दरिया है गरीबी
ज्वालामुखी है
आँधियों की आँधी
उसके झपट्टे-थपेड़े और बवंडर
ढहा सकते हैं
नए-से-नए साम्राज्यवाद और पाखंड को
बड़े-से-बड़े गढ़-शिखर
उडा सकते पूँजी बाजार के
सोने-चाँदी-इस्पात के पुख्ता टीन-टप्पर
पर इस वक्त इतना उजाला
इतनी आँख-फोड़ चकाचौंध
दुश्मनों के फरेबों में फँसी पत्थर भूख
उन्हीं की जय-जयकार में शामिल
धड़ंग जुबानें
गाफिल गफलत में
गुणगान-कीर्तन में गूँगी
और मैं तरक्की की आकाशगंगा में
जगमगाती इक्कीसवीं सदी की छाती पर
एक हास्यास्पद दृश्य
हलकान दुनिया के सबसे गरीब आदमी के वास्ते

kavitayen

2- अगर तुम्हें नींद नहीं आ रही

अगर तुम्हें नींद नहीं आ रही
तो मत करो कुछ ऐसा
कि जो किसी तरह सोए हैं उनकी नींद हराम हो जाए
हो सके तो बनो पहरुए
दुःस्वप्नों से बचाने के लिए उन्हें
गाओ कुछ शांत मद्धिम
नींद और पके उनकी जिससे
सोए हुए बच्चे तो नन्हें फरिश्ते ही होते हैं
और सोई स्त्रियों के चेहरों पर
हम देख ही सकते हैं थके संगीत का विश्राम
और थोड़ा अधिक आदमी होकर देखेंगे तो
नहीं दिखेगा सोये दुश्मन के चेहरे पर भी
दुश्मनी का कोई निशान
अगर नींद नहीं आ रही हो तो
हँसो थोड़ा, झाँको शब्दों के भीतर
खून की जाँच करो अपने
कहीं ठंडा तो नहीं हुआ

3- औरत

वह औरत
आकाश और पृथ्वी के बीच
कब से कपड़े पछीट रही है,
पछीट रही है शताब्दियों से
धूप के तार पर सुखा रही है
वह औरत आकाश और धूप और हवा से
वंचित घुप्प गुफा में
कितना आटा गूँध रही है?
गूँध रही है मनों सेर आटा
असंख्य रोटियाँ
सूरज की पीठ पर पका रही है
एक औरत
दिशाओं के सूप में खेतों को
फटक रही है
वक्त की नदी में
दोपहर के पत्थर से
शताब्दियाँ हो गईं
एड़ी घिस रही है,
एक औरत अनंत पृथ्वी को
अपने स्तनों में समेटे
दूध के झरने बहा रही है
एक औरत अपने सिर पर
घास का गट्ठर रखे
कब से धरती को
नापती ही जा रही है
एक औरत अँधेरे में
खर्राटे भरते हुए आदमी के पास
निर्वसन जागती
शताब्दियों से सोई है
एक औरत का धड़
भीड़ में भटक रहा है
उसके हाथ अपना चेहरा ढूँढ़ रहे हैं
उसके पाँव
जाने कब से
सबसे
अपना पता पूछ रहे हैं

चित्र- फराह नज़ीर

4- कहीं कोई मर रहा है उसके लिए

झुक-झुक कर चूम रहे फूल जिसके होठों को
बतास में महक रही चंदन-गंध
जिसकी जगमगाती उपस्थिति भर से
जिसकी पदचापों की सुगबुगाहट ही से
झनझनाने लगे खामोश पड़े वाद्य
रोशन हो रहे दरख्तों-परिंदों के चेहरे
उसे पता तक नहीं
सपनों के मलबे में दबा
कहीं कोई मर रहा है
उसके लिए…

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Picture of चंद्रकांत देवताले

चंद्रकांत देवताले

जन्म : 7 नवंबर 1936, जौलखेड़ा, बैतूल (मध्य प्रदेश)
भाषा : हिंदी
विधाएँ : कविता, आलोचनाकविता संग्रह : हड्डियों में छिपा ज्वर, दीवारों पर खून से, लकड़बग्घा हँस रहा है, रोशनी के मैदान की तरफ, भूखंड तप रहा है, आग हर चीज में बताई गई थी, पत्थर की बैंच, इतनी पत्थर रोशनी, उसके सपने, बदला बेहद महँगा सौदा, पत्थर फेंक रहा हूँ
आलोचना : मुक्तिबोध : कविता और जीवन विवेक
संपादन : दूसरे-दूसरे आकाश, डबरे पर सूरज का बिम्ब
अनुवाद : पिसाटी का बुर्ज (दिलीप चित्रे की कविताएँ, मराठी से अनुवाद)

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